वर्ष 1992 में फिल्म 'रोजा' आई। कश्मीर समस्या को लेकर बनी इस फिल्म के संगीत की बहुत तारीफ हुई और एक नाम हिंदी फिल्म जगत में छा गया अल्लाह रक्खा रहमान यानी ए.आर. रहमान का। उनकी मासूम और मधुर धुनें सीधे दिल में उतर जाती हैं। रहमान से 14 सवाल।

संगीतकार रहमान यानी एक नाम, जिसने हिंदी सिनेमाई संगीत को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बुलंदियों तक पहुंचाया है। फिल्म 'रोजा' से हिंदी फिल्मों में आए ए.आर. रहमान की हाल ही में एक फिल्म 'आई' रिलीज हुई है। हमेशा कुछ नया एवं ताजगी भरा संगीत देना चाहते हैं वह। पिछले दिनों पंजाबी फिल्म 'नानक शाह फकीर' के म्यूजिक लॉन्च के अवसर पर वह दिल्ली में थे। संगीत के चयन से लेकर नई योजनाओं तक पूछे गए उनसे कुछ सवाल।

आपने दक्षिण भारतीय फिल्में ज्य़ादा की हैं, लेकिन पहचान हिंदी फिल्मों से मिली है। आप इस बात को मानते हैं?

बिल्कुल, लेकिन मैंने हर भाषा की फिल्में की हैं। यह सच है कि भारत में हिंदी फिल्मों के दर्शक अधिक हैं, तो इस वजह से ऐसा हुआ कि मेरी पहचान हिंदी से ही बनी।

अपनी धुन बनाने से पहले क्या आइडिया रहता है दिमाग्ा में? कब लगता है कि धुन फाइनल हो गई?

मैं इस मामले में बहुत चूजी हूं। शुरू से ऐसा ही रहा हूं। कोई गाना कंपोज करता हूं और कुछ समय के लिए उसे भूल जाता हूं। कुछ दिन बाद दोबारा सुनता हूं। मेरा मानना है कि अगर दोबारा सुनने के बाद भी वह कर्णप्रिय लगे तो वह बढिय़ा म्यूजिक है। मैं एक श्रोता के स्तर पर जाकर उसकी आलोचना करता हूं। फिर उसे और अच्छा बनाने की कोशिशें करता हूं। छोटी-छोटी डिटेल्स पर ध्यान देता हूं। जैसे फिल्म 'लेकर हम दीवाना दिल का एक गाना मुझे ठीक नहीं लगा था। मैं उसे ठीक करके म्यूजिक रिलीज के समय फिल्म में शामिल करना चाहता था, लेकिन हम समय पर ऐसा नहीं कर पाए।

तब तो आपके पास धुनों का बैंक होगा? उन धुनों का क्या होता है?

बेकार हो जाते हैं। दोबारा उन पर नहीं सोचता। पुराने को भूल कर नया सोचता हूं, कुछ भी नया और ताजगी लिए हुए। हमने ड्रीम वक्र्स के लिए प्रोजेक्ट किया था, जो रामायण पर आधारित था। पांच साल हमने उस पर मेहनत की, लेकिन कंपनी ने ही हाथ खींच लिया। अब हम कोशिश कर रहे हैं उस प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करने की।

आप भजन, सूफी, क्लासिकल... यानी हर तरह के गीत कंपोज कर चुके हैं। इस जुडाव की वजह?

मुझे लगता है कि यह विश्वास की बात है। आपको उस भाव में यकीन है, तभी उसमें सुघडता और पवित्रता आएगी। वैसे मैं सूिफज्म का स्टूडेंट हूं, तो उसे थोडा-बहुत समझता भी हूं। अध्यात्म हो या दुनियावी प्यार, दोनों में गंभीरता महत्वपूर्ण है। किसी से कोई भी रिश्ता यूं ही नहीं जुड जाता। प्यार आत्मा से जुडी चीज है, उसे रूह से महसूस किया जाना चाहिए। संगीत भी ऐसा ही है। किसी भी गीत को बनाने से पहले आत्मसात करना पडता है। रूह से जो निकले, वही सही संगीत होता है। इसके बाद ही वह ऐसा बन सकता है कि उस पर गर्व महसूस हो।

लोग इंतजार करते हैं कि किस फिल्म में आपका गाया गाना सुनने को मिलेगा। आप कैसे तय करते हैं कि यह गीत आप ही गाएंगे?

मैं बुरा नहीं गा सकता। मैं उसे तभी गाता हूं, जब ख्ाुद पर यह भरोसा होता है कि वह अच्छा बनेगा। मुझे मस्ती भरे हलके-फुलके गाने पसंद हैं। रही चुनने की बात, तो वही गाने चुनता हूं, जो मेरी आवाज को सूट करें, क्योंकि मैं हर स्टाइल में नहीं गा सकता। मेरी आवाज की अपनी सीमाएं हैं।

किन गीतकारों के साथ काम करना अच्छा लगता है?

हिंदी में बहुत से लोगों के साथ काम किया है और सभी टैलेंटेड हैं। जावेद साहब, महबूब, गुलजार साहब, मजरूह सुल्तानपुरी, प्रसून जोशी, इरशाद कामिल। हां, तमिल में मैंने वेरामुत्थु और वाली के साथ ही गाने बनाए हैं। ये सभी कमाल के लोग हैं। इन सबका अपना अंदाज है।

आप म्यूजिक स्कूल केएम कंजर्वेटरी चला रहे हैं। मुंबई में धारावी के बच्चों के लिए भी प्रोजेक्ट चला रहे हैं। इनके बारे में बताएंगे?

म्यूजिक स्कूल तो मेरी बहन देख रही हैं। वहां हमारी एक अच्छी टीम है। मैं ईमेल पर उनसे रोज बात करता हूं। 'द धारावी प्रोजेक्ट भी है, जो ख्ाासतौर पर स्लम एरिया में टैलेंट हंट का काम करता है। हम जल्दी ही इन बच्चों के साथ एक गाना करना चाहते हैं। ये बच्चे बहुत क्रिएटिव और प्यारे हैं। इनमें बहुत सी प्रतिभाएं छिपी हैं।

जब फिल्मकार संगीत देने के लिए आपको अप्रोच करते हैं, तब आप उनमें क्या देखते हैं?

जिन फिल्मकारों के साथ मैं काम कर चुका हूं और जिनसे मेरी अच्छी बनती है, उनके बारे में तो कुछ नहीं सोचता। हां, जो नए लोग मेरे पास आते हैं, उनमें यह जरूर देखता हूं कि म्यूजिक की उनकी समझ कैसी है।

यानी पैसे को ज्यादा तरजीह नहीं देते?

पैसा भी जरूरी है, लेकिन जब दिल कहता है कि इस काम को करना चाहिए, तो मैं कम पैसे में भी करता हूं। कई बार पैसा नहीं लेता।

लेकिन चर्चा तो यह है कि आप किसी फिल्म में संगीत देने के लिए पांच करोड या इससे अधिक राशि लेते हैं?

ऐसी बात नहीं है। काम के हिसाब से ही पैसा मिलता है और रिश्तों पर भी निर्भर करता है। मैंने पहले ही आपको बताया कि मन को भाता है तो कम पैसों में या बिना पैसे के भी काम करता हूं। आगे भी करता रहूंगा।

आजकल संगीत की दुनिया में युवाओं की आवाजाही बढ गई है। फिर से लोक व शास्त्रीय संगीत का दौर लौट रहा है। इस बारे में क्या कहेंगे?

मुझे लगता है कि यह सब तो दो दशक पहले ही होना चाहिए था। चीन में तीस मिलियन पियानो प्लेयर्स हैं। हमारे यहां गायक हैं, पर वादक नहीं हैं। शास्त्रीय वादक और ऑर्केस्ट्रा प्लेयर्स नहीं हैं, जो नोट्स को पढ सकें। जैसे हमारे यहां जब कोई बडा सरकारी कार्यक्रम होता है तो अपना सिंफनी ऑर्केस्ट्रा प्लेयर तो होना ही चाहिए। बल्कि हर राज्य में कम से कम ऐसे प्लेयर होने चाहिए, मगर हमने इन चीजों को कभी बढावा दिया ही नहीं। मैं यही करना चाहता हूं। ख्ाुश हूं कि संगीत की एक नई जेनरेशन आ रही है। हाल ही में मैं उत्तम सिंह को पूछ रहा था, तीस साल पहले मैं इलैया राजा के साथ काम करता था और उत्तम जी वहां वॉयलिन बजाते थे। मैंने उनसे पूछा कि क्या वे किसी अच्छे वॉयलिन टीचर को जानते हैं, तो उन्होंने कहा, वे सब तो दुनिया को अलविदा कह गए हैं, अब तो सिर्फ मैं ही बचा हूं। नई पीढी में कोई नहीं है।

अभी नया क्या कर रहे हैं?

हिंदी फिल्म 'पानी के लिए संगीत बना रहा हूं। एक और अंतरराष्ट्रीय फिल्म है 'मोहम्मद, जिसे बना रहे हैं ईरानी निर्देशक मजीद मजीदी।

चर्चा है कि मजीद की फिल्म के लिए आपने काफी मेहनत की है?

मुझे तो यही लगता है कि मैंने अपनी हर फिल्म के लिए उतनी ही मेहनत की है, जितनी करनी चाहिए थी। मैं काम से समझौता नहीं करता। वैसे शेखर कपूर की 'पानी का संगीत भी विषय के हिसाब से ही होगा।

आपने अब काफी काम कर लिया है, अब तो आसान होगा आपके लिए संगीत तैयार करना?

कोई भी रचनात्मक काम कभी आसान नहीं होता। लोगों की इस बारे में अलग राय हो सकती है, मगर मेरे लिए हर नया गाना पहले जितना ही मुश्किल होता है।

संगीत का हसीन सफर

विश्व के चुनिंदा म्यूजिक कंपोजर्स में शुमार ए.आर. रहमान ने पूरब के शास्त्रीय संगीतको इलेक्ट्रॉनिक म्यूजिक साउंड्स, विश्व संगीत और ट्रडिशनल ऑरकेस्ट्रियल अरेंज्मेंट्स के साथ प्रस्तुत किया है। इनकी झोली में दो अकेडमी अवॉड्र्स, दो ग्रैमी, गोल्डन ग्लोब, बाफ्ता, चार राष्ट्रीय फिल्म अवॉड्र्स, 15 फिल्मफेयर अवॉड्र्स हैं। कर्नाटक संगीत, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, वेस्टर्न क्लासिकल और कव्वाली शैली में रहमान की विशेषज्ञता है। महज नौ वर्ष की आयु में अपने पिता की फिल्म रिकॉर्र्डिंग के दौरान रहमान ने ग्ालती से पियानो पर कोई धुन बजा दी थी, जिसे बाद में एक गीत के तौर पर रिकॉर्ड किया गया। यहीं से उनका संगीतमय सफर शुरू हो गया था। रहमान अभी कई प्रोजेक्ट्स भी चला रहे हैं। चेन्नई स्थित उनके घर में बने स्टूडियो की गिनती एशिया के चंद बडे और हाइटेक स्टूडियोज में होती है।

रतन

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