आज 74  साल की उम्र में अकसर लोग मुझसे कहते हैं, कितनी सुकून भरी है आपकी जिंदगी! तब मैं समझ नहीं पाती कि उनकी इस बात का क्या जवाब दूं? इलाहाबाद से अर्जेटीना तक का यह सफर कई उतार-चढावों से भरा था। यादों के इस अस्त-व्यस्त पुलिंदे को खोलकर इसके हर सफे  को सिलसिलेवार ढंग से पढ पाना मेरे लिए बेहद मुश्किल काम है। फिर भी कोशिश तो की ही जा सकती है..

अतीत के झरोखे से

मैं मूलत: इलाहाबाद की रहने वाली हूं। परिवार का माहौल कुछ ऐसा था कि बचपन से ही साहित्य और संगीत में मेरी गहरी रुचि थी। साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की वजह से तब मैं अकसर दिल्ली आती थी। उसी दौरान किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम के सिलसिले में मेरी मुलाकात एक ऐसे यूरोपीय युवक से हुई, जो यहां पेरू के दूतावास में कार्यरत थे। भाषा और संस्कृति के आधार पर हमारे बीच कोई साम्य नहीं था, फिर भी मैं उनसे प्रेम करने लगी और 1965  में हमारा विवाह हुआ। उस जमाने के हिसाब से मैंने बेहद दुस्साहसिक निर्णय लिया था, लेकिन मेरी खुशी  को अपनी खुशी  मानते हुए माता-पिता ने मेरे इस रिश्ते को खुले  दिल से अपना लिया था। दो साल के बाद जब मेरी बेटी श्रुति का जन्म हुआ तो मुझे ऐसा लगा कि अब हमारी फेमिली  कंप्लीट  हो गई। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, लेकिन मेरे परिवार वालों को एक बात जरूर खलती  थी कि शादी के लगभग चार साल बीत जाने के बाद भी उन्होंने अपने माता-पिता, भाई-बहन या किसी रिश्तेदार से फोन पर मेरी बात नहीं करवाई। मेरी इच्छा थी कि शादी के बाद एक बार वह मुझे अपने साथ अपने पैतृक निवास पर ले कर जाएं। जब भी मैं उनसे इस बात का जिक्र करती तो वह हंसकर टाल जाते। फिर मैंने अपने मन को समझा लिया कि अगर उसके परिवार से नहीं मिल पाई तो क्या हुआ? मैंने जिससे विवाह किया है, वह मुझसे बहुत प्यार करता है और मेरे लिए इतना ही काफी है।

यादों की अंधेरी सुरंग

मैं सही तारीख याद नहीं कर पा रही। हां, इतना जरूर याद है कि तब मेरी बिटिया मात्र ढाई साल की थी। एक रोज मैं किसी बीमार रिश्तेदार से मिलने अस्पताल गई थी। घर लौटने पर मुझे एक चिट्ठी मिली, जिसमें उन्होंने माफी मांगते हुए लिखा था कि मैं अपने पहले प्यार के पास वापस लौट रहा हूं। अपनी बच्ची के बिना जी नहीं सकता। इसलिए उसे साथ लेकर जा रहा हूं। यह पढते ही मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई। समझ नहीं पा रही थी कि मैंने जिस इंसान पर आंखें मूंदकर भरोसा किया था, वह मुझे इस तरह अकेला छोडकर कैसे जा सकता है? खैर, वह वक्त सुंदर सपने की तरह बीत चुका था और अब मैं यथार्थ के कठोर धरातल पर खडी थी।

यथार्थ के धरातल पर

शादी के फैसला मेरा था। इसलिए अब यह लडाई मुझे अकेले ही लडनी थी। इसके लिए मैंने अपने माता-पिता से कोई मदद नहीं ली। मैंने ठान लिया था कि किसी भी तरह मुझे अपनी बच्ची तक पहुंचना है। दिल्ली में एक प्यानो टीचर मेरी अच्छी दोस्त थीं। उन्होंने मेरी काफी मदद की। अर्जेटीना में उनका एक परिचित भारतीय परिवार रहता था। उन्होंने उस परिवार से मेरे लिए मदद मांगी। मेरी बच्ची अपने पिता के साथ लीमा (पेरू की राजधानी) में थी, लेकिन वहां मेरा कोई परिचित नहीं था। इसलिए अपनी उस दोस्त की सलाह पर लीमा जाने के बजाय पहले मैं ब्यूनस आयर्स (अर्जेटीना की राजधानी) गई। परदेस में वह परिवार मेरे लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं था। उन लोगों ने मेरे लिए बच्चों को अंग्रेजी पढाने का काम ढूंढा, रहने की जगह दिलवाई। अपनी बच्ची से मिलने के लिए मेरा मन बेताब हो रहा था। तब मेरे पास एयर टिकट खरीदने के पैसे नहीं थे। इसलिए लीमा  जाने के लिए मुझे बस लेनी पडी। बर्फीली पहाडियों से भरा वह रास्ता बडा ही दुर्गम था।

नहीं भूलते वो सात साल

लीमा  पहुंचने के बाद मैं जल्द ही एक परिवार में बतौर पेइंग गेस्ट शिफ्ट हो गई। मैंने वहां के नर्सरी स्कूल में पढाना शुरू कर दिया। इसी दौरान मेरी मुलाकात एक साइंटिस्ट  दंपती  से हुई, जिन्होंने मुझे मेरे वकील से मिलवाया। इस प्रक्रिया में लगभग छह महीने बीत चुके थे। कोर्ट में केस की अर्जी देने के बाद जब पहली बार बिटिया को मेरे सामने लाया गया तो वह मुझे पहचान नहीं पाई। उस परिवार ने मेरी बच्ची के मन में मेरे खिलाफ इतना जहर भर दिया था कि वह अपनी सौतेली मां को ही सगी समझने लगी थी। वह अकसर कहती, तुम काली हो, इसलिए मेरी मां नहीं हो सकती। खैर,  कोर्ट की हर सुनवाई के दौरान अपनी बेटी से मेरी मुलाकात होती थी। ऐसे हालात में उसका दिल जीतना मेरे लिए बेहद मुश्किल था, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। अंतत: सात वर्षो की लंबी कानूनी लडाई के बाद मेरी बेटी मुझे वापस मिल गई। बच्चे को जन्म देना किसी भी मां के लिए बेहद पीडादायक अनुभव होता है। अपनी खोई हुई बेटी को वापस पाने के लिए मुझे दोबारा उसी पीडा से गुजरना पडा।

आसान नहीं थी वह लडाई

मुझे अपनी लडाई कई स्तरों पर लडनी पडी। चाहे विदेश में नागरिकता लेने की कानूनी अडचनें हों या भाषा की समस्या। अपनी बेटी को खुशहाल  और सुरक्षित जिंदगी देने के लिए मैंने जान लगा दी। मेरी संघर्ष यात्रा का पहला पडाव ब्यूनस  आयर्स  था। इसीलिए मैंने स्थायी तौर पर वहीं बसने का निर्णय लिया। कुछ वर्षो तक स्कूल में बच्चों को पढाया और उसके बाद वहीं के विश्वविद्यालय में हिंदी की प्राध्यापिका बन गई। वहां ज्यादातर  स्पैनिश बोली जाती है। पहले मैंने अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए यह भाषा सीखी। फिर इसमें रुचि बढ गई तो स्पैनिश भाषा एवं साहित्य का गहन अध्ययन किया। हिंदी-स्पैनिश का पहला शब्दकोश भी तैयार किया, जिसके लिए मुझे भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण भी दिया गया था। वक्त कैसे बीत जाता है, इसका कुछ पता ही नहीं चलता। इसी बीच मैं रिटायर हुई, मेरी बेटी श्रुति की शादी हो गई। आज वह अपनी दो बेटियों और पति के साथ बेहद खुश  है।

एक और परीक्षा

अति व्यस्तता की वजह से शायद मैं अपनी सेहत पर ध्यान नहीं दे पाई और ब्लड कैंसर के रूप में उसका नतीजा मेरे सामने आया। हालांकि, वहां इलाज की बहुत अच्छी सुविधाएं हैं। मेरे छात्र, डॉक्टर और कॉलेज  के सहकर्मी परिवार के सदस्य की तरह मेरा ध्यान रखते हैं। मेरे डॉक्टर का कहना है कि अब मेरी बीमारी लगभग 80  प्रतिशत दूर हो चुकी है। फिर भी मैं बेहद संयमित खानपान और दिनचर्या का पालन करती हूं। मुझे खाली बैठना पसंद नहीं है। इसलिए यहां लोगों को हिंदी-संस्कृत पढाती हूं। भारतीय दर्शन और संस्कृति पर सेमिनार आयोजित करती हूं। यही सक्रियता मुझे मन से युवा बनाए रखती है।

क्या कहता है कानून

प्रेमलता जी का यह संघर्ष वाकई काबिलेतारीफ है। ऐसे मामलों में कानून बच्चे के प्रति काफी संवेदनशील नजरिया अपनाता है। आइए जानते हैं, बच्चों के संरक्षण के संदर्भ में भारतीय कानून क्या कहता है :

-गार्जियन एंड वॉडर््स  एक्ट के तहत अगर कोई दंपती किसी विवाद की वजह से अलग रहना चाहे और बच्चे की उम्र 5  साल से कम हो तो उसकी कस्टडी मां को ही दी जाती है।

-अगर बच्चे की उम्र 5  साल से ज्यादा  हो तो ऐसे में कानून बच्चे के हित को प्राथमिकता देता है। माता-पिता की आय, शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य और उनकी जीवन स्थितियों के आधार पर यह तय किया जाता है कि कौन बच्चे की बेहतर परवरिश कर सकता है? फिर बच्चे को उसी के संरक्षण में रखा जाता है।

-अगर बच्चा अपनी पसंद-नापसंद कारण सहित जाहिर करने में सक्षम हो तो उसकी इच्छा के आधार पर उसे माता या पिता के पास भेजा जाता है।

-बेटी की कस्टडी के मामले में कानून का मानना है कि पिता की तुलना में मां बेटी की परवरिश ज्यादा अच्छे ढंग से कर सकती है।

-अगर बच्चा छोटा है और मां उसकी परवरिश करने में आर्थिक रूप से असमर्थ है तो पिता के लिए कोर्ट द्वारा निर्धारित गुजारा भत्ता देना अनिवार्य होता है।

-अगर तलाक का मुकदमा चल रहा हो तो दोनों में से कोई एक पक्ष बच्चे से मिलने की इजाजत मांग सकता है। कोर्ट स्थितियों को ध्यान में रखते हुए मिलने की अवधि और समय-सीमा निर्धारित करती है।

रेखा अग्रवाल, सीनियर एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट

प्रस्तुति :  विनीता

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