सरोगेट का शाब्दिक अर्थ है- प्रतिनिधि, प्रतिनियुक्त- यानी सरोगेट मदर का शाब्दिक अर्थ है- प्रतिनियुक्त मां। इसका चलन कई वर्षों से है लेकिन इसे लेकर कानून बनाने में काफी देरी हुई। वर्ष 2002 से यह कानून लागू हुआ था मगर पिछले कुछ वर्षों में यह धंधा बन गया और इसकी आड में आदिवासी व गरीब स्त्रियों का शोषण किया जाने लगा। लिहाजा इस पर एक रेगुलेटरी बिल की जरूरत महसूस की जाने लगी। वर्ष 2015 में विदेशियों की सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाया गया। इस सामान्य सी लगने वाली प्रक्रिया में कई समस्याएं हैं, जिनका सामना किराये की मांओं और उनके बच्चों को करना पडता है। व्यावसायिक पक्ष पर रोक दूसरे देशों की अपेक्षा यह धंधा हमारे यहां काफी बडा है। विदेशियों के लिए यह एक पसंदीदा जगह है। इसका कारण है, यहां का लचर कानून। भारत में यह प्रक्रिया तो सस्ती है ही, मांओं की जिंदगी भी बहुत सस्ती है। यूनियन केबिनेट ने सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल 2016 का अनुमोदन किया है। इससे यहां भी दूसरे देशों की तर्ज पर सरोगेट मदर के व्यावसायिक पक्ष पर रोक लग सकेगी। अब परोपकारी सरोगेसी की बात की जा रही है, यानी ऐसे नि:संतान दंपती, जिन्हें अपनी ही संतान चाहिए, इस प्रक्रिया की सहायता ले सकते हैं मगर इन्हें शादी के पांच साल बाद ही इस सुविधा का लाभ उठाने का अधिकार होगा। यह सरोगेट मां दंपती की रिश्तेदार हो सकती है और यह सुविधा भी दंपती को जीवन में एक ही बार मिल सकती है। इस पूरी प्रक्रिया में पैसे का कोई भी लेन-देन नहीं किया जा सकेगा। सवाल जो उलझे थे अब तक कानून कई सवालों पर मौन था। जैसे- सरोगेट मांओं के स्वास्थ्य की देखभाल कैसे होगी? उन्हें तय या उचित रकम देना किसकी जिम्मेदारी होगी? अगर किसी कारणवश समझौते के बावजूद दंपती बच्चे को नहीं स्वीकारता तो उसकी परवरिश कैसे होगी? बच्चे को जन्म देने के बाद ऐसी मां (प्रसूता) के स्वास्थ्य की चिंता कौन करेगा? प्रेग्नेंसी के दौरान कोई समस्या हो तो जवाबदेही किसकी होगी? कुल मिलाकर सरोगेट मां और उसके बच्चे का भविष्य इसमें असुरक्षित था, इसलिए इस पर सख्त कानून बनाने की जररूरत थी। नए नियम केंद्र सरकार द्वारा इस बिल में कुछ नए नियम जोडे गए हैं, जो इस तरह हैं- 1. सरोगेट मां पहले से विवाहित हो और उसकी एक संतान होनी चाहिए। 2. बच्चे को जन्म देने के बाद भी वह उसके संपर्क में रहेगी। यानी बच्चा जब चाहे, अपनी मां से मिल सकता है। 3. होमो-सेक्सुअल या लिव-इन में रहने वाले कपल्स को यह सुविधा नहीं मिल सकती। 4. सरोगेसी की मदद लेने वाले दंपती की शादी को पांच वर्ष पूरे होने चाहिए। 5. दंपती में से किसी एक को यह साबित करना होगा कि वह प्रसव में सक्षम नहीं है। बेबी मंजी यमदा का मामला हाल ही में बेबी मंजी यमदा का मामला सामने आया। इस केस में सरोगेट मां की प्रेग्नेंसी के समय ही जापानी दंपती का तलाक हो गया। बच्चा किस देश का होगा और कौन उसका लालन-पालन करेगा, इस पर कानून में कुछ नहीं कहा गया। लिहाजा ऐसे में बच्चे का भविष्य अंधकारमय हो गया। इन स्थितियों में नए बिल से कुछ सकारात्मक नतीजे निकल सकें तो बेहतर माना जाना चाहिए। यह भी गौरतलब है कि जिस देश में तमाम सख्त कानूनों के बाद भी कन्या भू्रण हत्या या भू्रण परीक्षण न रुक रहा हो, वहां विदेशियों पर रोक लगाने पर भी 'कोख बिक्री' का बाजार वाकई रुक सकेगा, इसमें संदेह ही है। कुछ और सवाल अभी तक हमारे यहां होमो-सेक्सुअल और लिव-इन में रहने वाले जोडों को कानूनी मान्यता नहीं है, इसीलिए इन्हें सरोगेसी से प्राप्त बच्चों का अधिकार भी नहीं दिया जा रहा है। इसलिए कि वे कब साथ हैं और कब नहीं, यही पता चल पाना मुश्किल है। उनमें अलगाव की स्थिति में ऐसे बच्चों की देखरेख कौन करेगा? जिस व्यक्ति के पास अपना या गोद लिया एक बच्चा है, वह सरोगेट बच्चे के साथ भेदभाव कर सकता है, इसीलिए इन्हें भी यह अधिकार नहीं दिया जा रहा है। यह बिल इस बात को सुनिश्चित करेगा कि सभी सरोगेट क्लिनिक रजिस्टर्ड हों, सारी प्रक्रिया पारदर्शी हो, ताकि किसी के साथ धोखाधडी न हो। सरोगेट बच्चे को किसी आधार पर छोड कर चले जाने, सरोगेट मदर का शोषण, इंसान के भू्रण को खरीदने या बेचने पर अब 10 वर्ष की सजा और 10 लाख रुपये जुर्माना होगा। सरोगेट क्लिनिक को पिछले 25 साल का रिकॉर्ड रखना होगा। विदेशी दंपती में एन.आर.आई., भारतीय मूल के लोग यौप भारत के बाहर बसे हुए भारतीय नागरिक भी आते हैं। मां-बच्चे की जिम्मेदारी दूसरी ओर सरोगेसी के पुराने स्वरूप की तरफदारी करने वाले कहते हैं कि यह तो इस उद्योग को 'अंडरग्राउंड' हो जाने की तरफ धकेलने जैसी बात है। क्या होगा, यदि दोनों ही पार्टनर अपने घर के इकलौते बच्चे हों? ऐसे में नि:संतान लोगों का क्या होगा? नए बिल में सलेब्रिटी कल्चर की बात भी की गई है। कई सलेब्रिटीज ने अपने बच्चे होने के बावजूद सरोगेसी के जरिये बच्चे पैदा किए। इतनी संवेदनशील प्रक्रिया को अमीरों का मनोरंजन नहीं बनाया जा सकता। इसके अलावा अब तक के मामलों में सरोगेट मां के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली। स्त्री के स्वास्थ्य से खिलवाड करते हुए उसे 4-5 बार सरोगेट मदर बनाया गया, सिर्फ इसलिए कि वह गरीब थी और उसे पैसे की जरूरत थी। इंसानी जिस्म का इससे घृणित और क्या सौदा हो सकता है कि उसे एक फैक्टरी की तरह इस्तेमाल किया जाए! शोषण अब खत्म हो प्रोडक्ट बनाओ और बाजार में बेचो...। क्या पैसे के आगे मां की फीलिंग्स का कोई महत्व नहीं? क्या वह महज पैसा लेने से अपनी भावनाओं को भुला सकती है? सच तो यह है कि सरोगेट मांओं की पीडा के बारे में किसी ने सोचा ही नहीं। ऐसे कई सर्वे हुए, जिनमें बताया गया कि दिल्ली-मुंबई में तो पति के दबाव में आकर भी स्त्री ने सरोगेट मां बनना स्वीकार किया। यही नहीं, वादे के मुताबिक उन्हें कई बार न तो पूरा पैसा मिला, न प्रेग्नेंसी के दौरान उनके खानपान और स्वास्थ्य के बारे में सोचा गया। इसके अलावा गर्भपात होने पर उन्हें न कोई भुगतान किया गया और न उनकी दवा या स्वास्थ्य जांच पर पैसा खर्च किया गया। दूसरी ओर बच्चे के बारे में भी नहीं सोचा गया। बच्चा जिस गर्भनाल से जुडकर प्यार, ममता और सुरक्षा पाता है, वह सरोगेसी प्रक्रिया में जन्म लेते ही खत्म हो जाती है। जिस मां के दूध की इतनी महिमा गाई जाती है, उसी मां के दूध से बच्चा वंचित हो जाता है। अब तक कानून, सरोगेट मां या मालिक माता-पिता ने बच्चे के बारे में नहीं सोचा, शायद इसलिए क्योंकि बच्चा मूक है, वह अपना दर्द बता नहीं सकता, लिहाज उसके साथ कुछ भी किया जा सकता है...।