बच्चे का बोर्ड एग्जैम हो तो पूरे घर में अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है। पेरेंट्स बार-बार उसे पढऩे के लिए डांट रहे होते हैं, टीवी का स्विच ऑफ, आउटिंग और मेहमानों का आना-जाना बंद..पेरेंट्स परेशान, बच्चे हैरान। तनाव भरे इस माहौल में बच्चे के लिए परीक्षा की तैयारी और भी मुश्किल हो जाती है। ऐसे हालात से बचने का सबसे सही तरीका यही है कि जैसे ही आपका बच्चा दसवीं कक्षा में पहुंचे, नए अकैडमिक सेशन के पहले दिन से ही आप उसकी दिनचर्या इस तरह तैयार करें कि वह सहज ढंग से तनावमुक्त होकर परीक्षा की तैयारी में जुट जाए। इस संबंध में अगर कोई परेशानी हो तो उसके बारे में नि:संकोच क्लास टीचर से सलाह लें। उसकी रुचियों सहित सभी खूबियों-खामियों के बारे में भी उन्हें बताएं।

भविष्य की ओर बढते कदम परीक्षा के प्रति मन में थोडा डर होना स्वाभाविक है पर आने वाले माक्र्स को लेकर हमेशा सशंकित रहने की प्रवृत्ति का उसकी तैयारी पर नकारात्मक असर पडता है। इसलिए सबसे पहले उसके मन से यह डर दूर करने की कोशिश करें कि कहीं कम माक्र्स मिले तो क्या होगा? आप उसे यही समझाएं कि तुम पूरी ईमानदरी से केवल अपनी पढाई पर ध्यान केंद्रित करो। परीक्षा में केवल ज्य़ादा माक्र्स लाना ही काफी नहीं है बल्कि तुम जो भी पढते हो उसे याद रखने के साथ अच्छी तरह समझना भी बहुत जरूरी है। इसलिए माक्र्स की चिंता छोडकर पढाई पर ध्यान केंद्रित करो। अगर तुम अभी से तैयारी शुरू का दोगे तो परीक्षा के समय तुम पर ज्य़ादा दबाव महसूस नहीं होगा। ऐसी सकारात्मक बातों से उसका मनोबल बढेगा और वह तनावमुक्त होकर पढाई पर ध्यान देगा। यही वह महत्वपूर्ण दौर है, जब छात्रों के करियर की दिशा निर्धारित होती है। कुछ बच्चे तो आठवीं-नौवीं कक्षा से ही तय कर लेते हैं कि भविष्य में उन्हें किस प्रोफेशन का चुनाव करना है पर सभी के साथ ऐसा नहीं हो पाता। अगर कोई स्टूडेंट दसवीं में आने के बाद भी स्वयं अपनी क्षमताओं और रुचियों को पहचान नहीं पाता तो ऐसी स्थिति में दूसरे बच्चों से उसकी तुलना करने के बजाय स्कूल काउंसलर की सहायता लेनी चाहिए।

शुरुआती टाइम मैनेजमेंट अगर अकैडमिक सेशन के शुरुआती दौर में ही दसवीं के छात्र अपना टाइम टेबल तैयार कर लें तो आगे उन पर पढाई का ज्य़ादा बोझ नहीं पडेगा। अपने बच्चे को शुरू से ही सेल्फ स्टडी की अहमियत समझाएं। स्कूल का होमवर्क पूरा करने के अलावा प्रतिदिन क्लास में जो कुछ भी पढाया जाता है, घर आकर उसका रिवीजन, सवालों के जवाब को लिखित रूप में याद करने की प्रैक्टिस, सप्ताह में एक दिन पुराने प्रश्नपत्रों में से एक या दो सवाल को घडी देखकर निर्धारित समय के भीतर हल करने की कोशिश को स्टडी रूटीन में जरूर शामिल करना चाहिए। इससे राइटिंग स्पीड अच्छी होगी और परीक्षा हॉल में देर की वजह से सवाल छोडऩे की नौबत नहीं आएगी। मैथ्स के सवालों की प्रैक्टिस के लिए अलग से एक घंटे का समय निर्धारित होना चाहिए। सोशल साइंस, इकोनॉक्सि और लिटरेचर की स्टडी के दौरान अपनी सुविधा के लिए अलग से संक्षिप्त नोट्स बनाने और तीन-चार दिनों के अंतराल पर उनकी रीडिंग करने से पढा गया लेसन हमेशा याद रहेगा। इससे स्कूल में होने वाले इंटर्नल एग्जैम के दौरान सिर्फ रिवीजन करना ही पर्याप्त होता।

नींद भी है जरूरी कुछ स्टूडेंट दसवीं में आने के बाद बोर्ड परीक्षा को लेकर इतने चिंतित हो जाते हैं कि पढाई के लिए देर रात तक जागते हैं और सुबह देर तक सो रहे होते हैं। अपने बच्चे में ऐसी आदत विकसित न होने दें। नींद पूरी न होने की वजह से सिर और हाथ-पैरों में दर्द, चिडचिडापन और याददाश्त में कमी जैसी समस्याएं परेशान करने लगती हैं। पाचन-तंत्र पर भी इसका बुरा असर पडता है। उसके सोने-जागने का सही समय निर्धारित करें और इस बात का ध्यान रखें कि वह रोजाना आठ घंटे की गहरी नींद ले।

बातों-बातों में पढाई आज स्कूल में क्या पढाया गया? बच्चे के साथ हलके-फुलके माहौल में इस विषय पर नियमित रूप से बातचीत की आदत डालें। इससे बातचीत के बहाने उसे क्लास में पढाई गई बातों को दोहराने का मौका मिलेगा। अगले दिन क्लास में जो चैप्टर पढाया जाएगा बच्चे से उस पर भी बातचीत करें। उसे रोचक ढंग से संबंधित विषय की संक्षिप्त जानकारी दें। इससे अगले दिन क्लास में वह टीचर की बातों को आसानी से समझ पाएगा। अगर उसे कोई बात समझने में दिक्कत आ रही है तो आप उसकी सहायता करें। बातचीत से उसके मन में यह आत्मविश्वास जगाएं कि अगर कोई बात समझने में परेशानी हो तो टीचर से दोबारा पूछने में झिझकना नहीं चाहिए। रोजाना बातचीत के दौरान स्कूल की पढाई से संबंधित जो भी समस्याएं सामने आती हैं, उन्हें एक डायरी में नोट करें और पेरेंट्स टीचर्स मीटिंग के दौरान क्लास और सब्जेक्ट टीचर से बातचीत के जरिये उनका हल ढूंढने की कोशिश करें। अगर वह अपने लक्ष्य से थोडा पीछे चल रहा हो तो उसे समझाएं कि नियमित अभ्यास से वह इस कमी को जल्द से जल्द पूरा कर ले। अन्यथा परीक्षा के दौरान उस पर पढाई का अतिरिक्त बोझ बढ जाएगा।

जब जरूरत हो सहयोग की अगर शुरू से नियमित पढाई की जाए तो आमतौर पर बच्चों को ट्यूशन या कोचिंग की जरूरत नहीं होती लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कडी प्रतियोगिता के इस युग में छात्रों पर सर्वाधिक अंक लाने का दबाव हमेशा बना रहता है। इसलिए अगर बच्चे को स्कूल के अलावा कोचिंग की मदद लेने की जरूरत महसूस हो तो इस बात को लेकर अपने मन में कोई हीन भावना न रखें कि मैं अपने बच्चे को खुद पढा नहीं पा रहा/रही हूं। समय के साथ अब सिलेबस में काफी बदलाव आ चुका है। यह जरूरी नहीं है कि हर पेरेंट अपने बच्चे को पढाने में सक्षम हो।

इसलिए जरूरत पडऩे पर ट्यूशन टीचर की मदद लेने में संकोच न बरतें। दसवीं कक्षा में जाने के बाद शुरुआती तीन महीने में ही आपको इस बात का अंदाजा हो जाएगा कि उसे किन विषयों को समझने में ज्य़ादा दिक्कत हो रही है। अगर ऐसी कोई समस्या हो तो बिना देर किए उसके लिए कोचिंग या ट्यूशन की व्यवस्था करवा दें। ट्यूशन टीचर से नियमित रूप से इस बात की जानकारी लेते रहें कि वह पढाई गई बातों को समझ पा रहा है या नहीं? इसके अलावा अपने बच्चे से भी कोचिंग सेंटर या टीचर के बारे में फीडबैक लेते रहें कि वहां उसे कोई परेशानी तो नहीं होती? अगर कभी टर्मिनल एग्जैम में उसे कम माक्र्स मिलें तो उसे डांटने के बजाय उसकी कमियों को पहचान कर उन्हें दूर करने में बच्चे की मदद करें।

अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगी तो अगले साल वह पूरी तरह तनावमुक्त होकर बोर्ड की परीक्षा देगा और नि:संदेह उसका रिजल्ट भी अच्छा होगा। ऑल द बेस्ट!