एक बार मेरे पास किसी व्यक्ति का फोन आया। उसने मुझसे कहा कि पत्नी की वजह से उसका दांपत्य जीवन बेहद तनावपूर्ण हो गया है। मैंने उसे अगले दिन पत्नी के साथ आने को कहा। असलियत आई सामने बातचीत से मालूम हुआ कि शादी को सत्रह साल हो चुके थे और उनकी दो बेटियां भी थीं। पति के पास पत्नी को लेकर कई तरह की शिकायतें थीं, मसलन वह उससे बहस करती है, घर के काम सही ढंग से नहीं करती, वगैरह। ...लेकिन उसकी पत्नी आभा ने मुझे जो कुछ बताया, वह सब सुनने के बाद उस व्यक्ति की पूरी असलियत सामने आ गई। दरअसल आभा और रोहित एक ही ऑफिस में जॉब करते थे और वह उसकी तरफ आकर्षित हो गई। रोहित ने उसकी इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए, उसके साथ फिजिकल रिलेशन बनाया। फिर उसने यह कहते हुए आभा को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया कि अगर तुमने मुझसे शादी नहीं की तो मैं तुम्हारे पेरेंट्स को अपने इस रिश्ते के बारे में सब कुछ बता दूंगा। फिर उसने आभा के बडे भाई से दोस्ती कर ली और अपने बनावटी व्यवहार से उसके माता-पिता पर भी इतना अच्छा इंप्रेशन जमाया कि उन्होंने रोहित के साथ उसका रिश्ता पक्का कर दिया। आभा शुरुआत से ही दब्बू किस्म की लडकी थी। इसलिए नापसंद होने के बावजूद वह इस रिश्ते का विरोध नहीं कर पाई। रिश्ते में बढती दूरियां शादी के कुछ ही महीने बाद रोहित ने यह कहते हुए जॉब छोड दिया कि उसके साथ बॉस का बर्ताव ठीक नहीं है। दोबारा उसने जॉब ढूंढने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। दरअसल प्रोजेक्शन नामक डिफेंस मेकैनिज्म रोहित के व्यवहार को संचालित कर रहा था। ऐसे लोग अपनी सारी कमजोरियों और बुराइयों को दूसरों में देखने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को हर इंसान में अपनी खामियां नजर आने लगती हैं। रोहित के साथ भी यही हो रहा था। बात-बात पर झगडऩा और पत्नी पर हाथ उठाना उसकी आदत में शुमार हो चुका था। पति के ऐसे व्यवहार से तंग आकर आभा ने लखनऊ छोड दिया। अपनी दोनों बेटियों के साथ वह दिल्ली चली आई और यहीं जॉब करने लगी। रोहित बार-बार उससे आग्रह करने लगा कि मैं भी तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं। आभा उस इंसान की फितरत को भली-भांति पहचानती थी। इसलिए उसने रोहित के सामने यह शर्त रखी कि हम दोनों को काउंसलिंग की जरूरत है और जब तक तुम इसके लिए राजी नहीं होगे, मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूंगी। इसी वजह से रोहित को काउंसलिंग के लिए आना पडा। संभल गई जिंदगी मैंने उन दोनों को बेटियों के भविष्य का हवाला देते हुए समझाया कि आपके इस झगडे की सजा बेकसूर बच्चियां क्यों भुगतें? उनकी खातिर अगर आप दोनों पूरी ईमानदारी से अपनी इस डगमगाती गृहस्थी को संभालने की कोशिश करेंगे, तभी इस समस्या का समाधान संभव है। इस मामले को सुलझाने में लगभग दो साल लग गए। मैंने रोहित से कहा कि आप बेशक लखनऊ में रहें पर अपनी बेटियों मे मिलने आते रहें। बेहतर तो यही होगा कि आपको भी अपने लिए यहीं काम ढूंढ लेना चाहिए। उसने मुझसे कहा कि मुझे थोडा वक्त चाहिए, मैं पूरी कोशिश करूंगा। हालांकि, इस मामले को लेकर मैं बहुत ज्य़ादा आशान्वित नहीं थी। फिर भी वे दोनों महीने-दो महीने बाद फोन करके मुझसे मिलने चले आते। एक रोज आभा ने मुझे फोन करके बताया कि रोहित को यहीं जॉब मिल गई है। अब उनके व्यवहार में भी सुधार आ रहा है। मैंने आभा को उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं देते हुए कहा कि चलो, देर से ही सही पर तुम दोनों को गलती का एहसास तो हुआ, जब जागो तभी सवेरा।