समाज में बच्चों के प्रति अपराध तेजी से बढे हैं। हाल में ही तीन साल की एक बच्ची को दुष्कर्म के बाद मरा समझ गड्ढे में फेंक दिया गया और वह 11 घंटे बाद जीवित मिली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 11 पोक्सो न्यायालयों से रिपोर्ट मांगी है कि ऐसा क्यों हो रहा है? मुकदमे इतने ज्यादा होने के बावजूद सजा कम क्यों मिल रही है? न्याय की राह में समस्याएं प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पोक्सो) एक्ट का मकसद यही था कि बच्चों के प्रति हो रहे अपराधों पर लगाम लगे। पोक्सो अदालतों की रिपोट्र्स में कहा गया है कि बच्चों या अभियुक्तों से संबंधित फोरेंसिक रिपोट्र्स जल्दी नहीं आतीं, अदालत में ऐसे कमरों की कमी है, जहां गवाह बैठ सकें और कानूनी कार्यवाही सुचारु रूप से चल सके। चाइल्ड काउंसलर्स या मनोवैज्ञानिकों की भी कमी है। रिपोट्र्स में कहा गया है कि ऐसे मुकदमों के निस्तारण के लिए विशेष व सक्षम अदालतें होनी चाहिए। न्याय दिलाने वालों को भी विशेष ट्रेनिंग की जरूरत है। गौरतलब है कि ये अदालतें कुछ समय तक पोक्सो मुकदमे देखती हैं, बाकी समय सामान्य मामले ही यहां आते हैं। इसी कारण मामले लंबे खिंच जाते हैं। आंकडे हैं निराशाजनक मुकदमों में जितनी देरी होती है, गवाहों, अभिभावकों और बच्चों के लिए उतनी ही मुश्किल होती है क्योंकि लंबे अंतराल में लोग डिटेल्स भूलने लगते हैं। गवाहों के बयान बदल जाते हैं। वे डर, प्रलोभन या भूलने के कारण ठीक से गवाही नहीं दे पाते। कई बार वे कोर्ट में आना ही बंद कर देते हैं। उनके लिए सुरक्षा की व्यवस्था नहीं होती। आंकडों के मुताबिक, ऐसे मामलों में अभी तक सजा का ग्राफ मात्र 16.33 प्रतिशत है। वर्ष 2015 में 19.65' और फिर जुलाई 2016 तक 18.14' दर्ज हुआ। ऐसे मामलों में पहले तो मुकदमे ही दर्ज नहीं कराए जाते। रिश्तेदारों या पडोसियों द्वारा किए गए अपराधों में परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर घटनाएं दबा दी जाती हैं। मुकदमे दर्ज होने के बाद भी कई बार अभिभावक केस वापस लेने की जिद करने लगते हैं। जागरूकता है जरूरी पोक्सो एक्ट 14 नवंबर 2012 को लागू किया गया था। इसके बाद भी जघन्य अपराध नहीं थम रहे हैं। लगभग 82' अपराधी छूट जाते हैं। इस एक्ट के तहत बच्चों से यौन छेडछाड को दुष्कर्म की श्रेणी में रखा गया था। इससे पहले छेडछाड को शालीनता हनन जैसा कृत्य माना जाता था मगर अब इनमें कम से कम 7 वर्ष की सजा और अधिकतम आजीवन कारावास का प्रावधान है। हाल ही में एक केस में दोषी पिता को पोक्सो एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा दी गई। यदि अधिक से अधिक मुकदमे दर्ज हों और जल्दी न्याय मिले तो अपराधियों का हौसला पस्त होगा। इसके लिए कानून में बदलाव के साथ ही लोगों की मानसिकता को बदलना भी जरूरी है। वर्ष 2012 में बच्चों के प्रति यौन हिंसा या छेडछाड जैसे मामलों में जल्दी न्याय दिलाने के लिए पोक्सो एक्ट लाया गया। इसके बावजूद इस एक्ट के तहत मुकदमे दर्ज कराने से लेकर सजा मिलने तक के आंकडे बेहद निराशाजनक हैं। क्यों हो रहा है ऐसा, बता रही हैं सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन।