आश्रि्वन कृष्ण नवमी बुधवार (17 सितंबर) 17 दिवसीय गया श्राद्ध का दशम दिवस है। इस तिथि को नागकूट पर्वत पर स्थित राम गया तीर्थ में श्राद्ध होता है। राम गया तीर्थ से दक्षिण समीप में ही चामुंडा देवी की पूजा श्री राम ने सीता के साथ की थी और रात्रि विश्राम किया था।

सीता के साथ राम गया में श्रीराम ने श्राद्ध किया था। रामगया में श्रीराम लक्ष्मण एवं सीता की मूर्ति को भरत जी ने स्थापित किया था। यह स्थल भरताश्रम कहलाता है। यहां रामेश्वर महादेव, वामन मूर्ति, पुरुषोत्तम मूर्ति तथा सनक-सनन्दन- सनत्कुमार-सनातन मूर्ति हैं। इनके दर्शन नमस्कार पितृ उद्धारक हैं। इसके बाद सीता कुंड तीर्थ में बालू का तीन पिंड दिया जाता है। सौभाग्य की सामग्री का दान यहां होता है। इसे सौभाग्य की वृद्धि होती है।

आनंद रामायण के अनुसार श्राद्ध सामग्री लाने के लिए श्रीराम लक्ष्मण के चले जाने पर सीता ने बालू का पिंड देकर अपने श्वसुर दशरथ जी को तृप्त किया था। श्राद्ध का मुहूर्त आने पर दशरथ ने पिंड सामग्री के अभाव में बालू का पिंड देने के लिए सीता को विवश किया था। इस घटना के प्रत्यक्ष द्रष्टा थे- फल्गु नदी, गाय, केतकी पुष्प, पंडा ब्राहमण एवं वटवृक्ष। श्रीराम के पूछने पर एक मात्र वट वृक्ष ने घटना को सत्य बतलाया किंतु अन्य चारों ने घटना की सत्यता की पुष्टि नहीं की। कुपित होकर सीता ने फल्गु को अंत:सलिला हो जाने का, गाय को विष्ठाभक्षी हो जाने का, केतकी पुष्प को देवपूजन से वंचित रहने का तथा पंडा ब्राहमण को धनाभाव में भटकते रहने का शाप दिया। साथ ही वट वृक्ष को महाप्रलय में भी अक्षय रहने का वरदान दिया। उस काल से इनका नाम अक्षयवट हुआ। यह अक्षयवट गयाधाम में, प्रयाग में, उज्जैन में, वृंदावन में तथा कुमुद्वतीपुरी में है।

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