बहन बनी मददगार, मनिकना मुखर्जी, झांसी बात उन दिनों की है, जब आम लोग इंटरनेट बैंकिंग की सुविधा से वाकिफ नहीं थे। मेरी सास को अकसर सीने में दर्द रहता था। झांसी में इलाज की अच्छी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसलिए मेरे पति सासू मां को मेडिकल चेकअप के लिए अपने साथ दिल्ली ले गए। उन दिनों वह बाहर से पूरी तरह स्वस्थ नजर आ रही थीं। मेरे पति केवल एहतियात के तौर पर उनका मेडिकल चेकअप कराना चाहते थे लेकिन जांच के बाद डॉक्टर ने बताया कि उनके हार्ट में ब्लॉकेज है और उसे दूर करने के लिए जल्द से जल्द हार्ट में स्टेंट लगाना पडेगा। इसके लिए ढाई लाख रुपये के जरूरत थी। वह बहुत परेशान थे। वहां रहने वाले कई रिश्तेदारों से पूछा पर कोई भी उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया। मेरी बहन भी दिल्ली में ही रहती है। जब मैंने उसे फोन करके इस बारे में बताया तो वह अपने फिक्स्ड डिपॉजिट से पैसे निकालकर उसी रोज अस्पताल पहुंच गई और मेरी सासू मां की सर्जरी अच्छी तरह हो गई। ऐसी मुश्किल घडी में हमारी सहायता करके उसने न केवल मेरी सास की जान बचाई, बल्कि दूसरे रिश्तेदारों को भी इस बात के लिए प्रेरित किया कि हमें अपनों की मदद करनी चाहिए।

हिम्मत से मिली कामयाबी, रजनी वालिया, कपूरथला जब मेरी शादी हुई थी, उस वक्त मैं बीएड कर रही थी। मेरी ससुराल फिरोजपुर में थी और वहां से मेरा कॉलेज काफी दूर था। फिर भी ढाई-तीन घंटे का सफर करके मैं कॉलेज जाती थी। फिर प्रेग्नेंसी के दौरान मेरे लिए बस में यात्रा करना मुश्किल हो गया तो मैं नियमित रूप से कॉलेज नहीं जा पाती थी। जिस दिन मेरे लिए कॉलेज जाना बहुत जरूरी होता था, उस दिन मेरे पति मुझे खुद कार से वहां तक छोडऩे जाते और अपने साथ ही वापस लेकर आते।

परीक्षा के दौरान मेरा बेटा मात्र सवा महीने का था। मेरे पति मुझे और बच्चे को साथ लेकर परीक्षा केंद्र तक जाते। जब तक मैं परीक्षा देती, वह केंद्र के बाहर बैठे रहते और बच्चे को संभालते। इस तरह बडी मुश्किलें उठा कर मैंने किसी तरह परीक्षा दी। रिजल्ट आने के बाद मेरे लिए इस बात पर यकीन करना भी मुश्किल हो गया कि मैंने अपनी यूनिवर्सिटी में टॉप किया है। उस वक्त मेरे पति ने साथ न दिया होता तो मुझे कामयाबी कभी नहीं मिलती। आज मैं एक अच्छे स्कूल में टीचर हूं और उस परीक्षा के बाद मुझे इस बात पर पक्का यकीन हो गया कि चाहे कितनी ही बडी मुश्किल क्यों न हो, अगर इंसान खुद हिम्मत दिखाए तो कामयाबी निश्चित मिलती है।

बर्बाद नहीं हुई चीनी, मीरा जैन, उज्जैन पिछले साल दीपावली के पहले मैं मठरी और शक्कर पारे बनाने की तैयारी में जुटी थी। बहुत सा सामान एक साथ रखा था। जल्दबाजी में मैंने मैदा समझ कर शुगर पाउडर का पैकेट खोल दिया और गूंधने के लिए उसमें पानी डाल दिया। अगले ही पल मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। उस वक्त कुछ नहीं सूझ रहा था तो मैंने गीली चीनी को फ्रिज में रख दिया। अगले दिन अचानक घर में काफी मेहमान आ गए। मैंने उसी चीनी में आटा, दूध और इलायची मिलाकर गुलगुले तल दिए, जिसका स्वाद सभी को बहुत पसंद आया।