Kukurdev Mandir: दुनिया में मंदिरों की कमी नहीं है। अगर भगवान शिव के मंदिरों की बात करें तो उनके हर मंदिर में उनके पास नंदी जरूर होते हैं। क्योंकि इन्हें भोलेनाथ का वाहन माना गया है। लेकिन भारत में एक ऐसा मंदिर भी है जहां शिवजी के साथ नंदी नहीं बल्कि कुकुरदेव को पूजा जाता है। यह अनोखा मंदिर छत्तीसगढ़ में है। यह मंदिर रायपुर से करीब 132 किलोमीटर दूर दुर्ग जिले के खपरी गांव में स्थित है। इस मंदिर का नाम भी कुकुरदेव के नाम पर ही रखा गया है। मान्यता है कि यह मंदिर एक वफादार कुत्ते की याद में बनाया गया है। ऐसे में यह मंदिर एक स्मारक है। कुकुरदेव के इस मंदिर के पीछे एक पौराणिक कथा है जिसका वर्णन हम यहां कर रहे हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सदियों पहले एक बंजारा था जो अपने परिवार के साथ रहने के लिए इस गांव में आया था। इस बंजारे का नाम मालीघोरी था। बंजारे का एक पालतू कुत्ता भी था। एक बार अकाल पड़ गया और उसे अपने कुत्ते को साहूकार के पास गिरवी रखना पड़ गया। फिर एक दिन साहूकार के घर चोरी हो गई। साहूकार के घर जिन चोरों ने चोरी की थी उन सभी को उस कुत्ते ने देख लिया था। उन सभी ने चोरी का माल तालाब में छुपाया था। कुत्ता साहूकार को उसी स्थान पर ले गया जहां पर साहूकार के घर से चोरी किया हुआ सामान छिपाया गया था।

साहूकार को उसे कुत्ते की वफादारी भा गई। उसने उसे अपने मालिक के पास जाने के लिए मुक्त कर दिया। साथ ही उसके गले में चिट्ठी लिखकर टांग दी कि वो कितना वफादार है। लेकिन जैसे ही वो कुत्ता अपने मालिक यानी बंजारे के पास पहुंचा तो उसे लगा कि वो साहूकार के यहां से भागकर आया है। बंजारे ने उस कुत्ते को पीट-पीटकर मार डाला। लेकिन बाद में उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। अपनी गलती पर पछतावा करते हुए उसने उस कुत्ते की प्रतिमा बनवाई और सभी गांव वाले उसे पूजने लगे।

इस मंदिर के गर्भगृह में उसी कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है। इसके बराबर में एक शिवलिंग भी मौजूद है। इस मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं-15वीं शताब्दी में कराया गया था। इसके बाद से ही यहां पर कुकुरदेव की पूजा की जाती है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। यहां पर सावन के महीने में बहुत बड़ा मेला लगता है।

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