अभिनेत्री हुमा कुरेशी ने अभिषेक बच्चन के संग विज्ञापन फिल्म और फिर अनुराग कश्यप की फीचर फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' से अपने करियर का आगाज किया। अब तक उनके खाते में नौ फिल्में दर्ज हैं। उन्होंने अधिसंख्य में अनकन्वेंशनल रोल निभाए हैं। सखी के साथ एक नजर उनके करियर ग्राफ पर...।

एक थी डायन, 'डी-डे और 'डेढ इश्किया में हुमा ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की। हाल-िफलहाल 'बदलापुर में उनके काम की काफी सराहना हुई। आगे वे अपने भाई साकिब सलीम संग 'ऑक्युलस में भी नजर आएंगी। उनका फलसफा स्पष्ट है। वे परफॉर्मेंस केंद्रित फिल्में ही करना चाहती हैं।

वजूद का अर्थ

'एनएच 10 को मिली सफलता और इन दिनों चारों तरफ 'मार्गरिटा विद ए स्ट्रा की चर्चा से हुमा काफी उत्साहित हैं। उनके मुताबिक, 'यह विमेन सेंट्रिक फिल्मों का सुनहरा दौर है। मैं रात ही 'मार्गरिटा विद ए स्ट्रा देखकर आई हूं। वह बहुत ्रखूबसूरत फिल्म है। सेरेब्रल पालसी की नायिका को जिस तरीके से शोनाली बोस ने पेश किया है और उसे कल्कि ने जिस संजीदगी से निभाया है, वह काबिलेतारीफ है। वह बहुत बडी बात है। बडी खुशी की बात है कि अब ऐसी फिल्में बन रही हैं, जिनमें समाज में रहने वाली हर प्रकार की स्त्रियों को लाने की कोशिश हो रही है। वे चाहे वर्किंग विमेन हों, पढी-लिखी हाउसवाइफ या अनपढ। फिल्मों में स्त्रियों का मजबूत चित्रण हो रहा है। यह पहले मुमकिन नहीं था। अच्छी बात यह है कि विमेन सेंट्रिक फिल्मों में महिलाओं पर ध्यान दिया जा रहा है ही, नॉर्मल फिल्मों में भी स्त्रियों के किरदार पर ध्यान दिया जा रहा है। उनकी सिर्फ पारंपरिक छवि ही नहीं दिखाई जा रही। अब उन्हें सिर्फ खूबसूरती के तौर पर पेश नहीं किया जा रहा है। अब उनके वजूद का कोई न कोई मतलब होता है। यह एक पॉिजटिव चेंज है।

खुश हूं करियर से

मैं अपने करियर की रफ्तार और सफर से भी खुश हूं। पहली ही फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर से मेरी एक अलग छवि बन गई है। उसके बाद जो फिल्में बनी, उससे वह छवि और मजबूत हुई। माना जाता है कि मैं अनकन्वेंशनल हूं। मैंने अब तक जितनी भी फिल्में की हैं, उनसे काफी संतुष्ट हूं। इंडस्ट्री में मेरी एक अलग पहचान बन गई है। मुझ पर अनकवेंशनल होने का जो तमगा लग गया है, उसे स्वीकार करने के बाद अब मैं अलग किस्म की फिल्मों की कोशिश कर रही हूं। मेरी कोशिश है कि एक्टिंग में ही कुछ नया करने को मिले। मैं खुद को एक्सप्लोर कर सकूं। अपनी क्षमताओं को जान सकूं। फिल्म के जोनर पर मैं ज्य़ादा ध्यान नहीं देती। मेरी कोशिश यह रहती है कि मेरा हर किरदार पिछले निभाए गए किरदारों से अलग हो। श्रीराम राघवन की 'बदलापुर में मेरी भूमिका बहुत छोटी थी। फिर भी मैंने इसलिए की, क्योंकि वहां कुछ नए अनुभव हुए। मेरी फिल्मों में कंटेंट बहुत महत्वपूर्ण रहा है।

अजय ब्रह्मात्मज

इंडियन टी20 लीग

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