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चाणक्य नीति: कहीं आप भी तो नहीं अपने बच्चों के दुश्मन? पढ़ें माता-पिता की 3 बड़ी गलतियां

Published: Tue, 24 Mar 2026 01:18 PM (IST)

आचार्य चाणक्य के अनुसार, कुछ माता-पिता अनजाने में ही अपने बच्चों के सबसे बड़े दुश्मन बन जाते हैं। पढ़ें वो ...और पढ़ें

Chanakya Niti: आचार्य चाणक्य ने बताया माता पिता की 3 गलतियां

Chanakya Niti: आचार्य चाणक्य ने बताया माता पिता की 3 गलतियां

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धर्म डेक्स, नई दिल्ली। हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा जीवन में खूब तरक्की करे और उसका नाम रोशन हो। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि आचार्य चाणक्य (Acharya Chanakya) ने अपनी 'चाणक्य नीति' में कुछ ऐसी स्थितियों का जिक्र किया है, जहां माता-पिता ही अपने बच्चों के सबसे बड़े दुश्मन बन जाते हैं?

आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में माता-पिता के कर्तव्यों के बारे में विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने दूसरे अध्याय के 11वें श्लोक में माता-पिता को बच्चों के लिए शत्रु समान बताया है। इसमें बच्चों की स्थिति को हंसों के झुंड में बगुले की तरह बताया गया है।

1. अच्छे गुणों का निवेश (संस्कार ही असली संपत्ति)

पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः ।।

चाणक्य नीति के दूसरे अध्याय के 10वें श्लोक में कहा गया है कि बुद्धिमान माता-पिता वही हैं, जो अपनी संतान (पुत्र और पुत्री दोनों) को बचपन से ही अच्छे गुणों और सदाचार की शिक्षा देते हैं।

चाणक्य का मानना है कि जो बच्चे नीतिवान (नियमों को जानने वाले) और शीलवान (अच्छे चरित्र वाले) होते हैं, वे न केवल अपने जीवन में सफल होते हैं, बल्कि उनके कारण पूरे कुल का नाम रोशन होता है। समाज ऐसे गुणी बच्चों की पूजा करता है। इसलिए, बच्चों को सिर्फ लाड़-प्यार न दें, उन्हें अनुशासन और नैतिकता भी सिखाएं।

Chanakya (2)

(Image Source: AI-Generated)

2. शिक्षा का अभाव यानी सबसे बड़ी दुश्मनी

माता शत्रु पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।।

सबसे कड़वा और सच श्लोक दूसरे अध्याय का 11वां हैचाणक्य कहते हैं कि वे माता-पिता अपनी ही संतान के सबसे बड़े शत्रु (दुश्मन) हैं, जो उन्हें पढ़ाते-लिखाते नहीं हैं।

एक अनपढ़ व्यक्ति विद्वानों की सभा में कभी सम्मान नहीं पा सकता। चाणक्य ने इसकी तुलना 'हंसों के झुंड में बैठे बगुले' से की है। जैसे बगुला हंसों के बीच अलग और तुच्छ दिखता है, वैसे ही बिना शिक्षा के इंसान ज्ञानियों के बीच उपहास का पात्र बनता है। शिक्षा ही वह हथियार है जो बच्चे को समाज में सिर उठाकर जीना सिखाती है।

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