
- भगवान गणेश माता पार्वती और देवों के देव महादेव के पुत्र हैं। उन्हें गणपति, गणराज, गजानन, विनायक, विघ्नहर्ता, लंबोदर और एकदंत जैसे नामों से भी जाना जाता है।
- धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश की पत्नी रिद्धि और सिद्धि हैं। उनके दो पुत्रों के नाम शुभ और लाभ बताए जाते हैं।
- श्री गणेश को बुद्धि, ज्ञान, शुभता और विघ्नों को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले भगवान गणेश का स्मरण करना शुभ माना जाता है।
- भगवान गणेश का वाहन मूषक यानी चूहा है। उन्हें प्रिय भोग में मोदक और लड्डू प्रमुख माने जाते हैं।
- भगवान गणेश का प्रमुख त्योहार गणेश जन्मोत्सव है, जिसे देशभर में गणेश चतुर्थी के रूप में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
- भगवान गणेश के प्रमुख मंदिरों में सिद्धिविनायक मंदिर, मोती डूंगरी गणेश मंदिर, चिंतामण गणेश मंदिर और खजराना गणेश मंदिर शामिल हैं।

श्री गणेश चालीसा
।। दोहा ।।
जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
अर्थ: श्रेष्ठ गुणों के धाम, विशाल व सुंदर मुख वाले और परम दयालु श्री गणेश जी की जय हो! आप सभी विघ्नों व बाधाओं को दूर कर जीवन में शुभता का संचार करने वाले हैं। माता पार्वती के लाडले श्री गणेश जी की बारंबार जय हो।
॥ चौपाई ॥
जय जय जय गणपति गणराजू ।
मंगल भरण करण शुभः काजू ॥
अर्थ:
जै गजबदन सदन सुखदाता ।
विश्व विनायका बुद्धि विधाता ॥
अर्थ: हे देवों के स्वामी गणपति! आपकी सदा जय हो। आप भक्तों के जीवन को मंगलमय बनाते हैं और हर शुभ कार्य को निर्विघ्न संपन्न कराते हैं। गज (हाथी) के सदृश मुख वाले, सुख के धाम, पूरे संसार के स्वामी और सद्बुद्धि प्रदान करने वाले गणेश जी की जय हो।
वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना ।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
अर्थ:
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
अर्थ: आपकी घुमावदार व पवित्र सूंड अत्यंत सुंदर लगती है और मस्तक पर लगा त्रिपुंड तिलक मन को मोह लेता है। आपके वक्षस्थल पर रत्न व मोतियों का हार सुशोभित है, मस्तक पर सोने का मुकुट और आपकी विशाल आँखें दिव्य आभा बिखेरती हैं।
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
अर्थ:
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
अर्थ: आपके हाथों में ज्ञान की पुस्तक, फरसा और त्रिशूल सुशोभित हैं। आपको स्वादिष्ट मोदक और सुगंधित पुष्प अत्यंत प्रिय हैं। शरीर पर सुंदर पीला वस्त्र धारण किए हुए आपके चरणों की पादुकाएं बड़े-बड़े ऋषियों और मुनियों के मन को आनंदित करती हैं।
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।
गौरी लालन विश्व-विख्याता॥
अर्थ:
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।
मुषक वाहन सोहत द्वारे॥
अर्थ: भगवान शिव के पुत्र और कार्तिकेय (षडानन) के भाई श्री गणेश जी धन्य हैं। माता पार्वती के दुलारे के रूप में आपकी कीर्ति पूरे संसार में फैली हुई है। ऋद्धि और सिद्धि देवी आपकी सेवा में लीन रहती हैं और आपका वाहन मूषक (चूहा) आपके द्वार पर शोभायमान रहता है।
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुची पावन मंगलकारी॥
अर्थ:
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी ॥
अर्थ: आपके प्राकट्य की कथा अत्यंत पवित्र, कल्याणकारी व मन को पावन करने वाली है। एक बार पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती ने एक योग्य संतान पाने के लिए कठिन तपस्या की।
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥
अर्थ:
अतिथि जानी के गौरी सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
अर्थ: जब माता पार्वती का वह अद्भुत यज्ञ संपन्न हुआ, तब स्वयं भगवान शिव एक ब्राह्मण का रूप धारण करके वहां पधारे। उन्हें अतिथि मानकर माता गौरी बहुत प्रसन्न हुईं और पूरी निष्ठा के साथ उनका आदर-सत्कार किया।
अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
अर्थ:
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥
अर्थ: माता पार्वती के इस आतिथ्य और कठोर तपस्या से अत्यंत प्रसन्न होकर प्रभु ने वरदान दिया कि तुम्हें बिना गर्भधारण किए ही एक परम ज्ञानी और असीम बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी।
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अर्थ:
अस कही अन्तर्धान रूप हवै।
पालना पर बालक स्वरूप हवै॥
अर्थ: उन्होंने आशीर्वाद दिया कि वह बालक समस्त गणों का स्वामी, गुणों व ज्ञान का भंडार होगा और संसार में सबसे पहले पूजा जाएगा। इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए और तुरंत ही पालने में एक सुंदर दिव्य शिशु प्रकट हो गया।
बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥
अर्थ:
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
अर्थ: पालने में जब शिशु रूप में आप रोने लगे, तो आपके मनमोहक मुख को देखकर माता पार्वती की खुशी का ठिकाना न रहा। तीनों लोकों में आनंदोत्सव मनाया जाने लगा और देवताओं ने आकाश से फूलों की वर्षा की।
शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥
अर्थ:
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥
अर्थ: भगवान शिव और माता पार्वती आनंदित होकर खूब दान-पुण्य करने लगे। सभी देवता और ऋषि-मुनि बालक के दर्शन करने पधारे। चारों ओर छाए इस मंगलमय वातावरण को देखकर शनिदेव भी बालक को देखने पहुंचे।
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥
अर्थ:
गिरिजा कछु मन भेद बढायो।
उत्सव मोर, न शनि तुही भायो॥
अर्थ: शनिदेव अपनी दृष्टि के प्रभाव (दोष) को जानते थे, इसलिए वे शिशु को देखने से कतरा रहे थे। परंतु माता पार्वती ने इसका अन्यथा अर्थ निकाला और सोचने लगीं कि शायद शनिदेव उनके इस उत्सव से खुश नहीं हैं।
कहत लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥
अर्थ:
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहयऊ॥
अर्थ: शनिदेव ने संकोच करते हुए अपनी दृष्टि का कारण स्पष्ट किया, किंतु माता पार्वती को उनकी बात पर पूरी तरह विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने शनिदेव से बालक को देखने का आग्रह किया।
पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
अर्थ:
गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी।
सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥
अर्थ: जैसे ही शनिदेव की दृष्टि की एक किरण शिशु पर पड़ी, बालक का मस्तक धड़ से अलग होकर आकाश में विलीन हो गया। यह देखते ही माता पार्वती व्याकुल होकर मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ीं; उनके उस असीम दुख का वर्णन शब्दों में संभव नहीं है।
हाहाकार मच्यौ कैलाशा।
शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥
अर्थ:
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटी चक्र सो गज सिर लाये॥
अर्थ: पूरे कैलाश पर्वत पर हाहाकार मच गया। तब स्थिति को संभालने के लिए भगवान विष्णु तुरंत अपने वाहन गरुड़ पर सवार होकर प्रस्थान कर गए और अपने सुदर्शन चक्र से एक गजराज (हाथी) का मस्तक काटकर ले आए।
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥
अर्थ:
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥
अर्थ: उस गज-शीश को बालक के धड़ पर रखा गया और भगवान शिव ने दिव्य प्राण-मंत्र का उच्चारण कर उसमें जीवन का संचार किया। तत्पश्चात शिव जी ने उनका नाम 'गणेश' रखा और उन्हें प्रथम पूज्य तथा बुद्धि का भंडार होने का वरदान दिया।
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
अर्थ:
चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
अर्थ: एक बार जब भगवान शिव ने बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करने का आदेश दिया, तो कार्तिकेय जी तुरंत अपने वाहन पर सवार होकर निकल पड़े। परंतु आपने अपनी तीव्र बुद्धि से एक सहज उपाय खोज निकाला।
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
अर्थ:
धनि गणेश कही शिव हिये हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
अर्थ: आपने माता-पिता के चरणों को ही समस्त ब्रह्मांड मानकर उनके चारों ओर सात बार परिक्रमा कर ली। आपकी इस अपार बुद्धिमत्ता को देखकर शिव जी अत्यंत प्रसन्न हुए और देवताओं ने आकाश से पुष्पों की वर्षा की।
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥
अर्थ:
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
अर्थ: आपकी बुद्धि और महिमा इतनी विशाल है कि हजार मुखों वाले शेषनाग भी उसका पूरा वर्णन नहीं कर सकते। मुझ जैसा साधारण और अल्पज्ञानी भक्त आपकी स्तुति किस तरह करे?
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
अर्थ:
अब प्रभु दया दीना पर कीजै।
अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥
अर्थ: हे प्रभु! अपने इस निष्कपट भक्त पर अनुकंपा कीजिए और मुझे अपनी निश्छल भक्ति व सकारात्मक शक्ति का वरदान प्रदान कीजिए।
॥ दोहा ॥
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥
अर्थ:
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश॥
अर्थ: जो भी मनुष्य पूर्ण एकाग्रता और ध्यान लगाकर श्री गणेश चालीसा का नियमित पाठ करता है, उसके घर में नित्य नए सुख-मंगल का आगमन होता है और उसे समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। मंगलमूर्ति गणेश जी की कृपा से यह पावन स्तुति भक्त के जीवन के समस्त विघ्नों को हरकर उसे हर कार्य में सिद्धि प्रदान करती है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- गणेश चालीसा का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?प्रथम पूज्य श्रीगणेश को विघ्नहर्ता माना जाता है। उनकी चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मन को शांति मिलती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। भगवान गणेश का ध्यान करने से मुश्किलों का सामना करने और शुभ कार्यों की शुरुआत में सहायता मिलने की मान्यता है।
- गणेश चालीसा का पाठ कब और कितनी बार करना चाहिए?गणेश चालीसा का पाठ किसी भी दिन और समय किया जा सकता है। इसे आमतौर पर सुबह के समय या किसी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले पढ़ना शुभ माना जाता है। खासतौर पर बुधवार के दिन इसका पाठ अधिक फलदायी माना जाता है। सामान्य रूप से एक बार पाठ करना पर्याप्त माना जाता है।
- गणेश चालीसा किसने लिखी है?गणेश चालीसा के रचयिता का नाम स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है। इसके रचनाकार को लेकर कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
- बुधवार को गणेश चालीसा पढ़ने का क्या महत्व है?धार्मिक मान्यता के अनुसार बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। इस दिन गणेश चालीसा का पाठ करने से भगवान गणपति की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। साथ ही यह बुद्धि, विवेक और शुभता के लिए भी लाभकारी माना जाता है।
- गणेश चालीसा का पाठ करने से कौन-कौन से विघ्न दूर होते हैं?हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। इसलिए उनकी चालीसा का पाठ जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए किया जाता है। खासतौर पर नए काम, शिक्षा या किसी महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत से पहले भगवान गणेश का स्मरण शुभ माना जाता है।
- गणेश चालीसा का पाठ करने के क्या नियम हैं?गणेश चालीसा का पाठ करने से पहले साफ-सफाई का ध्यान रखना चाहिए। सबसे पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थल को स्वच्छ करें। इसके बाद शांत मन से भगवान गणेश का ध्यान करके श्रद्धापूर्वक चालीसा का पाठ करें।
- गणेश चालीसा में भगवान गणेश के किन स्वरूपों और गुणों का वर्णन किया गया है?गणेश चालीसा में भगवान गणेश के कई स्वरूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। इसमें विघ्नहर्ता, बुद्धि-विनायक, मंगलकारी और भक्तों के सहायक जैसे स्वरूप शामिल हैं। इसके अलावा उनके ज्ञान, विवेक, करुणा और संकटों से रक्षा करने वाले गुणों की स्तुति की जाती है।
- गणेश चालीसा का पाठ कितने दिनों तक करना चाहिए?गणेश चालीसा के पाठ के लिए कोई निश्चित अवधि अनिवार्य नहीं है। भक्त अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार रोज, बुधवार को या किसी विशेष अवधि तक इसका पाठ कर सकते हैं।
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