यूं जल ही जीवन, मृत्यु और मोक्ष तीनों होता है। इसलिये माघ मास में गंगा स्नान, दान को महत्व दिया गया है। इतना ही नहीं इसी कारण हिंदू समाज में पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इसका कारण है कि यह पर्व के साथ एक तिथि भी है, अस्तु पूर्णिमा को देवपूजन की तिथि के रूप में पवित्र तिथि माना गया है। इस दिन अनेक लोग दिनभर व्रत रहकर सत्यनारायण की कथा का आयोजन भी करते हैं। इस दिन की गयी दान-दक्षिणा का विशेष महत्व है। पुण्य प्रदायिनी माघ पूर्णिमा

तो हर पूर्णिमा का अपना अलग-अलग माहात्म्य होता है लेकिन माघ पूर्णिमा की बात सबसे अलग है। इस दिन संगम की रेत पर स्नान-ध्यान करने से मनोकामनाएं पूर्ण तो होती ही हैं, साथ ही मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। माघ नक्षत्र के नाम पर माघ पूर्णिमा की उत्पत्ति होती है। माघ माह में देवता-पितरगण सदृश होते हैं। पितृगणों की श्रेष्ठता की अवधारणा और श्रेष्ठता सर्वविदित है। पितरों के लिए तर्पण भी हजारों साल से चला आ रहा है।

माघ पूर्णिमा कल्पवास की पूर्णता का पर्व है। एक माह की तपस्या इस तिथि को समाप्त हो जाती है। कल्पवासी अपने घरों को लौट जाते हैं। स्वाभाविक है कि संकल्प की संपूर्ति का संतोष एवं परिजनों से मिलने की उत्सुकता उनके हृदय के उत्साह का संचार है। इसलिये यह स्नान पर्व आनंद और उत्साह का पर्व बन जाता है।

गाय, पृथ्वी और सरस्वती ये तीनों समानार्थक है। इन तीनों का संगम क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इनके दान का महत्व भी समान है। भूमि तपोमयी है, भूमि का दान, अपने अहं एवं स्वामित्व का दान है। गाय सबको सुख देने वाली मां सदृश है। सरस्वती दान इन तीनों में सर्वश्रेष्ठ है। सरस्वती का कुंभ कभी खाली नही रहता इसलिये इन तीनों को धर्म का आधार माना गया। धर्म के इन तीनों के उद्देश्य की पूर्ति माघ में ही होती है। राजा-प्रजा सभी को यह सुख देने वाला होता है। सीता जी ने प्रभु राम से कहा कि धर्म से सुख होता है। धर्म से सब कुछ होता है। संपूर्ण जाति-धर्म का सार है। राम स्वयम् मूर्तिमान धर्म है। समय राजा का कारण है या राजा समय का कारण होता है। इसमें संशय नहीं है कि राजा ही काल का कारण होता है।

हमारे धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि इस जगत में जो कुछ भी जड़-चेतन है, वह ईश्‌र्र्वर मय है। आज ईश्‌र्र्वर को साक्षी मानकर त्याग पूर्ण भोग करें। क्योंकि भोग्य की वस्तुएं कभी भी किसी के साथ नहीं रही इन अर्थो का परिलक्ष किसी न किसी रूप में माघ माह में आता है। माघ माह में सभी मनोरथ पूरे होते हैं लेकिन इसे समझने की आवश्यकता है। धर्म, मृत्यु, जन्म, मोक्ष आखिर ये सब क्या है? सृष्टि की रचना कैसे हुई? कैसे जीवों को स्वर की प्राप्ति हुई। इन प्रश्नों का उत्तर माघ माह के माहात्म्य से प्राप्त हो जाता है। क्योंकि समूचा माघ माह प्रकृति का पर्व है। माघ माह की पूर्णिमा को बत्तीस पूर्णिमा भी कहते हैं। प्रात: काल पूर्णिमा के दिन काले तिल को जल में डालकर स्नान किया जाता है। पुत्र और सौभाग्य को प्राप्त करने के लिए मध्याह्न में शिवोपासना की जाती है।

एक कथा आती है कांतिका नगरी में धनेश्‌र्र्वर नामक ब्राहृमण रहता था, वह नि:संतान था। बहुत उपाय किया लेकिन उसकी पत्नी रूपमती से कोई संतान नहीं हुई। वहां एक ब्रांाण भी दान करने के लिए आता था। उसने ब्रांाण दंपत्ति को दान देने से इसलिए मना कर दिया कि वह नि:संतान दंपत्ति को दान नहीं करता है। लेकिन उसने उस नि:संतान दंपत्ति को एक सलाह दी कि चंद्रिका देवी की वे आराधना करें। इसके पश्चात ब्रांाण दंपत्ति ने मां काली की घनघोर आराधना की। 16 दिन उपवास करने के पश्चात मां काली प्रकट हुई। मां बोली कि तुमको संतान की प्राप्ति अवश्य होगी। अपनी शक्ति के अनुसार आटे से बना दीप जलाओं और उसमें एक-एक दीप की वृद्धि करते रहना। यह कर्क पूर्णिमा के दिन तक 22 दीपों को जलाने की हो जानी चाहिए। देवी के कथनानुसार उसने आम के वृक्ष से एक आम तोड़ कर पूजन हेतु अपनी पत्नी को दे दिया। पत्नी इसके बाद गर्भवती हो गयी। देवी के आशीर्वाद से देवदास नाम का पुत्र पैदा हुआ। देवदास पढ़ने के लिए काशी गया, उसका मामा भी साथ गया। रास्ते में घटना हुई। प्रपंचवश उसे विवाह करना पड़ा। देवदास ने जबकि साफ-साफ बता दिया था कि वह अल्पायु है। लेकिन विधि के चक्त्र के चलते उसे मजबूरन विवाह करना पड़ा। उधर, काशी में एक रात उसे दबोचने के लिए काल आया लेकिन व्रत के प्रताप से देवदास जीवित हो गया।

जीवन और मोक्ष की यह एक अद्भुत कहानी है। उसके पास जीवन नहीं था लेकिन उसे जीवन मिला। पार्वती जी भगवान शंकर से बोली कि माघ माह में जिसने भी व्रत किया, उसे संतान की प्राप्ति अवश्य हुई।

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