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सुख-समृद्धि और आरोग्य की है कामना? गंगा सप्तमी पर विधि-विधान से पढ़ें मां गंगा के ये सिद्ध स्तोत्र

Published: Wed, 22 Apr 2026 05:32 PM (IST)

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर गंगा सप्तमी मनाई जाती है, जो इस बार 23 अप्रैल को मनाई जाएगी।

गंगा सप्तमी 2026 (Picture Credit- AI Generated)

गंगा सप्तमी 2026 (Picture Credit- AI Generated)

HighLights

  1. गंगा सप्तमी पर गंगा स्नान से मिलती है पापों से मुक्ति

  2. यदि जाना संभव न हो, तो घर पर ही गंगाजल मिलाकर करें स्नान

  3. श्री गंगाष्टकम और गंगा स्तोत्र पाठ से पाएं मां गंगा की कृपा

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। धार्मिक मत है कि इस दिन किए गए गंगा स्नान से साधक को पिछले जन्म के पापों से भी मुक्ति मिल जाती है। लेकिन अगर आपके लिए गंगा स्नान करना संभव नहीं है, तो आप घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर भी स्नान कर सकते हैं। इसी के साथ आपको गंगा सप्तमी के पावन अवसर पर गंगा माता के स्तोत्र और श्री गंगाष्टकम के पाठ से भी लाभ मिल सकता है।

इस मुहूर्त में करें स्नान

गंगा सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त - प्रातः 4 बकर 20 मिनट से प्रातः 5 बजकर 4 मिनट तक

गंगा सप्तमी पर मध्याह्न मुहूर्त में पूजा, स्नान और दान का मुहूर्त -

गंगा सप्तमी मध्याह्न मुहूर्त - सुबह 11 बजकर 1 मिनट से दोपहर 1 बजतक 38 मिनट तक

Ganga Katha ग

॥ श्री गंगाष्टकम॥

भगवति तव तीरे नीरमात्राशनोऽहं

विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि।

सकलकलुषभङ्गे स्वर्गसोपानसङ्गे

तरलतरतरङ्गे देवि गङ्गे प्रसीद॥1॥

भगवति भवलीलामौलिमाले तवाम्भः

कणमणुपरिमाणं प्राणिनो ये स्पृशन्ति।

अमरनगरनारीचामरग्राहिणीनां

विगतकलिकलङ्कातङ्कमङ्के लुठन्ति॥2॥

ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती

स्वर्लोकादापतन्ती कनकगिरिगुहागण्डशैलात्स्खलन्ती।

क्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूनिर्भरं भर्त्सयन्ती

पाथोधिं पुरयन्ती सुरनगरसरित्पावनी नः पुनातु॥3॥

मज्जन्मातङ्गकुम्भच्युतमदमदिरामोदमत्तालिजालं

स्नानैः सिद्धाङ्गनानां कुचयुगविगलत्कुङ्कुमासङ्गपिङ्गम्।

सायंप्रातर्मुनीनां कुशकुसुमचयैश्छन्नतीरस्थनीरं

पायान्नो गाङ्गमम्भः करिकलभकराक्रान्तरंहस्तरङ्गम्॥4॥

आदावादिपितामहस्य नियमव्यापारपात्रे जलं

पश्चात्पन्नगशायिनो भगवतः पादोदकं पावनम्।

भूयः शम्भुजटाविभूषणमणिर्जह्नोर्महर्षेरियं

कन्या कल्मषनाशिनी भगवती भागीरथी दृश्यते॥5॥

शैलेन्द्रादवतारिणी निजजले मज्जज्जनोत्तारिणी

पारावारविहारिणी भवभयश्रेणीसमुत्सारिणी।

शेषाहेरनुकारिणी हरशिरोवल्लीदलाकारिणी

काशीप्रान्तविहारिणी विजयते गङ्गा मनोहारिणी॥6॥

कुतो वीचिर्वीचिस्तव यदि गता लोचनपथं

त्वमापीता पीताम्बरपुरनिवासं वितरसि।

त्वदुत्सङ्गे गङ्गे पतति यदि कायस्तनुभृतां

तदा मातः शातक्रतवपदलाभोऽप्यतिलघुः॥7॥

गङ्गे त्रैलोक्यसारे सकलसुरवधूधौतविस्तीर्णतोये

पूर्णब्रह्मस्वरूपे हरिचरणरजोहारिणि स्वर्गमार्गे।

प्रायश्चित्तं यदि स्यात्तव जलकणिका ब्रह्महत्यादिपापे

कस्त्वां स्तोतुं समर्थस्त्रिजगदघहरे देवि गङ्गे प्रसीद॥8॥

मातर्जाह्नवि शम्भुसङ्गवलिते मौलौ निधायाञ्जलिं

त्वत्तीरे वपुषोऽवसानसमये नारायणाङ्घ्रिद्वयम्।

सानन्दं स्मरतो भविष्यति मम प्राणप्रयाणोत्सवे

भूयाद्भक्तिरविच्युताहरिहराद्वैतात्मिका शाश्वती॥9॥

गङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतो नरः।

सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥10॥

॥ इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं श्रीगङ्गाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

श्री गंगा अष्टकम्, आदि शंकराचार्य द्वारा रचित मां गंगा की स्तुति है। ऐसे में अगर गंगा सप्तमी के अवसर पर आप इस स्तुति का पाठ करते हैं, तो इससे आपको गंगा माता की कृपा और पवित्रता प्राप्त होती है।

Ganga Stotra I (1)


(Picture Credit- AI Generated)

॥ गंगा माता स्तोत्रम् ॥

देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गेत्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे।

शङ्करमौलिविहारिणि विमले मममतिरास्तां तव पदकमले॥1॥

भागीरथिसुखदायिनि मातस्तवजलमहिमा निगमे ख्यातः।

नाहं जाने तव महिमानंपाहि कृपामयि मामज्ञानम्॥2॥

हरिपदपाद्यतरङ्गिण गङ्गेहिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे।

दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारंकुरु कृपया भवसागरपारम्॥3॥

तव जलममलं येन निपीतंपरमपदं खलु तेन गृहीतम्।

मातर्गंगे त्वयि यो भक्तःकिल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः॥4॥

पतितोद्धारिणि जाह्नविगङ्गे खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे।

भीष्मजननि हे मुनिवरकन्येपतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये॥5॥

कल्पलतामिव फलदां लोकेप्रणमति यस्त्वां न पतति शोके।

पारावारविहारिणि गङ्गेविमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे॥6॥

तव चेन्मातः स्रोतः स्नातःपुनरपि जठरे सोपि न जातः।

नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गेकलुषविनाशिनि महिमोत्तुड़े॥7॥

पुनरसदंगे पुण्यतरंगे जयजय जाह्नवि करुणापांगे।

इंद्रमुकुटमणिराजितचरणेसुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये॥8॥

रोगं शोकं तापं पापं हरहर मे भगवति कुमतिकलापम्।

त्रिभुवनसारे वसुधाहारेत्वमसि गतिर्मम खलु संसारे॥9॥

अलकानन्दे परमानन्दे कुरुकरुणामयि कातरवन्द्ये।

तव तटनिकटे यस्य निवासःखलु वैकुण्ठे तस्य निवासः॥10॥

वरमिह नीरे कमठो मीनःकिं वा तीरे शरटः क्षीणः।

अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तवन हि दूरे नृपतिकुलीनः॥11॥

भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्येदेवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये।

गङ्गास्तवमिमममलं नित्यंपठति नरो यः स जयति सत्यम्॥12॥

येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषांभवति सदा सुखमुक्तिः।

मधुराकान्तापज्झटिकाभिःपरमानन्दकलितललिताभिः॥13॥

गंगास्तोत्रमिदं भवसारंवाञ्छितफलदं विमलं सारम्।

शङ्करसेवकशङ्कररचितंपठति सुखीः तव इति च समाप्तः॥14॥

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं गङ्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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