कैसे हुर्इ कांवड़ यात्रा की शुरूआत

1- कहते हैं कि भगवान परशुराम, शिव जी के पूजन के लिए पुरा महादेव में मंदिर की स्थापना करने के बाद कांवड़ में गंगाजल भर कर पदयात्रा करके आये आैर उस जल से शंकर जी का अभिषेक कर कांवड़ परंपरा की शुरुआत की थी। वही पदयात्रा कांवड़ यात्रा का आधार मानी जाती है। वैसे कर्इ आैर कथायें भी कांवड़ यात्रा से जुड़ी हैं।

2- जैसे एक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने से शिव जी की देह जलने लगी तो उसे शांत करने के लिए देवताआें ने विभिन्न पवित्र नदियों आैर सरोवरों के जल से उन्हें स्नान कराया। तभी से सावन माह में कांवड़ में दूर-दूर से पवित्र जल लाकर शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा प्रारंभ हुर्इ। 

3- एक कथा ये भी है कि समुद्र मंथन के बाद शिव जी को ताप से शांति दिलाने के लिए रावण द्वारा कांवड़ में जल ला कर शिव जी को शांति प्रदान करने का प्रयास किया था, परंतु इन सब में सबसे ज्यादा प्रचलित कथा परशुराम जी की ही है।  

संतान प्राप्ति के वरदान की अपेक्षा 

प्रतिवर्ष सावन मास की चतुर्दशी के दिन पवित्र नदियों के जल से शिव मंदिरों में शंकर जी का अभिषेक किया जाता है। वैसे तो ये एक धार्मिक परंपरा है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी हैं। मान्यता है कि कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए हैं। इसके अतिरिक्त पौराणिक मान्यताआें के अनुसार ये तो विश्वास किया ही जाता है कि सावन में कांवड़ के माध्यम से जल अर्पण करने से पुण्य प्राप्त होता है, परंतु ये भी मान्यता है कि कांवड़ यात्रा के बाद जल चढ़ाने पर भगवान भोलेनाथ से संतान प्राप्ति का आर्शिवाद मिलता है। इसके अलावा अलग अलग जगहों की अपनी मान्यताएं हैं, जैसे कहा जाता है कि परशुराम द्वारा उत्तर प्रदेश प्रांत के बागपत के पास मौजूद पुरा महादेव में गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लाकर जिस शिवलिंग काजलाभिषेक किया गया था। उस पर कांवड़ के जल को चढ़ाने से कामना पूर्ति का वरदान मिलता है। 

सम्पूर्ण भारत में भी है प्रचलन 

उत्तर भारत में भी गंगा के किनारे के क्षेत्रों में कांवड़ का बहुत महत्व है। राजस्थान के मारवाड़ी समाज में गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ के तीर्थ पुरोहित जो जल लाते हैं और प्रसाद के साथ जल देते हैं, उन्हें कांवड़िये कहते हैं। ये लोग गोमुख से जल भरकर रामेश्वरम में ले जाकर भगवान शिव का अभिषेक करते थे। आगरा जिले के पास बटेश्वर में, जिन्हें ब्रह्मलालजी महाराज के नाम से भी जाना जाता है, भगवान शिवजी का शिवलिंग रूप के साथ-साथ पार्वती, गणेश का मूर्ति रूप भी है। सावन मास में कासगंज से गंगाजी का जल भरकर लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव का कांवड़ यात्रा के माध्यम से अभिषेक करते हैं। 

जानिए ये अनोखी कथा 

वैसे तो सम्पूर्ण उत्तर भारत में कांवड़ यात्रा का महात्म्य है पर इसके साथ कर्इ अन्य राज्यों में कांवड़ की परंपरा देखी जाती है। राजस्थान के मारवाड़ी समाज में गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ के तीर्थ पुरोहित जल लाते हैं और प्रसाद के साथ देते हैं, उन्हें कांवड़िये कहते हैं। इसी दक्षिण में भी कांवड़ की परंपरा है यहां गोमुख से जल भरकर रामेश्वरम में ले जाकर भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। कांवड़ यात्रा के साथ एक विचित्र कथा भी जुड़ी है। कासगंज में एक स्थान पर 101 मंदिर स्थापित हैं। इसके बारे में एक प्रचलित है कि दो मित्र राजाओं ने संकल्प किया कि हमारे पुत्र अथवा कन्या होने पर दोनों का विवाह करेंगे। परंतु दोनों के यहां पुत्री संतानें हुईं। एक राजा ने ये बात सबसे छिपा ली और विदाई का समय आने पर उस कन्या ने, जिसके पिता ने उसकी बात छुपाई थी, अपने मन में संकल्प किया कि वह यह विवाह नहीं करेगी और अपने प्राण त्याग देगी। उसने यमुना नदी में छलांग लगा दी। जल के बीच में उसे भगवान शिव के दर्शन हुए और उसकी समर्पण की भावना को देखकर भगवान ने उसे वरदान मांगने को कहा। तब उसने कहा कि मुझे कन्या से लड़का बना दीजिए तो मेरे पिता की इज्जत बच जाएगी। इसके लिए भगवान ने उसे निर्देश दिया कि तुम इस नदी के किनारे मंदिर का निर्माण करना। यह मंदिर उसी समय से मौजूद है। यहां पर कांवड़ यात्रा के बाद जल चढ़ाने पर अथवा मान्यता करके जल चढ़ाने पर पुत्र संतान की प्राप्ति होती है।  

Posted By: Molly Seth