वृंदावन। चैतन्य महाप्रभु ने विधवाओं को वृंदावन आकर प्रभु भक्ति के रास्ते पर आने को प्रेरित किया था। वृंदावन करीब 500 वर्ष से विधवाओं के आश्रय स्थल के तौर पर जाना जाता है।

कान्हा के चरणों में जीवन की अंतिम सांसें गुजारने की इच्छा लेकर देशभर से यहां जो विधवाएं आती हैं, उनमें ज्यादातर करीब 90 फीसद बंगाली हैं। अधिकतर अनपढ़ और बांग्लाभाषी। वृंदावन की ओर बंगाली विधवाओं के रुख के पीछे मान्यता यह है कि भक्तिकाल के प्रमुख कवि चैतन्य महाप्रभु का जन्म 1486 में पश्चिम बंगाल के नवद्वीप गांव में हुआ था। वे 1515 में वृंदावन आए और उन्होंने अपना शेष जीवन वृंदावन में व्यतीत किया। निराश्रित महिलाओं के अनुसार, इसलिएउनका यहां से लगाव है।

कहा जाता है चैतन्य महाप्रभु ने बंगाल की विधवाओं की दयनीय दशा और सामाजिक तिरस्कार को देखते हुए उनके शेष जीवन को प्रभु भक्ति की ओर मोड़ा और इसके बाद ही उनके वृंदावन आने की परंपरा शुरू हो गई।

अन्य शहरों में आश्रय सदनों की कोई योजना नहीं- वृंदावन के भूतगली में दो और चैतन्य विहार स्थित एक आश्रय सदन में रहने वाली निराश्रित महिलाओं की आर्थिक मदद करने वाली एनजीओ सुलभ इंटरनेशनल के पीआरओ मदन कुमार झा ने बुधवार को बताया कि यह संस्था वृंदावन, बनारस और उत्तराखंड में केदारनाथ के समीप स्थित देवली ग्राम की विधवाओं की हर माह दो हजार रुपये देकर आर्थिक मदद करती है। वृंदावन में करीब साढ़े आठ सौ, बनारस में दो सौ और देवली गांव में तकरीबन डेढ़ सौ निराश्रित महिलाएं हैं। अन्य शहरों में आश्रय सदनों की योजना नहीं है। पांच शताब्दी पहले से चली आ रही है ये परंपरा1