श्रीकृष्ण का जन्मदिवस मना रहे हैं तो सबसे पहले गीता के उस श्लोक से शुरुआत करते हैं, जिसे आप हम सब बोलते हैं

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

जी हां स्कूल की पार्थना से लेकर मंदिरों तक हम यह श्लोक सुनते आए हैं। अर्थ भी जानते हैं। जो नहीं जानते उनके लिए बताए देते हैं।

मैं जन्म लेता हूं, जब जब धर्म की हानि होती है, तब तब मैं आता हूं, जब जब अधर्म बढ़ता है तब तब मैं आता हूं, सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मै आता हूं, दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूं, धर्म की स्थापना के लिए में आता हूं और युग युग में जन्म लेता हूं।

गीता के उपदेश आज भी पूरी दुनिया के लिए एक महानतम ग्रंथ के रूप में देखे जाते हैं। जानकारों का कहना है कि दुनिया की हर समस्या का हल गीता में है, बस समझने की जरूरत है।

हमारा जीवन कैसा हो इस पर श्रीकृष्ण ने कहा है-

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

इसका अर्थ है- श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, सम्पर्क में आने वाले पुरुष भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है। कहने का मतलब यह है कि हम जैसा आचरण दूसरों से अपेक्षा करते हैं वो ही हमें दूसरों के साथ करना भी पड़ेगा।

कर्तव्य की क्या अहमियतता है और जो कर्तव्य पालन नहीं करते उनके लिए भगवत गीता में कहा गया है-

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।

अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥

इसका अर्थ है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं- हे पार्थ, जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है। मतलब ये कि आप इस सृष्टि में सिर्फ विलासिता भोगने नहीं आए हैं, आपके इस धरती के प्रति बहुत से कर्तव्य है, जिनका निश्चय रूप मे पालन होना चाहिए।

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