पिछले कुछ समय से फिल्म इंडस्ट्री में राधिका आप्टे की काफी चर्चा हो रही है। पिछले साल उनकी कई फिल्में आईं। उनमें 'बदलापुर, 'हंटर, 'मांझी- द माउंटेन मैन में उनके अभिनय को सराहा गया। सुजॉय घोष की शॉर्ट फिल्म

'अहिल्या में भी उन्हें पसंद किया गया। जल्दी ही वह एक वेब सीरीज में भी दिखेंगी। हाल ही में उनकी फिल्म 'फोबिया आई है। फिल्मों और जीवन के अन्य पहलुओं पर उनसे एक बातचीत।

आप अभिनय की हर विधा में हाथ आजमा रही हैं। इंडस्ट्री में किस प्लैनिंग के साथ आई थीं?

मैंने कभी कोई रणनीति नहीं बनाई। मेरी जिंदगी का यही फलसफा है कि काम करो और खुश रहो। अपनी सोच को पॉजिटिव रखो। प्रोजेक्ट पसंद आता है, तभी स्वीकारती हूं। मुझे एक्सपेरिमेंट्स पसंद हैं। मैं ऐक्टिंग के नए आयामों को छूना चाहती हूं। एक जैसा काम करने में एक्साइटमेंट नहीं होता। प्रयोग करते रहने से दर्शकों को भी विविधता मिलती है और वे हमसे कुछ नया और रोचक पाने की उम्मीद भी रखते हैं। भविष्य में जल्दी ही एक नई वेब सीरी•ा भी करूंगी।

आपकी साइको थ्रिलर फिल्म 'फोबिया एगोराफोबिया पर बेस्ड है। इससे पहले फिल्म 'तारे जमीं पर आई थी, जो डिस्लेक्सिया पर आधारित थी। ये फिल्में समाज को किस दिशा में ले जाती हैं?

इस फिल्म में एक लडकी की कहानी है, जो एगोराफोबिया से पीडित है। इस बीमारी से पीडित शख्स को आसपास के माहौल से जुडी किसी भी सामाजिक स्थिति का सामना करने में घबराहट होती है। वह भीडभाड वाली जगहों पर जाने से डरता है। दरअसल अभी हमारे देश में लोग इस बीमारी से ज्यादा वाकिफ नहीं हैं। अगर किसी को पैनिक अटैक आ जाए तो उसे पागल समझने की भूल कर बैठते हैं। निर्देशक पवन कृपलानी ने दो साल पहले मुझसे इसका आइडिया शेयर किया था। तब इसकी स्क्रिप्ट भी तैयार नहीं थी। संयोग से उस समय मैं पैनिक डिसॉर्डर पर काम कर रही थी। यह किसी अन्य प्रोजेक्ट के सिलसिले में था। लिहाजा मुझे आइडिया पसंद आया। लगा कि इससे लोगों में जागरूकता बढेगी। किरदार के लिए मैंने काफी रिसर्च की। मेरे पिता न्यूरो सर्जन हैं। मेरे एक परिचित साइकोलॉजिस्ट हैं। उन दोनों से मैंने मदद ली ताकि बीमारी के बारे में गहराई से जान सकूं। इन्हीं दोनों के कारण इस जटिल किरदार को आत्मसात कर पाई। इसके अलावा मैंने कुछ किताबें पढी। मेरे एक दोस्त एगोराफोबिया से पीडित हैं तो बीमारी से मैं थोडा परिचित थी। इसके अलावा मैंने कुछ विडियो•ा भी देखे, जिसमें दिखाया गया था कि पैनिक अटैक होने पर इंसान कैसा व्यवहार करता है। इसमें दिल की धडकन बढ जाती है, पसीना आने लगता है, मसल खिंचने के कारण गले से आवाज नहीं निकलती, सांस लेने में मुश्किल होती है।

राधिका, आप थोडा आउट ऑफ बॉक्स किरदार प्ले करना ज्यादा पसंद करती हैं। ग्रे शेड्स में भी आप अकसर न•ार आती हैं। क्या आपको ऐसे रोल्स ही पसंद हैं?

देखिए, इसका कारण स्पष्ट है। हम सब में कहीं न कहीं ग्रे शेड्स हैं। हकीकत में कोई भी ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होता। फोबिया में भी मेरा ग्रे शेड ही नजर आता है। दर्शकों को इस किरदार की कुछ चीज्ों पसंद आएंगी-कुछ नहीं। आम जिंदगी में भी ऐसा ही होता है। ऐसा नहीं होता कि किसी शख्स के भीतर सारे गुण ही गुण हों या सारी बुराइयां ही हों।

लंबे संघर्ष के बाद आपको पहचान मिल रही है। ऐसे में पांच साल बाद इंडस्ट्री में खुद को कहां देखती हैं?

हाल के वर्षों में फिल्म इंडस्ट्री ने महिला प्रधान फिल्में बनानी शुरू कर दी हैं और मेरी जैसी लडकियों के लिए यह बहुत अच्छा है कि हमें कुछ अच्छे किरदार निभाने को मिल रहे हैं। मैं भी कुछ स्त्री केंद्रित भूमिकाएं कर रही हूं। देखिए, 'पीकू, 'तनु वेड्स मनु रिटन्र्स जैसी फिल्में आईं और इन्हें दर्शकों और समीक्षकों का बहुत प्यार मिला। उम्मीद है कि नई कहानियां कहने का ट्रेंड जारी रहेगा। तकनीक के स्तर पर भी हम और उन्नत होंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सिनेमा की पैठ बढेगी। हमारी फिल्में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में लगातार प्रदर्शित हो रही हैं। इन्हें सराहना भी मिल रही है, तभी तो बाहर के फिल्ममेकर यहां आकर भारतीय फिल्म निर्माताओं के साथ फिल्में बनाने लगे हैं। मेरा मानना है कि फिल्म इंडस्ट्री का भविष्य उज्ज्वल है, लिहाजा आगे मेरा भविष्य सुरक्षित होगा, ऐसा महसूस करती हूं। अच्छी ऐक्टिंग से दर्शकों को खुश कर सकूं, यही चाहती हूं।

आपने यहां तक पहुंचने के लिए लंबा संघर्ष किया है। पीछे मुड कर देखने पर कैसा लगता है...?

संघर्ष अभी भी जारी है। फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष कभी खत्म नहीं होता। कैमरे के सामने हों तो अच्छी परफॉर्मेंस के लिए, बेहतर रोल के लिए तो कभी अपने लुक को मेंटेन करने के लिए। संघर्ष कई स्तरों पर होता है। मुझे यहां 11 साल होने को हैं। अच्छे रोल्स की भूख है जो लगातार बढ रही है, लिहा•ाा संघर्ष भी जारी रहेगा।

हम रोज ही लडकियों को किसी न किसी चुनौती से जूझते देखते हैं। सेफ्टी एक बडा मसला है स्त्री के लिए। आप इस बारे में क्या सोचती हैं?

समाज में कोई भी परिवर्तन तभी आता है, जब घर से इसकी शुरुआत हो। बदलाव की बयार तो पहले घर से ही आती है। बच्चों की परवरिश में भेदभाव न करके इसकी शुरुआत होगी। उन्हें सिखाना होगा कि लडका-लडकी बराबर हैं। सोच बदलेगी, तभी दुनिया भी बदलेगी। मुझे लगता है कि वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए स्त्रियों को खुद भी सजग रहना होगा। आए दिन ईव टी•िांग या रेप जैसी खबरें आती हैं। लडकियों को आत्मरक्षा के गुर सीखने चाहिए, ताकि जरूरत पडने पर वे अपनी सुरक्षा कर सकें।

असल जिंदगी में आपको कभी असुरक्षा महसूस हुई?

दुनिया में शायद ही कोई हो, जिसे कभी असुरक्षा न महसूस हुई हो। इसके कारण अलग-अलग हो सकते हैं। कोई करियर को लेकर असुरक्षित महसूस करता है तो कोई प्यार को लेकर। मेरा मानना है कि असुरक्षा को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए, उसे मात देने की कोशिश करनी चाहिए। अगर आप शंकाओं में घिरे रहेंगे तो अपनी बेहतरी के बारे में कैसे सोच पाएंगे? कभी-कभी मैं भी असुरक्षा-भाव से घिरती हूं, लेकिन फिर जल्दी ही इससे बाहर निकल जाती हूं।

आपने एक तमिल फिल्म में साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत के साथ काम किया। कैसा रहा यह अनुभव?

मैं रजनीकांत सर की फैन हूं। उनके साथ काम करना मेरे लिए सपने जैसा था। इतने बडे स्टार होने के बावजूद वह सरल और सहज हैं। कभी लगा ही नहीं कि किसी सुपर स्टार के साथ काम कर रही हूं। वह बहुत अनुशासित मगर हंसमुख हैं। उनसे मुझे बहुत सीखने को मिला। मैं उनके साथ दोबारा काम करने की इच्छुक हूं।

ऐक्टिंग में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को कोई संदेश देंगी?

मुझे नहीं लगता कि मैं किसी को सलाह दे सकती हूं। अभी तो मैं खुद को ही समझाती रहती हूं कि धैर्य कैसे रखें। इस फिल्म इंडस्ट्री में पल में तोला-पल में माशा वाली कहावत चरितार्थ है। यह किसी को रातोंरात सुपर स्टार बना देती है तो कोई एडियां घिसता रह जाता है। कई वर्ष बाद उसे मुकाम मिलता है। इसलिए धैर्य रखना जरूरी है। काम से प्यार करना और उसे शिद्दत से करना भी जरूरी है। बिना मेहनत के तो किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिल सकती।

स्मिता श्रीवास्तव