शिमला (ताराचंद शर्मा) : त्रिगुणात्मक शक्तिपीठ धाम तारादेवी मंदिर ताख भारत वर्ष के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला शहर की दक्षिण दिशा के सामने ताख पर्वत के शिखर पर स्थित यह भव्य धार्मिक स्थान लोगों की श्रद्धा का विशेष केंद्र है। विपदा-आपदा हरने वाली कल्याणकारी त्रिगुणात्मक शक्तिपीठ धाम तारा देवी मंदिर नाम से जाना जाता है एवं ग्रामीणों में 'ताखÓ नाम से प्रसिद्ध है। माना जाता है कि तारा देवी मां क्योंथल रियासत के राजपरिवार की कुलदेवी है। क्योंथल रियासत के राज परिवार सेनवंश का है। एक कथा के अनुसार राजा भूपेंद्र सेन जुनबा से गांव जुग्गर शिलगांव के जंगल में आखेट करने निकले। जहां पर मां भगवती तारा के सिंह की गर्जना झाडिय़ों से राजा को सुनाई दी फिर एक स्त्री की आवाज गूंजी। राजन मैं तुम्हारी कुलदेवी हूं जिसे तुम्हारे पूर्वज बंगाल में ही भूल से छोड़कर आए थे। तुम यहीं मेरा मंदिर बनवाकर मेरी मूर्ति स्थापित करो। मैं तुम्हारे कुल एवं पूजा की रक्षा करूंगी। राजा ने तत्काल गांव जुग्गर में दृष्टांत वाली जगह पर मंदिर बनवाकर एवं चतुर्भुजा तारा की मूर्ति बनवाकर विधिवत प्रतिष्ठा कर दी जिससे यह तारा देवी का उत्तर भारत का मूल स्थान बन गया।
तारा भगवती के विपुल एवं रोमांचक तेज के आगे असावधानी होने से भी देवी कुपित हो जाती हैं। तारा मूल स्थान जुग्गर में काफी पहले तारा देवी मंदिर खंडहर बन चुका था जिसके पत्थर शेष मात्र थे। नवमंदिर निर्माण का खाका जय शिव सिंह चंदेल सहित अन्य श्रद्धालुओं ने तैयार करवाया।
पौराणिक एवं सिद्ध मान्यता है कि जब-जब तारा देवी मंदिर के आसपास के गांवों में महामारी चेचक, प्लेग, हैजा एवं पशुओं में खुररोग, मुंहरोग, मस्से आदि फैले तब तब यहां लोकाचार मन्नत पद्धति एवं अनुष्ठान से सारी विभूतियों से प्रभावित श्रद्धालुओं ने मुक्ति पाई है। आज भी प्रदेश सहित देशभर से लोग यहां आते हैं और मन्नत मांगते हैं। भक्तों की सभी मन्नते माता पूरी करती हैं।
पौराणिक कथानुसार राजा चंद्रसेन को देवी ने स्वप्न में दर्शन दिए कि वह जुग्गर मंदिर के सामने ऊपर शिखर पर मेरा मंदिर बनाकर मूर्ति प्रतिष्ठित करे राजा ने ताख पहाड़ के चलुसीया नाम के शिखर पर मंदिर बनवाकर मूर्ति प्रतिष्ठित कर दी। मां तारा अंबा ने राजा को फिर स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि मेरी इच्छा जुग्गर के सामने दक्षिण दिशा में पर्वत शिखर पर मंदिर की थी और कहा कि राजन तेरे महल से जहां तक चींटियों की कतार लगी मिले, उस पर चलते जाना जहां समाप्त होगी उसी शिखर पर्वत पर मेरा मंदिर निर्मित करके मेरा विगृह स्थापित करना।
प्रात: उठकर राजा ने महल के द्वार के पास से चींटियों की कतार देखी जिसके साथ-साथ चल बियावान वृक्षों एवं झाडिय़ोंसे होता हुआ ताख शिखर के पहाड़ी पर आनंदपुर की ओर से जा पहुंचा वहां पर चींटियों की कतार समाप्त देख मंदिर निर्माण कार्य आरंभ कर दिया। मंदिर निर्मित होने पर राजा ने काष्ठ विगृह तारा चर्तुभुज एवं अष्टभुज रूप में स्थापित कर दी तत्पश्चात मूल धानुनिर्मित मूर्ति जुग्गर से विधि विधान सहित ले जाकर तारा देवी मंदिर में स्थापित कर दी।

कैसे पहुंचें
यहां पहुंचने के लिए राजधानी शिमला से सात किलोमीटर व उसके बाद पांच किलोमीटर पैदल तिरछे मार्ग से होकर जाना पड़ता है। मार्ग में बान, ब्रांस, काले भोंरे, देवदार के घने जंगल आते हैं। दूसरा मार्ग शिमला से तारा देवी मंदिर तक 18 किलोमीटर सड़क द्वारा है। इसके अलावा चंडीगढ़ की ओर से आने वाले श्रद्धालुओं को शोघी से तारादेवी मार्ग पर जाना होता है यह मार्ग मंदिर परिसर तक जाता है।

मंदिर ट्रस्टी कृष्ण चंद ठाकुर का कहना है कि मंदिर के नए भवन का निर्माण किया जा रहा है। करीब एक वर्ष में निर्माण कार्य पूर्ण हो जाएगा। मंदिर की यज्ञ शाला में माता की मूर्ति स्थापित की गई है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की प्रत्येक सुविधा का ख्याल रखने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।