विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

Shani Dev Katha: क्या आप भी शनिदेव से डरते हैं? इस पौराणिक कथा को पढ़कर बदल जाएगा आपका नजरिया

Published: Sat, 14 Mar 2026 07:30 AM (IST)Updated: Sat, 14 Mar 2026 08:46 AM (IST)

शनि देव व्रत कथा और राजा विक्रमादित्य की पौराणिक कहानी। पढ़ें क्यों शनि देव को न्याय का देवता कहा जाता ...और पढ़ें

Shani Dev Vrat Katha: शनि देव व्रत कथा (Image Source: AI-Generated)

Shani Dev Vrat Katha: शनि देव व्रत कथा (Image Source: AI-Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

धर्म डेक्स, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शनि देव (Shani Dev) को 'न्याय का देवता' माना जाता है। बहुत से लोग उनसे डरते हैं, लेकिन असल में शनि देव बुरे नहीं, बल्कि हमारे कर्मों का हिसाब रखने वाले देवता हैं। उनकी व्रत कथा हमें धैर्य और अहंकार से दूर रहने की सीख देती है।

अक्सर हम अपनी सफलता और शक्ति के नशे में यह भूल जाते हैं कि समय कभी भी बदल सकता है। शनि देव की व्रत कथा (Shani Dev ki Vrat Katha) भी एक ऐसे ही प्रतापी राजा 'विक्रमादित्य' की कहानी है, जिनका अहंकार शनि देव के एक फैसले ने चूर-चूर कर दिया था।

शनिवार व्रत कथा (Shanidev Vrat Katha)

एक समय स्वर्गलोक में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि नौ ग्रहों में से सबसे बड़ा कौन है। यह विवाद इतना आगे चला गया कि यह एक युद्ध की स्थिति बन गई। इस बात के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुंच गए। उन्होंने कहा, 'हे देवराज! अब आप ही निर्णय करें कि हम सब में से बड़ा कौन है।

देवताओें द्वारा पूछा गए सवाल से देवराज इंद्र उलझन में पड़ गए। इंद्र देव ने कहा कि मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता हूं। मैं असमर्थ हूं। इस सवाल का जवाब पाने के लिए वो सभी पृथ्वीलोक में उज्जयिनी नगरी के राजा विक्रमादित्य के पास गए।

राजा विक्रमादित्य के महल पहुंचकर सभी देवताओं ने प्रश्न किया। इस पर राजा विक्रमादित्य भी असमंजस में पड़ गए। वो सोच रहे थे कि सभी के पास अपनी-अपनी शक्तियां हैं जिसके चलते वो महान हैं। अगर किसी को छोटा या बड़ा कहा गया तो उन्हें क्रोध के कारण काफी हानि हो सकती है। इसी बीच राजा को एक तरीका सूझा।

उन्होंने 9 तरह की धातु बनवाई जिसमें स्वर्ण, रजत (चांदी), कांसा, ताम्र (तांबा), सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे शामिल थे। राज ने सभी धातुओं को एक-एक आसन के पीछे रख दिया। इसके बाद उन्होंने सभी देवताओें को सिंहासन पर बैठने के लिए कहा। धातुओं के गुणों के अनुसार, सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवाकर उन्होंने देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा।

Shani Vrat

(Image Source: AI-Generated)

जब सभी देवताओं ने अपना-अपना आसन ग्रहण कर लिया तब राजा विक्रमादित्य ने कहा- 'इस बात का निर्णया हो चुका है। जो सबसे पहले सिंहासन पर बैठा है वही बड़ा है।' यह देखकर शनि देवता बहुत नाराज हुए उन्होंने कहा, 'राजा विक्रमादित्य! यह मेरा अपमान है। तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाया है। मैं तुम्हारा विनाश कर दूंगा। तुम मेरी शक्तियों को नहीं जानते हो।'

शनि ने कहा- 'एक राशि पर सूर्य एक महीने, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं। लेकिन मैं किसी भी राशि पर साढ़े सात वर्ष रहता हूं। मैंने अपने प्रकोप से बड़े-बड़े देवताओं को पीड़ित किया है। वो मेरा ही प्रकोप था कि राम को वन में जाकर रहना पड़ा था क्योंकि उनपर साढ़े साती थी। रावण की मृत्यु भी इसी कारण हुई। अब तू भी मेरे प्रकोप से नहीं बच पाएगा। शनिदेव ने बेहद क्रोध में वहां से विदा ली। वहीं, बाकी के देवता खुशी-खुशी वहां से चले गए।

यह भी पढ़ें- Dasha Mata ki Katha: घर में चल रही है भयंकर दरिद्रता? आज ही पढ़ें दशा माता की ये पावन कथा

यह भी पढ़ें- ब्रह्मा जी को क्यों मिला अपनी ही पत्नी से श्राप, जिसका आज भी दिखाई देता है प्रभाव

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।