नई दिल्ली, लाइफस्टाइल डेस्क। हिंदू धर्म के अनुसार हरतालिका तीज व्रत का बड़ा महत्व है। यह व्रत हस्त नक्षत्र में होता है। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और सौभाग्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं भी इस तीज पर व्रत रख सकती हैं। हरितालिका तीज पर गौरी-शंकर की पूजा की जाती है।

सुहागिनें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को यह व्रत रखती हैं। तृतीया तिथि एक सितंबर रविवार को सुबह प्रातः 8 बजकर 26 मिनट से रात्रि 4 बजकर 56 मिनट तक रहेगी। दो सितंबर को उदया तिथि चतुर्थी होगी. अतः हरतालिका व्रत पूजन रविवार को ही किया जाना शास्त्र सम्मत है।

अखंड सौभाग्य के लिए ये व्रत बेहद खास होता है। हरतालिका तीज निर्जला व्रत होता है और ये कठिन व्रत में शुमार है। नई नेवली दुल्हन के लिए इस व्रत को करना थोड़ा मुश्किल भरा हो सकता है, लेकिन इस व्रत कि खासियत ये है कि इस व्रत की तैयारी करने और उत्साह में व्रत कब पूरा हो जाता है पता नहीं चलता।

हरितालिका तीज पर अपनी सास को या अपने से बढ़ी महिला को सुहाग और श्रृंगार का समान सजा कर सिंधारा तैयार करना भी तीज का अभिन्न अंग है। नई नवेली दुल्हन के लिए व्रत के नियम और विधि को जानना जरूरी है। तो जाने इस व्रत की विधि और पूजा करने का तरीका और पूजा सामग्री को जानें।

पूजा का शुभ मुहूर्त

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि रविवार 01 सितंबर को दिन में 11:21 बजे से लग जाएगी, जो सोमवार 02 सितम्बर के दिन में 9 बजकर 2 मिनट तक रहेगी। उसके बाद चतुर्थी तिथि लग जाएगी। चतुर्थी से युक्त तृतीया (हरितालिका) वैधव्यदोष नाशक तथा पुत्र-पौत्रादि को बढ़ाने वाली होती है, इसीलिए इस वर्ष हरितालिका व्रत सोमवार 02 सितंबर को मनाया जाएगा।हरितालिका तीज का शुभ मुहूर्त शाम 6:10 बजे से रात 07:54 बजे तक है।

कौन रख सकता है व्रत

शास्त्र में इस व्रत को रखने के लिए सधवा और विधवा सभी के लिए अनुमति है। अविवाहित युवतियां भी इस व्रत को रख सकती हैं।

व्रत एवं पूजा विधि

हरतालिका तीज व्रत माता गौरी और भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह दैनिक क्रियाओ से निवृत्त होने के बाद स्नान करना चाहिए। फिर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। इसके उपरांत व्रती को "मम उमामहेश्वरसायुज्यसिद्धये हरितालिकाव्रतमहं करिष्ये' मंत्र से व्रत का संकल्प करना चाहिए।

इसके बाद मकान के मंडप आदि से सुशोभित कर पूजन सामग्री एकत्र करें। फिर कलश स्थापन करके उस पर सुवर्णादि निर्मित शिव-गौरी (अथवा पूर्व प्रतिष्ठित हर-गौरी) को प्रतिष्ठित करें। फिर मंत्रों से उनको फूल आदि अर्पित करें।

 

Posted By: Ruhee Parvez

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