कहानी में छुपा है सच 

आप हैरान होगे कि आखिर श्री राम के विजयोत्सव आैर उनके अयोध्या वापस आने के उत्साह को जताने के लिए मनार्इ जाने वाली खुशी जिसे दीवाली, दीपोत्सव या दीपावली कहते हैं भारत के इस खास हिस्से में 10 दिन बीतने के बाद 11वें दिन क्यों मनार्इ जाती है। इसका रहस्य बताती है एक पौराणिक कथा। इस कथा के अनुसार जब विश्व भर में भारतीय समुदाय कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली मना रहा होता है तब एक मानवीय चूक के चलते टिहरी गढ़वाल का एक इलाका खामोश उदास बैठा रहा था। इस कथा में बताया गया है कि गढ़वाल क्षेत्र में भगवान राम के अयोध्या वापस आने की खबर उनके पहुंचने के ग्यारह दिन बाद पहुंची थी। इसी के चलते वहां के निवासियों ने दीपावली का त्योहार 11वें दिन मनाया था। वैसे एक अन्य वहीं दंत कथा के अनुसार चंबा का रहने वाला एक व्यक्ति भैला बनाने के लिए लकड़ी लेने जगंल गया था और ग्यारह दिन तक वापस नहीं आया।उसके दुख में वहां के लोगों ने दीपावली नहीं मनाई। जब वो व्यक्ति वापस लौटा तभी ये पर्व मनाया गया आैर लोक खेल भैला खेला। तब से इगास बग्वाल के दिन दीवाली मनाने आैर भैला खेलने की परंपरा शुरू हुई। 

भिन्न नाम आैर परंपरा 

इस क्षेत्र में ना सिर्फ दीपावली मनाने का दिन फर्क है बल्कि अलग नाम आैर हट कर तरीका भी है। इस पर्व को स्थानीय भाषा में इगास बग्वाल कहा जाता है। साथ ही इसमें दीयों और पटाखों की जगह पर भैला खेला जाता है, जो कि एक पारंपरिक लोक खेल है। इसके लिए इगास बग्वाल के दिन लकड़ी और बेल से भैला बनाया जाता है और स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा के बाद उसको जलाकर  घुमाया जाता है। इसके बाद एक स्थान पर एकत्रित हो कर ढोल नगाड़ों के साथ आग के चारों ओर लोक नृत्य किया जाता है। इस तरह से इस क्षेत्र में अलग अंदाज में दीपावली मनार्इ जाती है। 

Posted By: Molly Seth

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