जीवन में सदा अच्छी घटनाएं नहीं होतीं, न ही मन में हमेशा नेक विचार पनपते हैं। कभी-कभी नकारात्मक विचार घेरते हैं। हम प्रेम करते हैं तो कभी नफरत भी हम पर हावी होती है। किसी भी बुरे विचार को मन से निकालने का तरीका है, उसके विपरीत विचार को मन में लाएं। लेखिका कमला दास ने कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली में आयोजित एक साहित्यिक आयोजन में सच्ची मगर प्रेरक कहानी सुनाई थी। लेखिका अपनी आत्मकथा 'माय स्टोरी' के लिए जानी जाती हैं। इस पर फिल्म बनाने की योजना है, जिसमें विद्या बालन उनका किरदार निभाएंगी। वह कहानी सिखाती है कि घृणा को कैसे प्रेम में बदला जा सकता है। उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत है यह कहानी- चमत्कार संभव है एक बार मैं नदी किनारे सैर कर रही थी। तभी बदहवास सी स्थिति में एक लडकी को दौडते देखा। मुझे भांपते देर न लगी कि वह जीवन से निराश होकर आत्महत्या करने आई है। मैं दौडी, लडकी का हाथ खींचकर किनारे लाई। उससे पूछा कि आखिर ऐसा क्या हो गया, जो उसने जीवन को खत्म करने की ठान ली? थोडा शांत होने के बाद लडकी ने बताया कि उसके जीवन में प्यार नहीं है। उसकी चाची उसे बदसूरत कह कर चिढाती है, कहती है कि उससे कोई शादी नहीं करेगा। जिस लडके से प्यार करती थी, वह भी किसी दूसरी लडकी से शादी करने जा रहा है...। उसके दिल में नफरत भरी थी। मैंने उसे एक कागजात और पेन दिया और कहा, एक तरफ उन चीजों या लोगों के नाम लिखे, जो उसे सबसे प्रिय हैं और दूसरी तरफ ऐसे लोगों के नाम लिखे, जिनसे वह नफरत करती है। लडकी ने वैसा ही किया। नफरत वाले कॉलम में सबसे ऊपर उसकी चाची और बॉयफ्रेेंड का नाम था तो प्रेम वाली सूची में नीलम (दक्षिण भारत में मिलने वाले आम की खास किस्म) लिखा था। मैंने उससे कहा कि अब वह अपनी सबसे प्रिय वस्तु उसे भेंट करे, जिससे सबसे अधिक घृणा करती है। लडकी नाराज हो गई। काफी समझाने के बाद वह तैयार हुई। प्रिय-अप्रिय का मेल वह जुलाई का महीना था और नीलम आमों की बहार थी। अगले दिन ही लडकी आमों की टोकरी लिए चाची के घर गई। जब उसने प्रेमपूर्वक वह टोकरी चाची को थमाई तो उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने लडकी को गले से लगा लिया और बोलीं, इतना बुरा-भला कहने के बावजूद तुम मुझसे प्यार करती हो? तुम सचमुच बहुत भली हो। अगले दिन लडकी आमों की टोकरी और गिफ्ट्स लेकर अपने बॉयफ्रेेंड से मिलने गई। उसे शादी की मुबारकबाद देते हुए कहा कि वह एक नए जीवन में जा रहा है, आशा है उसे सच्ची मुहब्बत मिलेगी। यह सुन कर वह लडका बडा शर्मिंदा हुआ और माफी मांगने लगा...। उसे अपने किए पर पछतावा था। मिट गई नफरतें ...इस घटना के कुछ महीनों बाद वह लडकी मेरे पास आई। दूर से ही उसके चेहरे पर नजर आते आत्मविश्वास को मैं देख सकती थी। उसने खुश होकर कहा, आमों ने तो चमत्कार कर दिखाया। पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है। सच्चाई यही है कि जब हम दूसरों को माफ करते हैं तो स्वयं भी अपराध-बोध से मुक्त होते हैं और खुद को माफ करते हैं। नफरत मिटती है तो दिल को सुकून मिलता है। इंदिरा