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पुनपुन बगैर श्राद्ध कर्म अधूरा

अतिशय महत्व के गया में पिंडदान भी पुनपुन नदी के तट पर कर्मकांड आदि के बगैर अधूरा माना जाता है। पर्यटन विभाग ने 50 लाख की लागत से यहां पुनपुन पिंडदान घाट का निर्माण कराया है। पिंडदान स्थल पर तीन मंजिला यात्री शेड का भी निर्माण कराया गया है। तीन लाख की लागत से दो वर्ष पूर्व एनएच-

By Edited By: Published: Mon, 08 Sep 2014 03:55 PM (IST)Updated: Mon, 08 Sep 2014 04:43 PM (IST)
पुनपुन बगैर श्राद्ध कर्म अधूरा

अतिशय महत्व के गया में पिंडदान भी पुनपुन नदी के तट पर कर्मकांड आदि के बगैर अधूरा माना जाता है। पर्यटन विभाग ने 50 लाख की लागत से यहां पुनपुन पिंडदान घाट का निर्माण कराया है। पिंडदान स्थल पर तीन मंजिला यात्री शेड का भी निर्माण कराया गया है। तीन लाख की लागत से दो वर्ष पूर्व एनएच-83 से पिंडदान स्थल तक सड़क और नाले का निर्माण कराया गया।

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पिछले वर्ष 16 लाख की लागत से यहां दो हाई मास्ट लाइट लगाई गईं। 1876 में पटना-गया रेलखंड के निर्माण होने के बाद पुनपुन के पंडितों ने अंतरराष्ट्रीय पितृपक्ष मेला के मद्देनजर ब्रिटिश सरकार से वहां एक रेलवे हाल्ट के निर्माण की मांग की। अंग्रेजी सरकार ने पिंडदानियों की सुविधा के लिए वहां पुनपुन बाथिंग प्लेटफॉर्म के नाम से अस्थायी रेलवे हाल्ट का निर्माण करा दिया, जो बाद में पुनपुन घाट हाल्ट के नाम से जाना गया। उस वक्त केवल पित़ृपक्ष के समय ही वहां ट्रेनें रुकती थीं।

सन् 2002 में तत्कालीन रेलमंत्री नीतीश कुमार ने पुनपुन घाट हाल्ट को स्थायी हाल्ट का दर्जा दे दिया। उसके बाद यहां एक्सप्रेस को छोड़कर सभी पैसेंजर ट्रेनों का ठहराव होने लगा। पटना से पुनपुन तक बनी सड़क बाद में एनएच-83 के रूप में बदल गई।

त्रिवेणी की परंपरा पुरानी

महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि वाल्मीकिनगर में त्रिवेणी संगम के तट पर पितृपक्ष में सीमावर्ती उत्तर प्रदेश और नेपाल से श्रद्धालुओं की अच्छी-खासी जुटान होती है। वेद विदित सदानीरा (पौराणिक नारायणी) में तमसा और भद्रा के संगम स्थल पर तर्पण और पिंडदान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। यहां पिंडदान से लेकर कर्मकांड की सभी प्रक्रियाएं स्थानीय पंडित पूरी कराते हैं। मान्यता है कि यहां तर्पण से पितरों को बैकुंठ की प्राप्ति होती है।

मंगरौनी की विशेष महत्ता

मधुबनी जिला मुख्यालय से उत्तर दिशा में करीब दो किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है मंगरौनी गांव। यहां वर्षो से पिंडदान की परंपरा है। पितरों के निमित्त श्राद्ध-कर्म और पिंडदान के लिए यहां आस-पास के जिलों से भी ठीक-ठाक संख्या में लोग पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां पिंडदान का फलाफल गया के समतुल्य है। गांव के प्रवेश-मुख पर एकादश रूद्र मंदिर है। उसके परिसर में श्राद्ध-कर्म संपन्न किए जाते हैं। प्रांगण में स्थित तालाब में तर्पण के लिए भी श्रद्धालुओं का जमघट लगा रहता है। पुजारी बाबा आत्माराम के मुताबिक तांत्रिक मुनेश्वर झा ने इस मंदिर की स्थापना की थी। तंत्र-विद्या द्वारा उन्होंने इस स्थल को जागृत किया। उसके बाद से यह पितरों के प्रति श्रद्धा-कर्म के लिए ख्यात हो गया। मंगरौनी गांव में साहित्यकारों और विद्वानों के अलावा च्योतिष और तंत्र-विद्या के जानकारों की अच्छी-खासी तादाद है। कर्मकांडी पंडित भी।


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