संगीत में विधिवत ट्रेनिंग न लेने के बावजूद सुनिधि चौहान आज फिल्म इंडस्ट्री की बडी गायिकाओं में शुमार हैं। जीवन में कई उतार-चढावों का सामना करने वाली सुनिधि चुनौतियों से नहीं घबरातीं। अभी वह म्यूज्िाक शो द वॉयस इंडिया में मेंटर और कोच की भूमिका में नज्ार आ रही हैं। इस प्रतिभाशाली युवा गायिका से संगीत को लेकर हुई लंबी बातचीत।

पांच साल की उम्र में पहली बार स्टेज पर आने वाली शर्मीली सी बच्ची सुनिधि चौहान आज संगीत की दुनिया का बडा नाम है। सुनिधि के लिए संगीत ऑक्सीजन की तरह है। यूं तो उनकी स्कूली शिक्षा दसवीं से आगे नहीं बढ पाई, लेकिन संगीत की दुनिया में वह बहुत आगे निकल आई हैं। अभी वह एंड टीवी के म्यूज्िाक शो 'वॉयस इंडिया में कोच और मेंटर की भूमिका में नज्ार आ रही हैं। इस शो और संगीत के बारे में उनसे हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश।

सुनिधि, लंबे समय के बाद आप किसी रिअलिटी शो में नज्ार आ रही हैं। कहां थीं इतने दिन?

अरे....मैं तो यहीं थी। अपने शोज्ा और रिकॉर्डिंग्स में व्यस्त थी। हां, बीच में टीवी के कई शोज्ा का ऑफर ठुकराया भी, क्योंकि वे मुझे नहीं जंच रहे थे। अब वॉयस इंडिया में एक बार फिर आ रही हूं। यह शो थोडा अलग है। इसमें मुझे नई प्रतिभाओं का कोच और मेंटर बनने का मौका मिला है। सिखाने का मौका था तो क्यों चूकती!

आजकल आपके फेसबुक पर जिमिंग की काफी तसवीरें नज्ार आ रही हैं। वज्ान भी ख्ाूब घटाया है आपने। कैसे किया यह सब?

मैं स्वस्थ और फिट रहना पसंद करती हूं। बीच में मेरा वज्ान काफी बढ गया था। मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। फिर एक दिन सोचा कि वर्कआउट करना है और बस, शुरू हो गई। मैं फिटनेस रुटीन पूरी तरह फॉलो कर रही हूं। इससे मुझे ख्ाुशी मिलती है। मैं फिटनेस रुटीन के विडियोज्ा पोस्ट करना नहीं भूलती, ताकि लोग देखें और इससे प्रेरित हों। मैं चाहती हूं कि ज्य़ादा से ज्य़ादा लोग फिटनेस को अपनाएं, ताकि सेहत भरी ज्िांदगी जी सकेें।

आपने बहुत ही कम उम्र से स्टेज पर गाना शुरू कर दिया था। जहां तक हमें पता है, कोई म्यूज्िाक ट्रेनिंग भी नहीं हुई आपकी। फिर कौन सी प्रेरणा थी कि आप संगीत में आ गईं?

बचपन से ही लता जी, किशोर दा और उस समय के लगभग सभी नामी सिंगर्स के गाने मुझे अभिभूत करते थे। मैं उनके गाने गाती रहती थी। कोई भी मुझे गाने से नहीं रोक सकता था। मैं अकेले बैठ कर घंटों प्रैक्टिस करती थी। तब तो मुझे इतना भी पता नहीं था कि गाना सीखने के लिए गुरु की ज्ारूरत होती है। हालांकि अब मैं महसूस करती हूं कि किसी भी फील्ड में ट्रेनिंग का अपना महत्व होता है। यह नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि आपको परिष्कृत करती है।

आपने उस समय गाना शुरू किया, जब टीवी पर रिअलिटी शोज्ा नहीं थे, लेकिन अब इनकी संख्या बढ गई है। क्या आपको लगता है कि इन शोज्ा से वास्तविक प्रतिभाओं को प्लैटफॉर्म मिलता है?

मैं कभी रिअलिटी शो का हिस्सा नहीं रही। नेशनल चैनल पर एक गायन प्रतियोगिता में मैंने हिस्सा लिया था। हमारे समय में यह सब नहीं था, लेकिन मुझे ख्ाुशी है कि आज ऐसे बहुत से रिअलिटी शोज्ा हैं, जो छिपी हुई प्रतिभाओं को सुनहरा मौका दे रहे हैं। अगर किसी में सचमुच प्रतिभा है तो उसे कोई नज्ारअंदाज्ा नहीं कर सकता। हमारे शो वॉयस इंडिया का पूरा कॉन्सेप्ट ही अलग है। इसमें हमें केवल आवाज्ा सुनाई देती है, हम गाने वाले को नहीं देख सकते। आवाज्ा के बल पर ही हमें उसकी प्रतिभा का आकलन करना होता है। मुझे लगता है कि हमारे देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। ऐसे शोज्ा के ज्ारिये वे सामने आएंगी और उन्हें ख्ाुद को साबित करने के लिए बेहतरीन मंच मिलेगा।

संगीत की दुनिया में रोज्ा कोई न कोई नई आवाज्ा आती है। ऐसे में कडी प्रतिस्पर्धा भी होती होगी। किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पडता है?

ईमानदारी से कहूं तो मैं संगीत को प्रतिस्पर्धा की तरह देखती ही नहीं। हर नई प्रतिभा के लिए यहां जगह है। कोई भी अपनी काबिलीयत के बल पर ही सफल होता है। ईश्वर की कृपा से जो भी मेहनत करता है, उसे कभी न कभी सफलता ज्ारूर मिलती है। संगीत में मेरे सामने हमेशा एक ही चुनौती होती है और वह है- हर नए गाने के प्रति नया नज्ारिया अपनाना, उसके भावों के हिसाब से अपनी आवाज्ा को उसके अनुकूल बनाना।

आपकी आवाज्ा काफी पावरफुल है। कैसे गाने सूट करते हैं आपको? किस तरह के गाने पसंद हैं?

मैं हर तरह का गाना पसंद करती हूं। लेकिन मैं मूडी भी हूं। कई बार किसी ख्ाास वक्त में जो भी महसूस करती हूं या मुझे लगता है कि किसी गाने को विशेष तरह से गाने पर वह ज्य़ादा ख्ाूबसूरत लगेगा तो ऐसा ज्ारूर करती हूं। यह अनायास ही हो जाता है।

आपको अपने कौन से गाने ज्य़ादा पसंद हैं?

िफलहाल तो मेरे फेवरिट गानों में 'आ ज्ारा (मर्डर), 'भागे रे मन (चमेली) और 'गल्र्स लाइक टु स्विंग (दिल धडकने दो) सबसे ऊपर हैं।

अब तो इस इंडस्ट्री में आपको लंबा वक्त हो चुका है। इतने अवॉड्र्स मिल चुके हैं। गाना चुनने से पहले किन बातों का ध्यान रखती हैं आप?

मैं गानों के मामले में बहुत चूज्ाी नहीं हूं, क्योंकि मुझे लगता है कि हर गाने की अपनी अलग ख्ाूबसूरती है। हां, इतना तो है कि यदि कोई गाना मुझे अनकंफर्टेबल लगे या उसके बोल मुझे ठीक न लगें तो मैं तुरंत बिना झिझके उसे ना कह देती हूं।

आज कई अभिनेत्रियां भी गाना गाने लगी हैं। टेक्नीक ने गाने को आसान बना दिया है। क्या टेक्नीक आवाज्ा और म्यूज्िाक की समझ पर भारी पड रही है?

सचमुच टेक्नीक ने बहुत कुछ आसान किया है। मुझे बदलाव भाता है और मुझे लगता है कि हर बदलाव का दिल खोल कर स्वागत किया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि हमें वह सब करना चाहिए, जो हम करना चाहते हैं। हम सभी जानते हैं कि टेक्नीक से मदद मिलती है, लेकिन फिर यह भी समझते हैं कि यह असल चीज्ा नहीं है। असल चीज्ा तो म्यूज्िाक है।

संगीत में पहले गुरु-शिष्य परंपरा थी, अब म्यूज्िाक स्कूल्स हैं। क्या आने वाला दौर इन स्कूल्स का है?

मैं इन स्कूल्स के बारे में साफ-साफ कुछ नहीं कह सकती, क्योंकि इन्हें कभी देखा नहीं। मैं कभी इनका हिस्सा नहीं रही। लेकिन मेरी शुभकामनाएं इनके साथ हैं। जो लोग भी संगीत का प्रचार-प्रसार करें, मैं उनके साथ हूं।

देश-विदेश में आप कार्यक्रम करती हैं। कई अनुभव होते होंगे। किस जगह के श्रोताओं ने दिल जीता?

कई यादगार घटनाएं हैं मेरे पास। हर जगह माहौल अलग होता है, श्रोता अलग होते हैं। संगीत ही वह सूत्र है, जिससे हम जुडे होते हैं। वैसे मेरे लिए सबसे यादगार क्षण था लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में गाना। वहां श्रोताओं के प्रेम और स्नेह ने मेरी आंखें नम कर दी थीं।

रिअलिटी शोज्ा में जज बनने का अनुभव कैसा रहा? आप तो कई शोज्ा में निर्णायक रह चुकी हैं। कैसी प्रतिभाएं आ रही हैं संगीत के क्षेत्र में? क्या छोटे शहरों की प्रतिभाओं को मौका मिल पाता है?

म्यूज्िाक शोज्ा में निर्णायक मंडल का हिस्सा बनना मेरे लिए हमेशा अच्छा अनुभव रहा है। इनसे संगीत को आगे बढाने, नई प्रतिभाओं से रूबरू होने का मौका मिलता है। मैं यहां हर दिन कोई नई आवाज्ा सुनती हूं, नए लोगों से मिलती हूं। एक आर्टिस्ट के तौर पर मैं उनसे सीखती भी हूं और मुझे उनके ज्ारिये ख्ाुद का विकास करने का मौका मिलता है। ऐसे शोज्ा के ज्ारिये वास्तविक प्रतिभाएं सामने आ रही हैं। अपनी टीम के साथ मैं अपने अनुभवों, प्यार-स्नेह और संगीत की अपनी समझ को बांटना चाहती हूं। यह मेरी दिली ख्वाहिश भी है।

इंदिरा राठौर

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