उत्तर प्रदेश के बिजनौर से वाया दिल्ली होते हुए मुंबई में रच-बस गए सुशांत सिंह फिल्मों एवं टीवी का परिचित चेहरा हैं। उन्हें उनके ग्रे शेड किरदारों, घनी रौबीली मूंछों और प्रभावशाली आवाज के लिए पहचाना जाता है। फिल्मों में भले ही उन्होंने नकारात्मक किरदार ज्यादा निभाए मगर निजी जिंदगी में वह पारिवारिक, संवेदनशील और सहज व्यक्ति हैं। उनकी जिंदगी के दूसरे पहलू को देखें उनकी नजर से। गुजारा कहां कहां से बता दूं कि बिजनौर की जाट फैमिली में मेरा जन्म हुआ। स्कूलिंग बिडला विद्या मंदिर नैनीताल से हुई। थिएटर का चस्का भी वहीं से लगा। दिल्ली के किरोडीमल कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। अब माता-पिता मेरठ शिफ्ट हो गए हैं तो बिजनौर जाना कम ही होता है। दिल्ली दिल में खास जगह रखती है। वहीं से थिएटर का शौक परवान चढा। 'परिक्रमा' ग्रुप से जुडा और उसका पहला आर्ट डायरेक्टर बना। मंडी हाउस मेरे लिए घर की तरह था। यहीं इश्क किया और जीवन भर साथ निभाने का वादा किया। यह 1993 की बात है, जब मैंने कथक सीखने दिल्ली आई एक लडकी को देखा। उसके लंबे बालों ने मुझे बांध लिया। आज वही लडकी मोलिना मेरी पत्नी और मेरे दो बच्चों की मां है। मां, दीदी, टीचर, दोस्त मेरे जीवन में स्त्रियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। मां, टीचर्स और दीदी (दुर्भाग्य से दीदी अब इस दुनिया में नहीं हैं) मेरी जिंदगी का केंद्रबिंदु रहीं। मैं आज जो भी हूं, इन्हीं के कारण हूं। पापा ऐक्टिंग के प्रति मेरे रुझान से उतने खुश नहीं थे, दीदी ने ही उन्हें समझाया। वह जीवन के हर मोड पर मेरे साथ खडी रहीं। इसके अलावा कॉलेज से लेकर संघर्ष के दिनों तक दोस्त ही थे, जिन्होंने हर उतार-चढाव में साथ दिया। मेरा ज्य़ादा समय हॉस्टल में बीता है, शायद इसलिए रिश्तों और दोस्तों की कीमत मुझे पता है। स्याह-सफेद से परे सिनेमा ही नहीं, जीवन में भी सब कुछ स्याह-सफेद नहीं होता। मैंने ग्रे शेड्स किरदार ज्यादा निभाए हैं। हम सबके भीतर कोई न कोई नकारात्मकता छिपी होती है। जब हम नकारात्मक किरदार प्ले करते हैं तो हमारी नेगटिव एनर्जी बाहर निकल जाती है। इसलिए परदे पर नेगटिव रोल करने वाले आर्टिस्ट निजी जीवन में उदार व नरम दिल वाले होते हैं। कई बार कैरेक्टर से बाहर निकलना मुश्किल होता है लेकिन दिल्ली में इब्राहिम अलकाजी के साथ मैंने ग्रीक थिएटर किया है। इससे मुझे बहुत मदद मिली है। कुछ खोकर पाना है एक दौर था, जब कविताओं, फिल्मों, पेंटिंग्स की दुनिया मुझे लुभाती थी। अभी भी फुर्सत मिलने पर जरूर पढता हूं, मनोविज्ञान, साइंस, फिक्शन....जो भी मिले। पहले मैं और मोलिना रोज रात को डीवीडी पर फिल्में देखते थे। मैं कविताएं लिखता था। व्यस्तता बढी तो लिखना छूट गया। लेखन अभ्यास की कला है, नहीं लिखेंगे तो यह कला खो जाएगी। अब लिखता भी हूं तो पहले जैसा मजा नहीं आता। मोलिना को भी बच्चों की परवरिश और मेरी व्यस्तता के कारण डांस से ब्रेक लेना पडा। हालांकि अब वह फिर से फॉर्म में लौटी हैं। अभी वह ओडिशी सीख रही हैं। मैंने अभी प्रकाश झा की फिल्म 'लिपस्टिक अंडर माइ बुर्का' की शूटिंग पूरी की है। इसमें नई फीमेल डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव हैं। फिल्म में चार नायिकाएं हैं। यह है ही महिला प्रधान फिल्म। मैं कोंकणा सेन का पति बना हूं। यह एक डार्क कॉमेडी है। मैं बहुत महत्वाकांक्षी नहीं हूं। मुझे पता है, कहां काम जरूरी है और कहां फैमिली। रिश्तों को समय देना मुझे आता है। आखिर परिवार के लिए ही तो इतनी मेहनत कर रहा हूं...। प्रस्तुति : इंदिरा राठौर