Dahi Handi celebrations: कृष्ण जन्माष्टमी या गोकुलाष्टमी के एक दिन बाद दही हांडी को बेहद ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन युवा लड़के एक मिट्टी की हांडी में दही-माखन भरते हैं और उसे ऊंचाई पर लटका देते हैं। जिस तरह बाल गोपाल बचपन में दही-माखन चुराते थे ठीक उसी तरह युवा वर्ग उसी लीला को दोहराता है। मथुरा-वृन्दावन के साथ-साथ इस पर्व को गुजरात और महाराष्ट्र में अधिक लोकप्रिय रूप से मनाया जाता है। तो चलिए जानते हैं कि इस उत्सव को किस तरह मनाया जाता है। लेकिन उससे पहले जानते हैं दही हांडी का मुहूर्त।

दही हांडी मुहूर्त:

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 अगस्त को सुबह 09:​06 मिनट से हो गई है। यह 12 अगस्त दिन में 11:16 मिनट तक रहेगी। दही हांडी का खेल अष्टमी के अगले दिन आयोजित किया जाता है। ऐसे में इस वर्ष दही हांडी का उत्सव 12 अगस्त यानी बुधवार को मनाया जाएगा।

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दही हांडी उत्सव:

जहां पहले यह माखनचोर यानी बाल गोपाल दही-माखन चुराकर खाया करते थे। वहीं, आज यह रस्म युवा वर्ग उन्हें समर्पित कर सम्पन्न करते हैं। यह उत्सव सामुदायिक तौर पर मनाया जाता है। इसमें हर जगह पुरस्कार भी निर्धारित किए जाते हैं। इसमें कई टीमें भाग लेती हैं। इनमें से जो टीम निर्धारित समय में दहीं-हांडी को तोड़ देती है। दही हांडी के लिए मिट्टी का बड़ा बर्तन या हांडी ली जाती है। इस हांडी में आमतौर पर फलों, शहद, मक्खन, दही और दूध को भरा जाता है। इस हांडी को करीब बीस से चालीस फीट ऊंचाई पर लटकाया जाता है। इसके बाद टीम के लोग एक मानव पिरामिड बनाते हैं। फिर अंतिम व्यक्ति यानी गोविंदा सबसे ऊपर जाकर हांडी को तोड़ता है। हालांकि, इस बार कोरोना के चलते सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए यह कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाएगा।

 

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