यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 16, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
इच्छाशक्ति पर विजय ही सच्ची शक्ति उपासना
राग से विराग की ओर, विकार से विकास की ओर, असत्य से सत्य की ओर, तम से ज्योति की ओर..और ...और पढ़ें

राग से विराग की ओर, विकार से विकास की ओर, असत्य से सत्य की ओर, तम से ज्योति की ओर..और तामसी प्रवृत्ति से सद्गुणों की ओर-यही उद्देश्य है उपासना और उपवास का। उपवास यानी अपने ईष्ट के करीब पहुंचना..यानी उस जैसा बनना। यह तभी मुमकिन है जबकि अपना आचरण ईष्ट जैसा बनाएंगे। इसके लिए जरूरी है तन और मन में समाए विकार को विदाई देना। तन-मन में जगह बना चुकीं व्याधि, राग-द्वेष को खुद से दूर करना। लिहाजा जरूरी है तेज रफ्तार से दौड़ती जिंदगी में तेजी से शामिल हो रहीं गैर जरूरी वस्तुओं और आदतों को पहचानें और खुद से दूर करें। शौक की जगह त्याग और आकर्षण की जगह संयम को स्थान देकर दुनियावी और मायावी छल से बचें। फास्ट लाइफ के नाम पर बढ़े फास्ट फूड से जन्म रहीं शारीरिक विकृतियों को फलाहार रूपी एंटी आक्सीडेंट से काउंटर करें।
इससे ही निरोगी काया के साथ आत्मबल और मजबूत इच्छाशक्ति का विकास होगा। साथ ही मिलेगी विनाश रूपी विकार से मुक्ति। यही सार है नवरात्र में नौ दिन के उपवास का। यही संदेश देते हैं हमारे मंडल के मान्य देवी धाम जहां नौ दिन लगातार श्रद्धा और आस्था का मेला नजर आता है। बात चाहें मुरादाबाद के लालबाग काली मंदिर की हो या सम्भल के कैला देवी अथवा चन्दौसी के मौलागढ़ धाम की। या फिर रामपुर में माई का थान मंदिर हो अथवा अमरोहा का वनखंडी चौरासी घंटा मंदिर-सभी के मूल में नौ दिन शक्ति उपासना के बीच आत्म संयम से इच्छाशक्ति को मजबूत करने का असल मकसद निहित है। आइए इसे आत्मसात करें और नवसंवत्सर पर सदबदलाव का संकल्प लें।
[मृगांक पांडेय]
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