करवाचौथ पर मेहंदी लगवाना एक प्रचलित परंपरा है। इस दिन एकाएक मेहंदी कलाकारों की मांग बढ जाती है और दाम भी बढ जाते हैं। त्योहार मनाने का चाव सभी को होता है, मगर कई बार आर्थिक स्थिति ख्ाुशियों के आडे आ जाती है। लेकिन क्या सिर्फ मेहंदी न लगवा पाने से दंपती के प्यार में फर्क आ सकता है? एक मार्मिक कहानी।

उस शाम इंदु ऑफिस से जल्दी निकल पडी थी। इंदु ही क्या, शहर की अधिकतर स्त्रियां अपने-अपने दफ्तरों से जल्दी काम निपटा कर घर की ओर चली जा रही थीं। सभी स्त्रियों में एक अजब सा उत्साह दिखाई दे रहा था। अगले दिन करवाचौथ जो था। सभी को पूजा की तैयारी के साथ ही अपने साज-शृंगार की भी तैयारी करनी थी। नए कपडे, चूडिय़ां, पूजा का सामान और साथ ही अपनी साज-सजावट की तैयारी। इन सबके साथ मेहंदी लगवाने का जोश....।

ऑफिस से निकल कर इंदु ने रास्ते में कुछ ज्ारूरी ख्ारीदारी की और फिर दो साल के बेटे को डे-केयर से लिया और घर पहुंची। बेटे को दूध और नाश्ता देकर जल्दी से रात के खाने की तैयारी करवाने में जुट गई। किसी भी तरह रात के सारे कामकाज जल्दी पूरे कर वह भी मेहंदी लगवाने की िफराक में थी। मेहंदी न हुई, स्टेटस सिंबल हो गया। करवाचौथ के दिन अगर किसी स्त्री के हाथ मेहंदी से नहीं रंगे तो अधूरापन ही समझा जाता है। खाने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी थी, तब तक पति देवेन भी घर आ गए। चाय पर गपशप चलती रही। फिर बेटे के सोने का समय होने लगा। उसे खाना खिला कर सुलाया। फिर बेटे और घर की ज्िाम्मेदारी पति को सौंप कर वह तेजी से सीढिय़ां उतर कर पार्लर जा पहुंची।

पार्लर क्या था, पूरे कैंपस में करवाचौथ का मेला सा लगा था। हर उम्र की स्त्रियां यहां-वहां चौकियों, कुर्सियों पर बैठी मेहंदी लगवा रही थीं। मधुर संगीत के बीच उस ख्ाुशनुमा माहौल में चहकती आवाजें रस घोल रही थीं। हर तरफ उत्सव सा माहौल था। इंदु ने भी अपने कदम उसी ओर बढा दिए।

इंदु को वहां पहुंचने में देर हो गई थी। अधिकतर स्त्रियां वहां शाम से ही डेरा जमाए बैठी थीं। कलाकार व्यस्त थे। उसने इधर-उधर देखा, 'कोई ख्ााली हो तो मेरा काम भी जल्दी से हो जाए और मैं घर जल्दी वापस जा सकूं। सोच ही रही थी कि एक कलाकार लडकी ने उसे बुला लिया था और बैठते ही अपनी कलाकारी उसकी हथेली पर दिखाने की तैयारी में जुट गई।

'दोनों हाथों में न? उसने पूछा।

'नहीं, देर हो जाएगी..., इंदु हिचकिचाई थी। 'पता नहीं बेटा कब जाग जाए। फिर सुबह की भी तो तैयारी बाकी है। वह मन ही मन उलझने लगी थी।

'अरे दीदी, रोज्ा-रोज्ा कहां लगवाती हो? पूरे साल का त्यौहार है। दोनों हाथ तो रंगो।

पडोसी होने के नाते उसे इंदु से इस तरह की ज्िाद करने का पूरा हक था। हालांकि रात अधिक होने के कारण अगले दिन के काम भी रह-रह कर मन का बोझ बढा रहे थे, फिर भी साल भर का त्योहार था, सो दोनों हाथों में मेहंदी लगवाने का लालच वह रोक न सकी और उसे हां कह दिया। एक तरफ काम और ज्िाम्मेदारियों को याद करके मन का बोझ बढ रहा था, तो दूसरी ओर मेेहंदी लगवाने का शौक भी नहीं छोडा जा रहा था।

करवाचौथ पर मेहंदी लगवाना नियम सा बन गया है। मेहंदी नहीं लगाई तो मानो व्रत ही पूरा न होगा। हर उम्र की स्त्रियां बडी उमंग के साथ अपनी हथेलियों को रंगवा कर उन रंगों पर इतराती हैं और फिर किसकी मेहंदी कितनी रची, इस बात की होड में लग जाती हैं। मेहंदी रचाने के लिए न जाने कितने सारे जतन कर लिए जाते हैं। अब इस भीड में इंदु कैसे न शामिल होती? ऐसी कोई अनोखी भी तो नहीं वह! काम तो होते रहेंगे, आखिर रोज्ा काम में ही तो व्यस्त रहती है। घर, दफ्तर, बेटा, पति इन्हीं सब में हर वक्त उलझी रहती है। ऐसे में अगर थोडा वक्त ख्ाुद को दे, कुछ मिनट शौक को दे तो बुराई ही क्या है? यों भी, हथेलियां न रंगें तो त्यौहार में कितना अधूरापन रहेगा! सोच आख्िार समय पर हावी हो गई।

एडवांस पैसे देते हुए एक बार फिर दिमाग्ा में विचार दौडा कि अब एकाध घंटे तो सूखने में ही लगेंगे और इस बीच काम भी नहीं किया जा सकता। किचन ऐसे ही बिखरा हुआ छोड आई थी, पता नहीं देवेन ठीक करेंगे या ऐसे ही रह जाएगा! वो सब कब समेटूंगी, फिर कब सोऊंगी? सुबह बेटे को डे-केयर छोडऩे के बाद ऑफिस भी तो जाना है। सारी ऊहापोह के बावजूद वह जल्दी ही मेहंदी के सुंदर डिज्ााइन में खो सी गई, उसे अपने ही हाथ ख्ाूबसूरत दिखने लगे।

थोडी देर में आसपास नज्ार घुमाई तो महसूस हुआ कि अधिकतर स्त्रियों के हाथों में मेहंदी सज चुकी थी। उनमें से कुछ जा चुकी थीं और कुछ जाने की तैयारी में थीं। उसका मन एक बार फिर घर की ओर भागने लगा। लेकिन पैसे तो एडवांस दे चुकी थी। अब तो दोनों हाथों में लगवाने के अलावा कोई चारा न था। अभी तो पहले ही हाथ में देरी थी। दूसरे हाथ में कब लगेगी? उलझन में नज्ार दूसरी ओर घुमाई तो देखा गेट के पास ही एक युवा जोडा बातें कर रहा था। महसूस हो रहा था कि वह लडकी मेहंदी लगवाने में कुछ संकोच सा बरत रही थी और उसका पति उससे मनुहार कर रहा था। अद्भुत दृश्य था वह! उस प्रेम व स्नेह से वह मुग्ध ही हो गई थी...। उनके बीच ऐसा मधुर अनुराग देख कर इंदु मन ही मन मुस्कुरा उठी।

इसी बीच मेहंदी लगा रही लडकी ने उससे पूछा कि क्या उसे मेहंदी का डिज्ााइन अच्छा लग रहा है? तब जाकर उस जोडे से उसका ध्यान भंग हुआ और वह लडकी से बातचीत में मशगूल हो गई। दोनों की बातें ख्ात्म हुईं तो एकाएक इंदु को महसूस हुआ कि कोई उसकी बगल में आ खडा हुआ है। नज्ार उठाकर देखा, तो पाया वही लडकी थी, जो अब तक गेट के पास खडी थी। उसे देख कर इंदु ऐसे मुस्कुराई जैसे बरसों से जानती हो।

बदले में उस स्त्री ने संकोच भरी निगाहों से पूछा, 'कैसे लगा रही हैं?

सुनते ही इंदु ने डिज्ााइन उसे दिखा दिया। मेहंदी लगाने वाली लडकी ने उससे पूछा, 'लगवानी है क्या आपको भी?

जवाब में वह कुछ संकोच के साथ चुप रह गई। कलाकार ने इस बार थोडा तेज्ा पूछा, 'लगवानी है तो बताओ, अभी दूसरी लडकियां खाली हैं। कोई न कोई लगा देगी।

एक बार फिर उसने दबे स्वर में पूछा, 'कैसे लगा रही हैं?

इस बार इंदु उसका मतलब समझ गई और मेहंदी लगा रही लडकी से कहा, 'शायद ये रेट के बारे में पूछना चाहती हैं।

'सौ रुपये, कलाकार ने उसकी ओर देखकर जवाब दिया और एक बार फिर अपने काम में व्यस्त हो गई।

कलाकार के चेहरे पर जितना आत्मविश्वास झलक रहा था, उस नवविवाहिता के चेहरे पर संकोच की रेखाएं उतनी ही अधिक उभरती चली जा रही थीं। एक बार फिर उसने दबे स्वर में पूछा, 'दोनों हाथ?

इस बार कलाकार ने बिना उसकी ओर देखे ही जवाब दिया, 'नहीं, सौ रुपये में एक हाथ और जवाब सुनते ही वह स्त्री धीमे से कुछ पीछे हट गई।

'क्या हुआ? लगवानी है क्या? कलाकार ने फिर पूछा।

'हज्बैंड से बात कर लूं, अपने जवाब से उसने अनिश्चितता ज्ााहिर करने की कोशिश की थी। लेकिन इंदु देख सकती थी कि वास्तव में वह निश्चय कर चुकी थी कि उसे मेहंदी नहीं लगवानी। केवल एक हाथ में मेहंदी लगवाने के लिए गाढी कमाई के सौ रुपये ख्ार्च कर देने का उसका कोई इरादा नहीं था। वह तो बस हज्बैंड से बात करने के बहाने वहां से खिसक लेना चाहती थी, ताकि किसी दूसरे के सामने उसकी असमर्थता ज्ााहिर न हो सके, ताकि इंदु या मेहंदी लगाने वाली कलाकार के सामने उसकी आर्थिक स्थिति का हाल न ज्ााहिर हो जाए। ग्ाौर से देखते हुए, इंदु उसके मन की स्थिति का आकलन करने की कोशिश कर रही थी। उस स्त्री की आंखों में उसकी मन:स्थिति इंदु भली-भांति समझ सकती थी। उसके व्यवहार, उसकी बातों और उसकी आंखों को देख कर इंदु उसका मन स्पष्ट पढ सकती थी।

भरे मन से इंदु ने गेट की ओर देखा। इस बार उस लडकी का पति उन्हीं लोगों की ओर देख रहा था।

लेकिन शायद नहीं...., एकाएक इंदु कुछ पल अपलक उस पुरुष की ओर देखती रह गई। उसकी आंखों में काला चश्मा था और हाथ में छडी। इंदु के मन को इस बार गहरा झटका लगा था। समझते देर न लगी कि उसके पति नेत्रहीन थे। न जाने क्यों वह ख्ाूबसूरत सी मेहंदी भी इस पल उसका ध्यान न हटा सकी थी। उसका सारा ध्यान उस जोडे पर ही केेंद्रित हो गया था। पति के पास वापस जा रही लडकी ने धीरे से कुछ कहा और फिर दोनों लौटने लगे।

इंदु समझ सकती थी कि उसने अपने पति से वहां से चलने को कहा है। पति ने उसे एक बार फिर रुकने को कहा। लडकी एकबारगी पलटी, लेकिन इस बार पति का हाथ पकड कर उन्हें भी साथ ले जाने के लिए। अनमनाकर इंदु ने अपने हाथ की ओर देखा। पहले हाथ की मेहंदी पूरी होने वाली थी। घडी की ओर देखा, साढे दस बज चुके थे।

'दूसरा हाथ पूरा होने में कम से कम आधे घंटे और लगेंगे, सोचकर इंदु का मन उकता गया था।

'क्या मैं उन्हें रोक कर अपने दूसरे हाथ की मेहंदी उसके हाथ में लगने दूं? इंदु का मन तडप उठा था। उसका शौक भी न जाने क्यों कम हो चला था। उसे पहले ही घर-बच्चा और बिखरा किचन याद आ रहा था, अब तो उस पति-पत्नी की आर्थिक विपन्नता ने उसे पूरी तरह निराश कर दिया था।

'मैं यों भी तो बेमन से ही मेहंदी लगवा रही थी। ऐसे में, अगर मेरे दूसरे हाथ की मेहंदी उस स्त्री के एक हाथ में लग जाए तो क्या बुरा हो जाएगा? वह खुद से ही पूछ बैठी।

'लेकिन उन दोनों से क्या कहूं? कहीं मेरी हमदर्दी को वे मेरी मेहरबानी समझ बैठे तो? कहीं मेरे प्रस्ताव को वे दोनों अपनी असमर्थता की तौहीन समझ बैठे तो? इंदु अंतद्र्र्वंद्व में फंस कर रह गई। वह उनके सामने कोई भी प्रस्ताव न रख सकी। अपने प्रस्ताव में उसे दया की बू आने लगी थी, ऐसी बू जो किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति को शायद ही पसंद आए!

'इस तरह से अपनी दया दिखा कर मैं उनके स्वाभिमान को कैसे चोटिल कर सकती हूं? इंदु समझ न सकी। उसका मन तो बस उन दोनों को समझने की चेष्टा ही करता रह गया था, उसकी निगाहें बस उसी दिशा में भाग रही थीं, जिस ओर वे दोनों चले जा रहे थे, एक-दूसरे को सहारा देते।

उस अनजान पुरुष के लिए इंदु के मन में सम्मान बढता जा रहा था। जो ख्ाुद देख नहीं सकता था, फिर भी पत्नी के हाथों पर मेहंदी सजाने की चाह रखता था। उसने शायद कभी मेहंदी का डिज्ााइन भी नहीं देखा होगा, लेकिन उसकी सुंदरता की महक वह अपनी पत्नी की ख्ाुशियों में महसूस करने की ख्वाहिश रखता था।

इंदु को उस पति के प्रेम व स्नेह और उसकी पत्नी के व्यवहार पर गर्व होने लगा था। वह सोच रही थी, करवाचौथ का वास्तविक अर्थ इस पति-पत्नी को मालूम है। एक स्त्री के लिए सुंदर दिखना और परंपराओं का निर्वाह करना कितना ज्ारूरी सा हो जाता है, मगर वह लडकी पति के दबाव के बावजूद इस शौक के लिए गाढी मेहनत की कमाई नहीं गंवाना चाहती थी। उसने दूसरों के सामने अपनी आर्थिक स्थिति का बखान करने के बजाय शालीनता के साथ वहां से चले जाना उचित समझा।

इंदु मन ही मन ग्लानि से भरती जा रही थी। शायद वह कोशिश करती तो उन दोनों का त्योहार कुछ ख्ाास बन पाता, लेकिन वह सोचती रह गई, कर कुछ न पाई। अपने हाथों की मेहंदी के रंग को भुलाकर त्यौहार की सारी ख्ाुशियां बिसरा कर वह बस उसी दिशा में देखती जा रही थी, जिस दिशा में वह दंपती एक-दूसरे का हाथ थामे धीमे-धीमे डग भरता जा रहा था। धीरे-धीरे वे अंधेरे में ओझल होते जा रहे थे....।

गरिमा संजय