मथुरा श्रीकृष्ण की नगरी जो अदुभूत है कान्हा के जन्मोत्सव पर मथुरा यूं ही नहीं इतराती है। भगवान श्रीकृष्ण की यह सबसे प्रिय नगरी है। अजन्मे गोंविंद मथुरा में जन्म लेते हैं। भगवान शंकर यहां के कोतवाल हैं। ब्रह्मा यहां के ग्वाला और बछड़ों का अपहरण कर लेते हैं। इंद्रदेव सात दिन और सात रात तक बारिश करते हैं। पद्म पुराण में उल्लेख है कि माथुरक नाम विष्णु को अत्यंत प्रिय है। हरिवंश पुराण में मथुरा का सुंदर रूप बताया गया है। कहा गया है कि मथुरा लक्ष्मी का निवास स्थल है। पृथ्वी का श्रंगार है। यह प्रभूत धन-धान्य से पूर्ण है। मथुरा को तीन लोक से न्यारी इसीलिए कहा गया है।

वराह पुराण में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि काशी में एक हजार वर्ष तक वास करने से जो पुण्य मिलता है, वह पुण्य मथुरा में एक क्षण वास करने से मिल जाता है, क्योंकि पाताल, अंतरिक्ष तथा भूलोक में मुङो मथुरा के समान कोई भी प्रिय नहीं है। भागवत के दशम स्कंद में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-मथुरा यत्र नित्यं सन्निहितो हरि: अर्थात मैं यहां नित्य निवास करता हूं, इसलिए विद्धान भी कहते हैं कि ब्रज तज अंत न जाइहों, मेरे हैं यह टेक, भूतल भार उतारिहों, धरियों रूप अनेक।

धर्म, कर्मकांड और ज्योतिष का देश में प्रति वर्ष 40 हजार करोड़ का कारोबार माना जाता है। इसमें मथुरा की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। देश के किसी भी तीर्थ स्थल से अधिक देसी-विदेशी यात्री हर साल यहां पहुंचते हैं। भागवत कथा और कर्मकांड में मथुरा-वृंदावन के पंडित, आचार्य और शास्त्री राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर उभर रहे हैं। पिछले दस सालों में लोक संगीत की डिमांड बढ़ी है, जो श्रीकृष्ण के संदेशों को ही अपने भाष्य में शामिल किए हुए हैं। एक अनुमान के अनुसार हर साल ब्रज पर्यटन और दान आदि समेत मथुरा करीब हजारों करोड़ का कारोबार कर रहा है।

Edited By: Preeti jha