क्‍या है अधिक मास 

अधिक मास को मल मास, पुरूषोत्तम मास आदि नामों से पुकारा जाता हैं। इस मास में मांगलिक कार्य नहीं होते हैं। हालांकि इस दौरान धर्म-कर्म के पुण्य फलदायी होते हैं। इस आने वाले वर्ष 2018 में 16 मई से 13 जून तक की अवधि अधिकमास की रहेगी। वैसे ज्येष्ठ माह इसके पूर्व 30 अप्रैल से प्रारंभ होकर 27 जून तक रहेगा परंतु कृष्ण और शुक्ल पक्ष के दिनों के मान से अधिकमास मई जून के मध्य भाग में रहेगा। व्यतीत समय में वि.सं. 1999, 2018, 2037 व 2056 संवत् के पश्चात् पुन: महान पुण्यप्रद ज्येष्ठ अधिक मास वि.सं. 2075 सन् 2018 में हो रहा है। प्र. ज्येष्ठ शुक्ल 1 बुधवार ता. 16 मई 2018 से द्वि. ज्येष्ठ कृष्ण 30 बुधवार ता. 13 जून 2018 तक रहेगा। पंडित विजय त्रिपाठी ‘विजय’ से जानें क्‍यों कहते हैं इसे मलमास और इस महीने में क्‍या करें क्‍या ना करें।

ज्येष्ठ माह में होगा इस वर्ष पुरूषोत्तम मास 

धार्मिक कृत्यों के लिए सौरमास तथा चान्द्रमासों द्वारा काल गणना की परिपाटी चिरकाल से चली आ रही है। दर्शपौर्णमासादि योगों तथा कालों में चन्द्रमास एवं संक्रान्ति जैसे पुण्यकाल के लिए सौरमास का उपयोग होता आ रहा है। संकल्पादि द्दर्मकृत्यों में सौर तथा चान्द्रमास का समन्वयपूर्वक ऋतु, त्योहार एवं व्रत-पर्वादि नियत रूप से होते रहें एवं एकरूपता बनी रहे ऐसा प्रबन्ध करते हेतु ज्योतिर्विदों ने अधिक मास की योजना की है। इस वर्ष अधिक मास दिनांक 15 मई 2018 मंगलवार सायं घं.05 मि.18 बजे से आरम्भ हो रहा है तथा 13 जून 2018 बुधवार को रात्रि घं.01 मि.14 बजे तक रहेगा। इस अधिक मास का नाम ज्येष्ठ मास होगा। 

इस प्रकार होती है गणना

सूर्य जितने समय में एक राशि पूर्ण करे, उतने समय को सौरमास कहते हैं, ऐसे बारह सौरमासों का एक वर्ष होता है, जो सूर्य सिद्धान्त के अनुसार 365 दिन 15 घटी 31 पल और 30 विपल का होता है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर कृष्णपक्ष की अमावस्या पर्यन्त के समय को चन्द्रमास कहते हैं। ऐसे बारह मासों का एक चन्द्रवर्ष होता है जो 354 दिन, 22 घटी, 1 पल और 24 विपल का होता है। इस व्यवस्थानुसार एक सौर और चन्द्रवर्ष में प्रतिवर्ष 10 दिन, 53 घटी, 30 पल और 6 विपल का अन्तर पड़ता है। यदि इस प्रकार चन्द्रमासों को लगातार पीछे खिसकने दिया जाता तो वे 33 वर्षों में अपने चक्र को पूरा कर लिये होते एवं चन्द्र पंचांग से सम्बद्ध पर्व इस अवधि में सभी ऋतुओं में घूम गये होते, जैसे कि इस्लाम पन्थ में घटित होता है। तिथियों की गणना में त्रुटि को रोकने के लिए मलमास (अधिमास) के नियम चालू किये गये। ऊपर दी गई जानकारी से आप समझ गए होंगे कि सौर तथा चन्द्रमास के वर्षों में लगभग ग्यारह दिन का अन्तर पड़ता रहता है। जिससे पौने तीन वर्षों में 30 दिन का अन्तर पड़ जाता है। इसी को अधिशेष व मलमास कहते हैं। इसलिए यह कहा जाता है कि, 32 मास, 16 दिन और 4 घटी का समय बीत जाने पर 29 दिन, 31 घटी, 50 पल, और 7 विपल का एक अधिक मास आता है। 

सुचारू रूप से चलता है तिथियों और पर्वों का क्रम

कहा गया है- द्वात्रिंशद्भिर्गतैर्मासैः दिनैः षोडशभिस्तथा। घटिकानां चतुष्केण पततिह्यधिमासकः।।

इस गणितीय गणना के अनुपात से 33 सौरमास बराबर चौतींस चन्द्रमास के होते हैं। यह एक ऐसा प्रसंग है कि पौने तीन वर्ष अन्तर पर पड़ने वाले इस चन्द्रमास में रवि संक्रमण नही होता और मास तथा संक्रान्ति का संबंध भी टूट जाता है। चन्द्रमास और सूर्य संक्रान्ति दोनो का प्रारम्भ काल बिल्कुल समीप में हो, जिससे मास तथा ऋतुओं का संबंध ठीक-ठीक होता रहे तथा पर्व त्योहार तथा व्रत अपने-अपने समय पर होते रहें, इसलिए उस बढ़े हुये चन्द्रमास को ‘अधिक’ ऐसी संज्ञा देकर पृथक कर देते हैं और उस वर्ष 13 चन्द्रमास मान लेते हैं। उसमें संक्रान्ति न होने से उसे मास-द्वयात्मक एक मास मान लिया जाता है, जो साठ तिथियों का होता है। इस बढ़े हुए अधिक मास, को उसके उत्तर मास (अमान्त-मासानुसार) की संज्ञा देकर उसे उत्तर मास में मिला देते हैं। ऐसा करने से चन्द्रमास एवं सौरमासों का समन्वय हो जाता है और ऋतुओं का सम्बन्ध ठीक समय पर होने से पर्व, व्रतादि निश्चित समय पर होने लगते हैं परन्तु इस अधिक मास को धर्मशास्त्रकारों ने ‘मलमासः स विज्ञेयो गर्हितः सर्वकर्मसु।’ इस ब्रह्मसिद्धान्त के वचनानुसार सभी काम्यकर्मां के लिए निषिद्ध माना गया है। 

क्‍यों कहते हैं मलमास और क्‍यों नहीं होते शुभ कार्य

अब यहां विवाद खड़ा हो जाता है कि, यह अधिक मास, कालाधिक्य होने के कारण मलमास या अहंस्पति तथा मलिम्लुच किस प्रकार हो गया और इसे सभी कर्मों के लिए निषिद्ध क्यों ठहराया गया? ज्योतिषियों तथा धर्मशास्त्रियों ने इस अधिशेष को शुभ कार्यों के लिये वर्जित इसलिए किया है क्‍योंकि, इसमें संक्रान्ति विकृति हो गयी है। इसके अतिरिक्त वे एक तर्क और देते है कि, शकुनि, चतुष्पद नाग तथा किंस्तुघ्न इस चार करणों को रवि का मल कहते हैं। अधिक मास का प्रारम्भ इन मलसंज्ञक करणों द्वारा ही होने के कारण इसे मलमास कहा जाता है। धर्मशास्त्रकार कहते हैं कि, यह अधिमास बढ़ा हुआ काल होने से मलमास और अशुद्ध अर्थात् काम्यकर्म वर्जित है। मलमास को ही अधिक मास एवं पुरूषोत्तम मास भी कहते हैं। असंक्रान्तिमासोऽधिमासः स्फुटं स्यात्। द्विसंक्रान्तिमासः क्षयाख्यः कदाचित्।। - भास्कराचार्य

अर्थात् अमान्त मान से जिस चान्द्रमास में सूर्य की संक्रान्ति नही होती, वह अधिक मास (मलमास) या पुरूषोत्तम मास कहलाता है। 

पुरूषोत्‍म को समर्पित इस मास मे वर्जित हैं शुभ कार्य

मलमास के रूप में निन्दित इस अधिक मास को पुरूषोत्तम ने अपना नाम देकर कहा है कि, अब मैं इस अधिक मास का स्वामी हो गया हूं। अतः सम्पूर्ण विश्व इसको सर्वथा विशुद्ध मानेगा। यह मास अब सभी मासों का अधिपति, विश्व-वन्द्य एवं जगतपूज्य होगा। इसीलिए ये आधि-व्याधि एवं दुःख-दारिद्रय को नष्ट करने वाला होगा। इसके बावजूद कहा गया है कि ‘न कुर्यादधिके मासि काम्यं कर्म कदाचन।’ अर्थात अधिकमास में फल प्राप्ति की कामना से किये जाने वाले प्रायः सभी कार्य वर्जित हैं। जैसे कुआं, बावली तालाब एवं बाग-बगीचे आदि लगाने का आरम्भ, देव-प्रतिष्ठा, प्रथम व्रतारम्भ, व्रत उद्यापन, वधू-प्रवेश, भूमि, सोना एवं तुला आदि महादान, विशिष्ट यज्ञ-योगादि अष्टका श्राद्ध, उपाकर्म, वेदारम्भ, वेदव्रत, गुरूदीक्षा, विवाह, उपनयन और चातुर्मासीय व्रतारम्भ आदि कार्य अधिक मास में वर्जित हैं।

पुरूषोत्तम मास में क्‍या करें

प्राणघातक बीमारी आदि की निवृति के लिए रूद्र मन्त्र जप, व्रतादि अनुष्ठान, कपिल षष्ठी आदि व्रत, अनावृष्टि निवृत्ति हेतु पुरश्चरण-अनुष्ठानादि कार्य वषट्कार वर्जित, हवन ग्रहण-संबंधी श्राद्ध दान-जपादि कार्य, पुत्रोत्पति के कृत्य, गर्भाधान, पुंसवन सीमंत संस्कार, और निश्चित अवधि पर समाप्त करने तथा पूर्वागत प्रयोगादि कार्य अधिक मास में किये जा सकते हैं। इस मास में प्रतिदिन भगवान् पुरूषोत्तम का पूजन-अर्चन, कथा-श्रवण करना, व्रत-नियम से रहना चाहिए तथा कांस्य पात्र में रखकर अन्न-वस्त्रादि का दान एवं तैंतीस मालपुआ का दान विशेष महत्वपूर्ण हैं। 

 

By Molly Seth