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अदभुद वास्‍तुकला का प्रतीक है मार्तण्ड सूर्य मंदिर

बर्फ से ढंके हुए पहाड़ों की पृष्ठभूमि में सूर्य को समर्पित मार्तंड मंदिर की राजसी वास्तुकला का बेमिसाल नमूना माना जाता है।

By Molly SethEdited By: Published: Sat, 27 Jan 2018 04:04 PM (IST)Updated: Sun, 28 Jan 2018 10:00 AM (IST)
अदभुद वास्‍तुकला का प्रतीक है मार्तण्ड सूर्य मंदिर
अदभुद वास्‍तुकला का प्रतीक है मार्तण्ड सूर्य मंदिर
आठवीं सदी का निर्माण
मार्तण्ड सूर्य मंदिर इस मंदिर का निर्माण मध्यकालीन युग में 7वीं से 8वीं शताब्दी के दौरान हुआ था। सूर्य राजवंश के राजा ललितादित्य ने इस मंदिर को एक छोटे से शहर अनंतनाग के पास एक पठार के ऊपर स्‍थापित किया था। इसकी गणना ललितादित्य के प्रमुख कार्यों में की जाती है। इसमें 84 स्तंभ हैं जो नियमित अंतराल पर रखे गए हैं। मंदिर को बनाने के लिए चूने के पत्थर की चौकोर ईंटों का उपयोग किया गया है, जो उस समय के कलाकारों की कुशलता को दर्शाता है। मंदिर की राजसी वास्तुकला इसे अलग बनाती है। बर्फ से ढंके हुए पहाड़ों की पृष्ठभूमि के साथ केंद्र में यह मंदिर करिश्मा ही कहा जाएगा। इस मंदिर से कश्मीर घाटी का मनोरम दृश्य भी देखा जा सकता है। कारकूट वंश के राजा हर्षवर्धन ने ही 200 साल तक मध्‍य एशिया सहित अरब देशों में राज किया था। पहलगाम का मशहूर शीतल जल वाला चश्मा इसी वंश से संबंधित है।
अब भी मिलते हैं प्राचीन अवशेष
ऐसी किंवदंती है कि सूर्य की पहली किरण निकलने पर राजा अपनी दिनचर्या की शुरुआत सूर्य मंदिर में पूजा कर चारों दिशाओं में देवताओं का आह्वान करने के बाद करते थे। वर्तमान में खंडहर हो चुके इस मंदिर की ऊंचाई भी अब 20 फुट ही रह गई है। मंदिर में तत्कालीन बर्तन आदि अभी भी मौजूद हैं। कश्मीरियों को चार सौ साल बाद मार्तंड के सूर्य मंदिर की याद फिर से आ गई है। चौदह सौ साल पुराने इस मंदिर में एक बार फिर आहुति डालने की तैयारियाँ चरमोत्कर्ष पर हैं। इतना जरूर है कि यह मंदिर, जो खंडहरों में तब्दील हो चुका है, आज भी सैलानियों को अपनी ओर खींचने की शक्ति रखता है।
 

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