आस्मां को छूते देवदार के हरे पेड़, कल-कल बहती नदियां, बर्फ से ढकी चोटियां, ग्लेशियर के नीचे से निकली पतली जलधारा जहां किसी को भी मोह ले, वहीं पथरीले पहाड़ की ढलान पर बना संकरा रास्ता और उसके नीचे गहरी खायी, जो डराती कम रोमांच ज्यादा पैदा करती है, इस तरह के प्राकृतिक दृश्यों को अपने दामन में समेटे अगर कोई यात्रा या स्थान है तो वह सिर्फ समुद्रतल से करीब 3888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्री अमरनाथ की पवित्र गुफा की तीर्थयात्रा।

यह वही पौराणिक गुफा है, जहां भगवान शिव ने देवी पार्वती को अमरत्व की कहानी सुनायी थी। कहानी सुनते सुनते देवी पार्वती सो गईं और कबूतरों के एक जोड़े ने कथा को सुन अमरत्व प्राप्त किया। हर वर्ष श्रावण मास के दौरान देश-विदेश से हजारों की तादाद में श्रद्धालु पवित्र गुफा में हिमलिंग स्वरुप में विराजमान होने वाले शिव-पार्वती और भगवान गणेश के दर्शन के लिए आते हैं।

एक जुलाई से अमरनाथ यात्रा आरंभ

भगवान अमरेश्र्वर की पवित्र गुफा की वार्षिक तीर्थयात्रा इस साल पहली जुलाई से शुरु हो रही है। तीर्थयात्रा के दो मुख्य आधार शीविर बाल्टाल और पहलगाम में हैं। बाल्टाल श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर जोजिला दर्रे के दामन में स्थित है, जबकि पहलगाम दक्षिण कश्मीर में लिद्दर दरिया किनारे बसा एक गांव। बाल्टाल से करीब 14 किमी. की यात्रा कर पवित्र गुफा पहुंचा जा सकता है। यह रास्ता अत्यंत कठिन है।

पहलगाम मार्ग से अमरनाथ यात्रा का महत्व

पहलगाम से पवित्र गुफा की दूरी बेशक 48 किमी. है, लेकिन पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक अगर तीर्थयात्रा का विधान और पुण्य प्राप्त करना है, तो यही मार्ग अपनाना चाहिए। भगवान शिव जब अमरत्व की कथा सुनाने के लिए अमरेश्र्वर गुफा में पहुंचे थे, तो उन्होंने इसी मार्ग से यात्रा करते हुए रास्ते में अपने साथियों को अलग-अलग जगहों पर छोड़ा था। भगवान अमरेश्र्वर की छड़ी मुबारक भी इसी मार्ग से पवित्र गुफा के लिए रवाना होती है। पहलगाम में उन्होंने अपने वाहन नंदी को छोड़ा। इसके करीब 16 किमी. दूर चंदनबाड़ी है। यहां वाहनों में भी लोग आ सकते हैं और पैदल भी। यहीं पर भगवान शिव ने अपने माथे से चंद्रमा को उतारकर छोड़ा और आगे बढ़े थे। चंदनबाड़ी में देवदार के पेड़ों की श्रृंखला के बीच पहाड़ी चोटियों को छूते सफेद ग्लेशियर को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने सफेद चादर बिछायी हो। पहलगाम से छड़ी मुबारक रवाना होने के बाद यहीं पर रात्रि विश्राम करती है।

पिस्सु घाटी: भगवान शिव से जुड़ी है कथा

पिस्सु टाप पथरीला रास्ता और खड़े पहाड़ों के बीच अगला पड़ाव पिस्सु घाटी है। चंदनबाड़ी से करीब चार किमी. की दूरी पर समुद्रतल से करीब 11500 फीट की ऊंचाई पर स्थित पिस्सु घाटी के शिखर पर खड़े पहाड़ को पिस्सु टाप कहते हैं। किवंदितयों के मुताबिक, भगवान शिव ने यहीं पर पिस्सु नामक एक जीवाणु को अपने शरीर से उतार छोड़ा था। एक अन्य कथा के मुताबिक, यह पहाड़ राक्षसों की हड्डियों से बना है। कहा जाता है कि देवता और असुर इसी रास्ते से भगवान शंकर की पूजा के लिए अमरेश्र्वर गुफा में जाते थे। एक बार रास्ते में देवता और असुर आपस में लड़ पड़े। देवताओं ने राक्षसों का यहां संहार किया और उनकी हड्डियों को जब एक जगह जमा किया गया तो यह पहाड़ बन गया।

शेषनाग झील: भोलेनाथ ने यहां छोड़े थे अपने नाग

पिस्सु टाप से आगे बढ़ते हुए चंदनबाड़ी से करीब 13 किमी. की दूरी पर शेषनाग झील है। समुद्रतल से करीब 12500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह झील पहाड़ों के बीच एक नगीने की तरह ही है। शेषनाग झील में ही भगवान शिव ने अपन गले में हमेशा आभूषणों की तरह विद्यमान रहने वाले नागों को छोड़ा था। श्रद्धालु यहां स्नान करते हैं और भोले भंडारी के जयघोष के साथ आगे बढ़ते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य के प्रेमियों के लिए इस झील, उसके आगे ग्लेशयिर और शेषनाग की आकृति की तरह नजर आने वाले पहाड़ का शिखर, देवदार के पेड़ और आसपास के वातावरण का माहौल उन्हें सम्मोहित कर किसी दूसरी दुनिया में ले जाने में समर्थ है। हालांकि यहां एक रेस्ट हाऊस है, लेकिन तीर्थयात्रा के समय यात्रियों की भीड़ के चलते बेहतर यही रहेगा कि आप अपने साथ टेंट लेकर चलें।

पंचतरणी की यात्रा: जहां शिवजी ने किया पंचतत्वों का त्याग

रात्रि विश्राम के बाद श्रद्धालु पंचतरणी के लिए अपनी यात्रा शुरू करते हैं। रास्ते में खड़ा सीधी चढ़ाई वाला महागुंस दर्रा जिसे गणेश टाप भी कहते हैं, किसी को भी रोमांचित कर दे। समुद्रतल से करीब 4276 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इसी पहाड़ पर भगवान शंकर ने अपने प्रिय पुत्र गणेश को छोड़ा था, ऐसा किवंदतियों में हैं। इसके बाद वह मां पार्वती के साथ अमरेश्र्वर गुफा के लिए आगे बढ़े थे। शेषनाग झील से करीब साढ़े चार किमी. गणेश टाप ट्रैकरों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है, लेकिन यहां श्रद्धालु नहीं रुकते, वह यात्रा जारी रखते हैं। गणेश टाप की थका देने वाली चढ़ाई के बाद आने वाला ढलावना रास्ता पंचतरणी तक पहुंचाता। आसपास की हरी भरी वादियों के बीच समुद्रतल से 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित पंचतरणी में ही भगवान शिव ने पवित्र गुफा में प्रवेश करने से पूर्व पंच तत्वों का परित्याग किया था।

पंचतरणी में बहने वाली छोटी-छोटी पांच सरिताएं इन्हीं पांच तत्वों का प्रतीक मानी जाती हैं और कहा जाता है कि यह शिव की जटा से निकली हैं। भैरव पहाड़ी की तलहटटी में स्थित पंचतरणी में कई श्रद्धालु रात्रि विश्राम करते हैं। भगवान अमरेश्र्वर की पवित्र छड़ी भी रक्षा बंधन की सुबह पवित्र गुफा में प्रवेश करने से पूर्व रात को यहीं पर विश्राम करती है। यहां ठंड खूब होती है, आक्सीजन की भी कमी रहती है। महाणेष टाप और पंचतरणी में करीब छह किमी. की दूरी है। पंचतरणी में हैलीपैड भी बना है।

अमरनाथ यात्रा का अंतिम चरण

पंचतरणी से भगवान अमरेश्र्वर की पवित्र गुफा की यात्रा का अंतिम चरण शुरू होता है। पंचतरणी से कुछ ही दूरी पर संगम का स्थान है, यहीं पर बाल्टाल से आने वाला रास्ता पवित्र गुफा की तरफ पहलगाम से आने वाले रास्ते से मिलता है। यहीं पर अमरावती और पंचतरणी का मेल भी होता है। पंचतरणी से पवित्र गुफा की छह किमी. की दूरी है। पवित्र गुफा में देवी पार्वती संग प्रवेश करने से पूर्व भगवान शंकर ने गुफा के चारों तरफ अग्नि प्रज्जवलित की थी ताकि कोई भी अन्य प्राणी भीतर प्रवेश न कर सके। पवित्र गुफा में श्रद्धालु भगवान शिव के पवित्र हिमलिंग स्वरुप के दर्शन कर वापस अपने घरों की तरफ प्रस्थान करते हैं।

बाल्टाल मार्ग

पवित्र गुफा की तरफ जाने वाला उत्तरी रास्ता जोजिला दर्रे के दामन में स्थित बाल्टाल से शुरू होता है। बाल्टाल से पवित्र गुफा की दूरी मात्र 16 किमी. है। रास्ते में दोमेल, बरारीमर्ग है, लेकिन यह रास्ता पथरीले और गंजे पहाड़ों से गुजरता है। रास्ते में अमरावती नदी भी है, जो अमरनाथ ग्लेशियर से जुड़ी है। भूस्खलन और आक्सीजन की कमी यहां अक्सर श्रद्धालुओं के लिए मुश्किल पैदा करती है। इस मार्ग से एक दिन में यात्रा संपन्न की जा सकती है।

अमरनाथ यात्रा 2019 की जरूरी बातें

1. इस साल अमरनाथ यात्रा 1 जुलाई से 15 अगस्त के बीच होगी। इस वर्ष 46 दिन की यात्रा हो रही है।

2. सड़क के रास्ते अमरनाथ पहुंचने के लिए पहले जम्मू तक जाना होगा फिर जम्मू से श्रीनगर तक का सफर करना होगा। श्रीनगर से आप पहलगाम या बाल्टाल पहुंच सकते हैं इन दो स्थानों से ही पवित्र यात्रा की शुरुआत होती है। -श्रीनगर से पहलगाम करीब 92 किमी. और बाल्टाल करीब 93 किमी. दूर है। इसके अलावा आप बस या टैक्सी सेवाओं के जरिए भी पहलगाम पहुंच सकते हैं।

3. पहलगाम से अमरनाथ की पैदल चढ़ाई शुरू होती है और पहलगाम से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट श्रीनगर में है, जो करीब 90 किमी. दूर है। जम्मू एयरपोर्ट भी दूसरा विकल्प है, जो करीब 263 किमी. दूर है। श्रीनगर ओर जम्मू एयरपोर्ट देश के लगभग सभी बड़े शहरों से जुड़े हुए हैं।

4. पहलगाम से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन उधमपुर है जो करीब 217 किमी. दूर है। लेकिन जम्मू रेलवे स्टेशन, उधमपुर की तुलना में ज्यादा अच्छी तरह से पूरे देश से जुड़ा है। जम्मू रेलवे स्टेशन का नाम जम्मू तवी है, यहां से देश के करीब सभी बड़े शहरों के लिए ट्रेन चलती है।

5. यात्रा के दौरान मौसम अचानक से बदल सकता है इसलिए विंडचीटर, रेनकोट, वाटरप्रूफ ट्रेकिंग कोट, टॉर्च, मंकी कैप, ग्लव्स, जैकेट, ऊनी जुराब, वाटरप्रूफ पायजामा वगैरह अपने साथ रखें।

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Posted By: kartikey.tiwari

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