-हमेशा की तरह सखी का नवंबर अंक बेहतरीन जानकारियों का खजाना साबित हुआ। कवर स्टोरी 'बाकी रहे थोडा बचपना' में बिलकुल सही कहा गया है कि हर इंसान के मन में एक बच्चा छिपा होता है और हमें उसकी मासूमियत को बरकरार रखना चाहिए। 'कानून' के अंतर्गत सरोगेसी पर उठाए गए सवाल प्रासंगिक थे। दिव्या दत्ता एक सशक्त अभिनेत्री हैं। 'मुलाकात' के अंतर्गत उनका इंटरव्यू मुझे खासतौर पर पसंद आया। सभी स्थायी स्तंभ भी रोचक थे। अवनि शर्मा, चंडीगढ -त्योहार के रंगों में रंगा सखी का अक्टूबर अंक लाजवाब था। लेख 'शक्ति आराधना का महापर्व नवरात्र' में मां दुर्गा के नौ रूपों के बारे में बहुत अच्छी जानकारी दी गई थी। लेख 'ज्यूलरी खऱीदने से पहले' में दी गई जानकारियां भी बहुत उपयोगी साबित हुईं। इसकी रचनाओं में परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय देखने को मिलता है। कविता रावत, देहरादून -सखी के विंटर स्पेशल की जितनी भी तारीफ की जाए कम है। लेख 'मिले खूबसूरती बेमिसाल' के जरिये विंटर स्किन केयर के बारे में बहुत अच्छी जानकारी दी गई थी। 'घर की थाली' में स्टफ्ड परांठों की रेसिपीज भी लाजवाब थीं। कहानी 'बचपन की सहेली' दिल को छू गई। अर्पिता गर्ग, कोटा -मैं सखी का बुजुर्ग पाठक हूं। यह मेरी प्रिय पत्रिका है। इसके अक्टूबर अंक में नवरात्र और दीपावली के त्योहार से जुडी बहुत रोचक जानकारियां दी गई थीं। इसके सभी लेख कहीं न कहीं पाठकों का मार्गदर्शन करते हैं। पत्रिका के उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं। रघुवीर प्रसाद देवानी, रायपुर -सखी का नवंबर अंक देखकर दिल खुश हो गया। लेख 'मौसम का असर हो जाए बेअसर' में सर्दियों की वजह से पैदा होने वाले सीजनल अफेक्टिव डिसॉर्डर के बारे में कई नई और उपयोगी बातें जानने को मिलीं। लेख 'जाडों की नर्म धूप और..' में सर्दियों से जुडी रोचक यादों की साझेदारी मुझे खासतौर पर पसंद आई। अलका पांडे, वाराणसी -सखी पत्रिका सही मायने में गागर में सागर कहावत को चरितार्थ करती है। इसकी संक्षिप्त और सारगर्भित रचनाएं बेहतरीन जानकारियों का खजाना साबित होती हैं। यह पत्रिका हम जैसी आम गृहिणियों को भी खास होने का एहसास दिलाती है। 'जायका' के अंतर्गत प्रकाशित स्वादिष्ट रेसिपीज को मैं हमेशा अपनी किचन में आजमाती हूं और घर आने वाले मेहमानों को खिलाकर खूब तारीफ बटोरती हूं। इतनी अच्छी पत्रिका प्रकाशित करने के लिए आप मेरी बधाई स्वीकारें। उमा गट्टाणी, जोरहाट (असम) -नवंबर माह में प्रकाशित सखी के विंटर स्पेशल में लेख 'सर्दियों में इन्हें न करें नजरअंदाज' मेरे पूरे परिवार के लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ। इसे पढऩे के बाद मैं विशेष रूप से सचेत हो गई हूं क्योंकि मुझे एस्थमा की समस्या है। 'इनसे मिलिए' में मुंबई के मार्क डिसूजा के सराहनीय प्रयास के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा। सत्या द्विवेदी, नोएडा -सखी का नवंबर अंक मुझे खास तौर पर पसंद आया। कवर स्टोरी 'बाकी रहे थोडा बचपना' से मैं भी सहमत हूं कि जीवन की भाग-दौड में हम अपनी सहजता खोते जा रहे हैं। इसी वजह से डिप्रेशन की समस्या तेजी से बढ रही है। लेख 'इतनी लत भी ठीक नहीं' के माध्यम से बच्चों में बढते इंटरनेट एडिक्शन की समस्या पर उठाया गया सवाल वाजिब है। 'ब्लेम गेम के बादशाह' ने हंसने पर मजबूर कर दिया। डॉ. दीपाली गुल, जालंधर -सखी मेरी प्रिय पत्रिका है। सकारात्मक दृष्टिकोण से परिपूर्ण इसकी रचनाएं न केवल मुझे जीने की कला सिखाती हैं बल्कि मेरे मन में नए उत्साह का संचार भी करती हैं। फैशन और सौंदर्य संबंधी सभी नवीनतम जानकारियां मुझे इसी से मिलती हैं। सच कहूं तो मेरा आत्मविश्वास बढाने का श्रेय इसी को जाता है। रिश्तों की मिठास से लेकर स्वादिष्ट पकवानों का 'जायका' तक सब कुछ है इस पत्रिका में। हर कदम पर मार्गदर्शन करने के लिए मैं सखी की तहेदिल से शुक्रगुजार हूं। अमिता गुप्ता, भोपाल सखी आपको कैसी लगती है, हमें जरूर लिख भेजें। आपके विचार-सुझाव प्रकाशित किए जाएंगे और सर्वश्रेष्ठ पत्र को पुरस्कृत भी किया जाएगा। आप अपने पत्र के साथ पूरा पता, पासपोर्ट साइज फोटो और फोन नंबर देना न भूलें। अपने पत्र के साथ इस कूपन को काट कर लिफाफे पर अवश्य चिपकाएं। पुरस्कार स्वरूप गिफ्ट हैम्पर प्राप्त होने के बाद प्राप्ति की सूचना हमें जरूर भेंजें। अगर किसी कारणवश गिफ्ट हैम्पर वापस लौट आता है तो उसके लिए हमारी पत्रिका जिम्मेदार नहीं होगी। इंटरनेट पर सखी पढ़ने के लिए क्लिक करें- In.jagran.yahoo.com\sakhi - संपादक