तिब्बत वर्तमान में चीन के अधीन है। कभी यह क्षेत्र स्वतंत्र राष्ट्र हुआ करता था, जहां देव संस्कृति की गंगा बहा करती थी। तिब्बत के संबंध में निम्न तथ्य दृष्टव्य हैं :

तिब्बत में ही मानसरोवर एवं कैलास पर्वत अवस्थित है। इनका यहां होना ही इस बात का संकेत है कि यह देव संस्कृति का प्रमुख क्षेत्र था। भारत से तमाम तीर्थयात्री कैलास-मानसरोवर की यात्रा करने के लिए प्रतिवर्ष वहां जाते हैं।

तिब्बती भाषा में आज भी संस्कृत शब्दों का बाहुल्य इसकी देववाणी से निकटता को स्पष्ट करता है।

तिब्बत में दीपावली जैसे त्योहार एवं विवाह आदि के संस्कार भारतीय संस्कृति से मिलते-जुलते हैं।

तिब्बत के राजा श्रोंग-गचन-गम-पो की दो रानियां थीं, जो बौद्ध धर्म की अनुयायी थीं। तिब्बती सम्राट ने उनके पूजापाठ के लिए बौद्ध मंदिरों का निर्माण कराया था। बाद में राजा ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार शुरू हो गया।

चीन और भारत से अनेक बौद्ध मूर्तियां तिब्बत ले जाई गईं, जिन्हें चैत्यों व मंदिरों का निर्माण कराकर प्रतिष्ठित किया गया।

श्रोंग ने तिब्बती भाषा के लिए लिपि तैयार कराई थी, जिसे गुप्त युग की ब्राहमाी लिपि के आधार पर बनाया गया।

तिब्बत के शक्तिशाली सम्राटों में एक खि-श्रोंग-ल्दे-ब्चन ने नालंदा महाविहार के प्रसिद्ध आचार्य शांतिरक्षित को बौद्ध धर्म का उपदेश देने के लिए आमंत्रित किया। इससे बौद्ध धर्म नए रूप में संगठित हुआ।

आचार्य शांतिरक्षित ने ही तिब्बत में पहले महाविहार की नींव डाली एवं भिक्षुसंघ की स्थापना की।

साभार : देव संस्कृति

विश्वविद्यालय, हरिद्वार