Jitiya Vrat 2026: संतान की लंबी उम्र के लिए सबसे कठिन व्रत है जीवित्पुत्रिका, जानें 3 दिन के नियम और व्रत कथा
जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन कृष्ण अष्टमी को संतान की लंबी आयु के लिए रखा जाता है। यह बिहार, यूपी, झारखंड का ...और पढ़ें

संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है जितिया व्रत ! (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
जितिया व्रत संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए होता है।
यह तीन दिवसीय कठिन व्रत नहाय-खाय से शुरू होकर पारण तक चलता है।
अश्वत्थामा, जीमूतवाहन और चील-सियारिन की कथाएं इससे जुड़ी हैं।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जितिया व्रत रखा जाता है। इसे जिउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। यह हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण और कठिन व्रतों में से एक है। मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि की कामना से यह व्रत रखती हैं।
जितिया व्रत का महत्व
जितिया व्रत मां और संतान के बीच के अटूट रिश्ते का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस कठिन व्रत को पूरी श्रद्धा और निष्ठा से करने वाली माताओं की संतान पर आने वाले कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं। यह व्रत मां के त्याग, तपस्या और ममता का प्रतीक माना जाता है।
जितिया व्रत तीन दिनों तक चलता है और इसके नियम काफी कठिन माने जाते हैं। माताएं संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि, प्रसन्नता और उन्नति की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। इस दौरान भगवान जीमूतवाहन की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।
जितिया व्रत के तीन दिन
1. पहला दिन- नहाय-खाय:
व्रत की शुरुआत सप्तमी तिथि को 'नहाय-खाय' से होती है। इस दिन माताएं सुबह स्नान करती हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। भोजन में आमतौर पर बिना प्याज-लहसुन का खाना शामिल होता है।
2. दूसरा दिन- जितिया व्रत:
अष्टमी तिथि को मुख्य व्रत रखा जाता है। इस दिन व्रती महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं। यानी अन्न तो दूर, वे जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करतीं। यह व्रत पूरे दिन और रात तक चलता है। इसी दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है।
3. तीसरा दिन- पारण:
नवमी तिथि को व्रत का पारण किया जाता है। पारण का अर्थ व्रत समाप्त करना होता है। महिलाएं सुबह पूजा-पाठ और सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद भोजन ग्रहण करती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी पौराणिक कथाएं
1. अश्वत्थामा और परीक्षित से जुड़ी कथा
जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी एक कथा महाभारत काल की मानी जाती है। कथा के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद अश्वत्थामा अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु से बेहद क्रोधित था। वह पांडवों से अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहता था।
एक दिन वह पांडवों के शिविर में घुस गया और वहां सो रहे पांडवों के बच्चों की हत्या कर दी। अश्वत्थामा को लगा कि उसने पांडवों को मार दिया है, लेकिन वे द्रौपदी के पांच पुत्र थे। इस अपराध के बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ लिया और उसकी मणि छीन ली।
इससे आहत अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे का जन्म होना आवश्यक था। मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुण्य का फल देकर उत्तरा के गर्भ में मृत बच्चे को जीवन प्रदान किया।
गर्भ में मृत होकर फिर जीवित होने के कारण उस बालक का नाम परीक्षित पड़ा। आगे चलकर वही राजा परीक्षित बने। इसी मान्यता से संतान की लंबी आयु और रक्षा के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत रखने की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।
2. राजा जीमूतवाहन की कथा
जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी एक अन्य प्रमुख कथा राजा जीमूतवाहन की है। मान्यता के अनुसार, जीमूतवाहन एक गंधर्व राजकुमार थे। उन्होंने नागवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने का निर्णय लिया था।
कथा के अनुसार, जीमूतवाहन ने नागकुमार शंखचूड़ को पक्षीराज गरुड़ से बचाने के लिए स्वयं को उनके सामने प्रस्तुत कर दिया। उन्होंने नागवंश की रक्षा के लिए स्वयं गरुड़ का भोजन बनने का निर्णय लिया।
जीमूतवाहन के साहस, त्याग और परोपकार से प्रसन्न होकर गरुड़ ने नागों को अपना भोजन न बनाने का वचन दिया। उन्होंने जीमूतवाहन को भी जीवनदान दिया। इस तरह जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा की।
मान्यता है कि इसी घटना की स्मृति में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।
3. चील और सियारिन की कथा
जितिया व्रत से जुड़ी एक लोककथा चील और सियारिन की भी है। कथा के अनुसार, एक चील और सियारिन ने साथ मिलकर जितिया व्रत करने का फैसला किया। चील ने व्रत के सभी नियमों का पालन किया, जबकि सियारिन भूख सहन न कर पाने के कारण व्रत बीच में ही तोड़ देती है।
मान्यता के अनुसार, इसका परिणाम यह हुआ कि चील के बच्चे जीवित और सुखी रहे, जबकि सियारिन के बच्चों की मृत्यु हो गई। इस कथा के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि व्रत का फल श्रद्धा, निष्ठा और नियमों के पालन से जुड़ा माना जाता है।
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स्रोत: धार्मिक मान्यताएं एवं प्रचलित पौराणिक कथाएं।
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