अपनों से सभी को लगाव होता है लेकिन कुछ लोग उनके सामने अपनी भावनाओं का खुलकर इजहार नहीं कर पाते, जिससे उनके रिश्तों में कई तरह की गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं। इसलिए रिश्ता चाहे कोई भी हो, उसकी मजबूती के लिए दूसरों के सामने खुलकर अपनी भावनाओं का इजहार भी करना चाहिए।

आज भले ही मैं कामयाब जिंदगी जी रहा हूं पर मेरे मन में हमेशा इस बात का मलाल रहा कि पिछले तीस वर्षों में मेरे पिता ने मुझे एक बार भी शाबाशी नहीं दी। बाहर सब मेरी काबिलीयत की बहुत प्रशंसा करते हैं पर मैं अपने पिता के मुंह से 'शाबाश बेटा! सिर्फ ये दो शब्द सुनने को तरस गया। 'मैं दिखने में अच्छी-भली हूं। जब भी किसी पार्टी में जाती हूं, वहां सब मुझे कॉम्प्लिमेंट करते हैं पर मुझे याद नहीं आता कि पिछले सात वर्षों में मेरे पति ने एक बार भी मेरी तारीफ की हो।

भावनाओं की अभिव्यक्ति क्यों जरूरी है, इसी विषय पर बातचीत के दौरान मनोवैज्ञानिक सलाहकार विचित्रा दर्गन आनंद ने इन दो लोगों के अनुभवों का जिक्र किया। दरअसल ये दोनों उनके पास काउंसलिंग के लिए आए थे क्योंकि अपनों की बेरुखी से पैदा होने वाली गहरी उदासी उन्हें डिप्रेशन की ओर ले जा रही थी। काउंसलिंग की कई सिटिंग्स के बाद उनकी समस्या तो दूर हो गई लेकिन हमारे लिए यह सवाल छोड गई कि रिश्तों को जीवंत बनाए रखने के लिए भावनाओं का इजहार क्यों जरूरी है और कुछ लोग इस मामले में कंजूस क्यों होते हैं?

खुल कर जी लें जरा हमारे आसपास कई ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें समझ पाना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि वे दूसरों के सामने अपने मन की बातें खुलकर नहीं रख पाते। ऐसे लोग कब खुश और कब नाराज हैं, यह जानना बहुत मुश्किल होता है। कई बार ऐसे लोग दिल के बहुत अच्छे होते हैं लेकिन अति संकोची स्वभाव की वजह से ये अपनों के सामने भी अपनी पसंद-नापसंद को जाहिर नहीं कर पाते। आसपास के लोगों को इनका व्यक्तित्व जटिल और रहस्यमय लगने लगता है, इसलिए वे इनसे दूरी बना लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि परिवार के सदस्यों से उनका हाल पूछना, खुद आगे बढकर उनकी मदद करना, उन्हें गिफ्ट देना, ऐसी छोटी-छोटी बातों से भी रिश्ते में मजबूती आती है। अपनों के लिए हमारे दिल में केवल प्यार होना ही काफी नहीं, बल्कि गाहे-बगाहे अपने प्यार का एहसास दिलाना भी जरूरी होता है। अगर आपके मन में अपनों के प्रति प्यार और सम्मान है तो उसे जाहिर करने में जरा भी संकोच न बरतें।

बदलते वक्त की जरूरत जो लोग इंट्रोवर्ट और शर्मीले होते हैं, वे पहले से ही यह मानकर चलते हैं कि दूसरा व्यक्ति बिना कुछ कहे केवल हाव-भाव से ही उनके मन की बातें समझ जाएगा। कुछ हद तक यह बात ठीक भी है कि अगर हमारा कोई अपना ज्य़ादा खुश या परेशान होता है तो हम उसे देखते ही उसके मन की बात समझ जाते हैं लेकिन आज की भाग-दौड भरी जिंदगी में लोगों के पास इतना वक्त नहीं होता कि वे बिना कहे ही दूसरों के मन की बातें समझ जाएं। ऐसे में कुछ लोग यह सोचकर मन ही मन घुट रहे होते हैं कि मैं उदास हूं, फिर भी किसी ने मेरा हाल तक नहीं पूछा। इससे सामने वाले व्यक्ति के मन में उसकी नकारात्मक छवि विकसित होती है। कुछ लोग भावनाओं के इजहार को दिखावा समझते हैं पर वास्तव में ऐसा नहीं है। अपनों के साथ सहज संवाद बनाने के लिए उनके सामने भावनाओं की अभिव्यक्ति जरूरी है।

छिपाएं नहीं नाराजगी बात केवल अच्छी भावनाओं की नहीं है बल्कि दुख और नाराजगी जैसी नकारात्मक भावनाओं को भी हमें लंबे समय तक दबा कर नहीं रखना चाहिए। झूठ की बुनियाद पर कोई भी रिश्ता लंबे समय तक नहीं टिक सकता। कभी न कभी सच्चाई सामने आ ही जाती है। मनोवैज्ञानक सलाहकार विचित्रा दर्गन आगे कहती हैं, 'रिश्तों की मजबूती के लिए उनके प्रति ईमानदारी होना बहुत जरूरी है। चाहे परिवार के सदस्य हों या दोस्त, अगर उनके प्रति मन में कोई शिकायत या नाराजगी है तो उसके सामने बेवजह झूठा अपनत्व दिखाना अनुचित है। इससे आपकी नाराजगी कुंठा में बदल जाएगी, मन अशांत रहेगा और व्यवहार में चिडचिडापन आने लगेगा। केवल उसके साथ ही नहीं बल्कि अन्य लोगों से भी संबंध खराब हो सकते हैं। इसलिए बेहतर यही होगा कि अगर किसी करीबी व्यक्ति के प्रति आपके मन में नाराजगी हो तो शालीनता के साथ उसे यह जरूर समझाएं कि आप उससे क्यों नाराज हैं, इससे आपका मन हलका हो जाएगा। अगर वह व्यक्ति समझदार होगा तो भविष्य में उसके साथ आपके रिश्ते में मधुरता बनी रहेगी। अगर कोई व्यक्ति आपके ऐसे ईमानदार व्यवहार पर नाराज होता है तो सचेत हो जाएं और उसके साथ सम्मानजनक दूरी बनाए रखें।

दूर करें गलतफहमी चाहे घर हो या ऑफिस, हर जगह लोगों के विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक है। जैसे हम खुद को सही मानते हैं, उसी तरह दूसरों के विचारों की भी उतनी ही अहमियत है। असहमति के बावजूद दूसरों की बातें ध्यान से सुनने के साथ हमें उनके विचारों का सम्मान भी करना चाहिए। केवल सोच में फर्क की वजह से लोगों के आपसी रिश्ते में दरार नहीं आनी चाहिए।

दिल्ली की रंजना सिंह पेशे से शिक्षिका हैं। वह बताती हैं, 'मैं दिल से आस्तिक हूं और कई तरह के व्रत-उपवास रखती हूं। जब बेटे की शादी हुई तो मैंने बहू से भी व्रत रखने को कहा लेकिन उसने कहा कि इससे उसकी तबीयत खराब हो जाती है। इसलिए वह व्रत के सारे नियम नहीं निभा पाएगी। थोडी देर के लिए बुरा जरूर लगा पर मुझे उसकी यह ईमानदारी पसंद आई। अगर वह मुझसे झूठ बोलकर मेरे सामने व्रत रखने का दिखावा करती तो मुझे ज्यादा दुख होता। अब मैं उस पर कोई पाबंदी नहीं लगती। वह भले ही खुद पूजा-पाठ नहीं करती पर व्रत-त्योहार की तैयारी में मेरी पूरी मदद करती है। इस तरह वैचारिक मतभेद के बावजूद हमारे रिश्ते में मधुरता बरकरार है। अपनी भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति के साथ अगर हम दूसरों की खुशियों का भी खयाल रखें तो हमारे पारिवारिक-सामाजिक संबंधों में मधुरता बनी रहेगी।