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बच्चे के जन्म के बाद घर में क्यों लगता है सूतक? पूजा-पाठ और मंदिर जाने के जरूरी नियम यहां पढ़ें

Published: Wed, 26 Aug 2026 03:17 PM (IST)

बच्चे के जन्म के बाद घर में सूतक लगने की परंपरा है, जिसमें परिवार को शुद्धिकरण के दौर से गुजरना ...और पढ़ें

सूतक के नियम क्या हैं? (AI-Generated Image)

सूतक के नियम क्या हैं? (AI-Generated Image)

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संक्षेप में पढ़ें

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आपने अक्सर सुना होगा कि घर में बच्चे का जन्म होने पर कुछ दिनों तक भगवान की पूजा नहीं की जाती। सनातन परंपरा में इसे 'सूतक' कहा जाता है। लेकिन, ऐसा क्यों होता है और इसके पीछे क्या वजह है ये आपने शायद ही सोचा होगा। चलिए जानते हैं इसके पीछे की धार्मिक मान्यताएं क्या कहती हैं?

सूतक क्या है और शास्त्रों में इसे लेकर क्या कहा गया है?

मनुस्मृति (अध्याय 5) में एक श्लोक है, जो जन्म और मृत्यु दोनों के सूतक के नियम को स्पष्ट करता है:

जाते विप्रस्य संस्पर्शाद् विशुद्धिः प्रजायते।
सूतके मृतके चैव दशाहं परमं स्मृतम्॥

अर्थ: बच्चे के जन्म लेने पर और किसी की मृत्यु होने पर 10 दिनों का सूतक (अशुद्धि) माना जाता है, जिसके बाद ही शुद्धि होती है।

सनातन धर्म में जन्म और मृत्यु, दोनों ही स्थितियों में सूतक लगने की परंपरा है। मनुस्मृति के अलावा गरुड़ पुराण और पराशर स्मृति जैसे प्रमुख धर्मग्रंथों में जन्म और मरण के सूतक के बारे में विस्तार से बताया गया है। सूतक वह समय है जब घर को 'शुद्धिकरण की प्रक्रिया' में माना जाता है। इसलिए शिशु के जन्म लेते ही घर में सूतक काल आरंभ हो जाता है।

सूतक के दौरान पूजा-पाठ से दूरी क्यों?

शास्त्रों के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद परिवार को शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से एक शुद्धिकरण के दौर से गुजरना पड़ता है। इसी वजह से ऐसे मौके पर मंदिर जाने, घर में दीया जलाने या विधिवत पूजा-पाठ करने की भी मनाही होती है। आप इस दौरान मूर्ति स्पर्श भले न कर सकें, लेकिन मन ही मन भगवान का ध्यान, उनका स्मरण और मंत्रों का मानसिक जप पूरी श्रद्धा के साथ कर सकते हैं।

कितने दिनों में खत्म होता है सूतक?

सूतक कितने दिन चलेगा, यह अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की अपनी परंपराओं पर निर्भर करता है। आमतौर पर कई परिवारों में 12वें दिन घर का शुद्धिकरण किया जाता है। इसके अलावा, भारत के कई हिस्सों में कुछ जगह सवा महीने तक मंदिर में जाने की मनाही है। इसके पीछे एक बड़ा स्वास्थ्य कारण भी है। दरअसल, यह समय मां और बच्चा दोनों को बाहरी संक्रमण से बचाने और उनके आराम के लिए निर्धारित किया गया है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।