संविधान की नजर में सभी बराबर हैं। बच्चों और डिफ्रेंट्ली एबल लोगों के लिए भी संविधान में संवेदनशील धाराएं हैं। इसके बावजूद कई बार आम लोगों सहित कानून और व्यवस्था के रखवाले भी उनके प्रति संवेदनहीन हो जाते हैं। सवाल यह है कि ऐसे लोगों के प्रति हमारी न्यायिक प्रक्रिया कब संवेदनशील होगी।

पीडित को ही हिरासत मिली हाल ही में जम्मू-कश्मीर के छिंदवाडा में हुई एक घटना में जेएंडके उच्च न्यायालय ने पूछा कि किस कानून के तहत नाबालिग लडकी को हिरासत में लिया गया है।

बीती 12 अप्रैल को एक 16 वर्षीय विकलांग छात्रा ने सेना के जवान द्वारा यौन उत्पीडन की शिकायत की लेकिन गिरफ्तारी सैनिक की नहीं, लडकी की हुई। बताया जाता है कि पुलिस ने लडकी से जबरन एक विडियो स्टेटमेंट में कहलवाया गया कि उसने झूठी रिपोर्ट लिखवाई है। लडकी की मां ने उच्च न्यायालय में रिट दायर कर पूछा कि किस कानून के तहत उसकी बेटी, पति और बहन को गिरफ्तार किया गया है? उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि लडकी को तुरंत छोडा जाए और उसका बयान जूडिशियल मैजिस्ट्रेट के यहां दर्ज करवाया जाए। कानून के तहत यौन उत्पीडन की शिकार स्त्री, खासतौर पर नाबालिग को हिरासत में नहीं लिया जा सकता। बच्चों को मुकदमों में विशेषाधिकार हैं। लडकी ने गलतबयानी की होती तो भी उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था।

प्रावधान तो पहले से था

बच्चों के मामले में वर्ष 2010 में ही आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 164 में संवेदनशील तरीके से प्रावधान बनाए गए हैं। ऐसे किसी मुकदमे में मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट या जूडिशियल मैजिस्ट्रेट के यहां पीडित का बयान होगा। धारा 164 ए में कहा गया है कि घटना की खबर के 24 घंटे के अंदर उसकी मेडिकल जांच किसी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा होगी। जांच या बयान रिश्तेदार के सामने स्त्री अधिकारी और महिला मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा कराए जाएंगे। उसे वकील और मनोचिकित्सक की मदद दी जाएगी आदि।

पीडित कैसे दे बयान

इसी तरह जुलाई 2014 में एक 36 वर्षीय सेेेरेब्रल पाल्सी की रोगी पर उसके सिक्योरिटी गार्ड द्वारा यौन हमला किया गया। इस रोग में पीडित की शारीरिक और मानसिक उम्र में बहुत अंतर होता है। लडकी अपनी 69 वर्षीय मां के संरक्षण में रहती थी। घटना के दिन मां निर्धारित समय से कुछ देर बाद घर पहुंची। बेटी की हेल्पर ड्यूटी खत्म कर चली गई। उसे अकेले देख घर के गार्ड ने घटना को अंजाम दिया। घटना के पहले बेटी तीन भाषाएं बोल सकती थी लेकिन इसके बाद उसका आत्मविश्वास खो गया। मां घर पहुंची तो बेटी स्तब्ध थी। उसने खाना नहीं खाया था। रात में भी वह चीखती रही। पहले वह छह वर्ष के बच्चे की तरह बोल सकती थी मगर घटना के बाद वह बोल नहीं पा रही थी। इशारे से उसने मां को बताया कि उसके साथ क्या हुआ। इसके बाद लडकी की मेडिकल जांच कराई गई, तब पुलिस में एफआइआर दर्ज हो सकी।

पीडित को अस्पताल ले जाया गया तो वहां का स्टाफ भी ट्रेंड नहीं था। दिल्ली पुलिस ने अभियुक्त को गिरफ्तार नहीं किया। ट्रायल के दौरान बयान दर्ज होते समय पीडिता की मां एक मनोवैज्ञानिक को साथ लेकर गई। साइकोलॉजिस्ट के बताए वक्तव्यों के आधार पर एक ऑडियो-विजुअल तैयार किया गया। जज को हर इशारे का अर्थ समझाया गया लेकिन जज ने इसे रिकॉर्ड करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि पीडिता को बुलवाकर उससे गाना गाने को कहा जाए। जज ने कहा कि अगली तारीख पर लडकी बोल नहीं सकी तो अभियुक्त को जमानत दे दी जाएगी। मां ने कहा कि बेटी के मुंह में 22 टांके आए हैं, जिस कारण वह कोर्ट में पेश नहीं हो सकती। मां ने सर्जरी पेपर्स दिखाए मगर जज ने कहा कि वह मेडिकल सर्टिफिकेट लगाएं। मां ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई है कि बेटी के लिए बच्चों के कोर्ट में ट्रायल हो और उसे मानसिक पीडित मानते हुए जांच की जाए।

सवाल यह है कि आखिर क्यों पहले से निर्धारित कानूनों के अंतर्गत मुकदमे नहीं देखे जाते? ऐसे लोगों के लिए कानून में सहानुभूतिपूर्ण प्रक्रियाएं मौजूद होने के बावजूद उनके प्रति इतनी संवेदनहीनता क्यों नजर आती है?

कमलेश जैन

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