गणपति उत्सव में होती है विशेष रौनक 

महाराष्ट्र का श्री मयूरेश्वर मंदिर श्री गणेश का प्रसिद्घ मंदिर है। यहां गणेश चतुर्थी को गणेश जी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। वैसे भी महाराष्ट्र का सबसे बड़ा उत्सव गणपति उत्सव होता है जो गणेश चतुर्थी से प्रंभ हो कर अनंत चर्तुदशी तक पूरे दस दिन चलता है। उत्सव के अंतिम दिन गणपति प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। मयूरेश्वर मंदिर के बारे में जानने के पहले जान लें कि क्यों ये मंदिर अष्टविनायकों में सम्मिलित है आैर किन मंदिरों को इसमें शामिल किया गया है। महाराष्ट्र में पुणे के समीप अष्टविनायक के आठ पवित्र मंदिर 20 से 110 किलोमीटर के क्षेत्र में मौजूद हैं। इन मंदिरों का पौराणिक और इतिहास महत्व बताया जाता है। मान्यता है कि मंदिरों की गणेश प्रतिमाएं स्वयंभू यानि जो स्वयं प्रगट हुई हैं, मानी जाती हैं। 'अष्टविनायक' के ये सभी आठ मंदिर बहुत पुराने और प्राचीन हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं, 1- मयूरेश्वर या मोरेश्वर मंदिर, पुणे, 2- सिद्धिविनायक मंदिर, अहमदनगर, 3- बल्लालेश्वर मंदिर, रायगढ़, 4- वरदविनायक मंदिर, रायगढ़, 5- चिंतामणी मंदिर, पुणे, 6- गिरिजात्मज अष्टविनायक मंदिर, पुणे, 7- विघ्नेश्वर अष्टविनायक मंदिर, ओझर आैर 8- महागणपति मंदिर, राजणगांव। इन सभी मंदिरों का महत्व गणेश और मुद्गल पुराण जैसे ग्रथों में भी वर्णित है।इन गणपति धामों की यात्रा को अष्टविनायक तीर्थ यात्रा के नाम से बुलाया जाता है। ये यात्रा इन पवित्र प्रतिमाओं के प्राप्त होने के क्रम के अनुसार ही की जाती है। क्रम के अनुसार दर्शन करने पर ही यात्रा पूर्ण मानी जाती है। 

श्री मयूरेश्वर मंदिर में मौजूद हैं चार युगों के चार द्वार 

मोरगांव का श्री मयूरेश्वर मंदिर अष्टविनायक के आठ प्रमुख मंदिरों में से एक है। कहते हैं कि मोरगाव का नाम मोर पर पड़ने की भी एक कथा है इसके अनुसार एक समय था जब यह स्थान मोरों से भरा हुआ था। यह गांव करहा नदी के किनारे पुणे से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। मयूरेश्वर मंदिर के चारों कोनों में मीनारें और लंबे पत्थरों की दीवारें हैं। मंदिर के चार द्वार हैं जिन्हें चारों युग, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग का प्रतीक माना जाता है। मंदिर के द्वार पर शिवजी के वाहन नंदी बैल की मूर्ति स्थापित है, जिसका मुंह भगवान गणेश की मूर्ति की ओर है। कुछ प्राचीन कथाआें के अनुसार एक बार भगवान शिव और नंदी इस मंदिर क्षेत्र में विश्राम के लिए रुके थे। नंदी को ये स्थान इतना भाया कि उन्होंने यहां से जाने से मना कर दिया आैर यहीं ठहर गए, तबसे उनकी प्रतिमा यहां स्थापित है। शिव के नंदी और गणपति के मूषक, दोनों ही मंदिर के रक्षक के रूप में यहां उपस्थित हैं। मंदिर में गणेशजी बैठी मुद्रा में विराजमान है आैर उनकी सूंड बार्इं ओर है। प्रतिमा की चार भुजाएं आैर तीन नेत्र हैं। यदी स्थानीय लोगों की मानें तो कहा जाता है कि प्रारंभ में ये मूर्ति आकार में छोटी थी, परंतु दशकों से इस पर सिन्दूर लगाने के कारण यह अब इतनी बड़ी दिखती है। एेसी भी मान्यता है कि स्वयं ब्रह्मा जी ने इस मूर्ति को दो बार पवित्र किया है जिसने यह अविनाशी हो गई है।

प्राचीन कथा के अनुसार इस स्थान पर श्री गणेश ने सिंधुरासुर राक्षस से मोर पर सवार होकर युद्घ किया आैर उसका वध कर दिया, इसी कारण यहां स्थित गणेशजी को मयूरेश्वर कहा जाता है।

Posted By: Molly Seth