एक कोना हमेशा गुलजार रहता है। यहां सुबह की शुरुआत शंख और जयकारे से होती है। यह कोना मंजरी काकी और उनके जीवनसाथी, जिन्हें सब दद्दू कहते हैं, के कारण जाना जाता है। मंजरी काकी और दद्दू यहां कब से हैं, यह मोहल्ले का कोई भी व्यक्ति नहीं जानता पर लोगों को यह जरूर याद है कि जब से काकी यहां रह रही हैं, उनसे मिलने कभी कोई नहीं आया। कितने मौसम गुजर गए पर काकी का दद्दू के सिवाय कोई अपना नहीं दिखा। पूछने पर सिर्फ दो मोती छलक आते हैं काकी की निरंतर बाट जोहतीआंखों से पर मुस्कराहट उनके चेहरे से कभी नहीं जाती। लोग बताते हैं कि एक समय था, जब दद्दू किसी से भी बात नहीं करते थे, जबकि काकी सबसे हंसती-बोलती थीं। इसका कारण पूछने पर काकी ने कहा था कि वो बूढे दद्दू हैं तो हमारे साथ ही लेकिन आजकल ध्यान कहीं और लग गया है। तब दद्दू खुलकर हंसे थे, तब से न उनकी मुस्कराहट थमी और न उन्हें दद्दू कहने का सिलसिला।

काकी किसी की भी सहायता करने में कभी नहीं झिझकतीं। इसमें न तो उनकी उम्र आडे आती है, न उनका स्वाभिमान। दिन-दोपहर काकी हर समय सबके साथ होती हैं। चाहे बीमारी में खट्टा-मीठा काढा हो, शादी की कोई रस्म हो या होली में पापडों की तैयारी, काकी सबकी मदद करने को आगे रहती हैं। छोटी सी जगह पर अपना आशियाना बसाने वाली काकी से सारा मोहल्ला सलाह लेता है। अपना काम निबटा लेने के बाद मोहल्ले के अधिकतर लोग काकी के पास जमा होकर उनके अनुभवों का आनंद लेते हैं तो वहीं शाम दद्दू की रोचक बातों में गुजरती है। जाने कितनी ही छोटी लेकिन आवश्यक जानकारियां काकी यूं ही बातों-बातों में सबको समझा देती हैं। उनके बताए कारण भी बडे दिलचस्प और मानने योग्य होते हैं। जैसे शाम के समय सोना नहीं चाहिए क्योंकि जो सो गया, वह उस दिन का सूर्यास्त नहीं देख पाएगा। असल वजह जो भी हो लेकिन काकी के बताए कारण सबके लिए गुरुमंत्र होते हैं।

अभी एक दिन बातों ही बातों में मंजरी काकी की आंखें अचानक छलक आईं, कई दिनों से वे उदास भी थीं। उस दिन एक छोटे से आग्रह और अपने लिए नि:स्वार्थ प्यार देखकर काकी का पुराना दर्द सामने आ गया। उन्होंने बताया कि कैसे उन दोनों ने अपने बच्चों को पढा-लिखाकर काबिल बनाया लेकिन शहर के बाहर नौकरी करने गए बेटों ने एक बार भी पलटकर नहीं देखा। जब आए तो धोखे से घर भी अपने नाम करा लिया। चारधामयात्रा और न जाने कैसे-कैसे तरीके अपनाए काकी को घर से निकालने के। काकी को अच्छी तरह याद है वह दिन, जब बहू के लाए विदेशी कांच के बर्तनों को बूढी आंखों ने देखा नहीं और वे गलती से उनसे टूट गए, जिस पर उनके बेटे ने काकी पर हाथ उठाने की जुर्रत कर दी। तब दद्दू के सब्र का बांध टूट गया और वे काकी को लेकर यहां हमारे मोहल्ले में आ गए।

सुनने में यह आम समस्या है लेकिन इतने विशाल हृदयऔर कभी किसी भी परिस्थिति से मुंह न मोडऩे वाली काकी को भी कोई ऐसे दिन दिखा सकता है, यह असहनीय था। उस दिन सारा मोहल्ला सूना-सूना था पर अगली सुबह जानी-पहचानी हंसी सुनाई दी। काकी दद्दू के साथ पौधा लगा रही थीं और दद्दू की नाक पर मिट्टी लग गई थी। खुशीका कारण पूछने पर काकी मुस्करा दीं और दद्दू को देखने लगीं, जिस पर दद्दू ने मुस्कराहट के साथ बताया कि आज उनकी लव मैरिज की सालगिरह है।

काकी को यूं खुशदेखकर अच्छा तो लगा पर दुख भी हुआ कि आज भी कई संतानें ऐसी हैं, जो अपने माता-पिता की सेवा का सुख पाने से खुदको वंचित कर लेती हैं। मैंने भी अपने मन में काफी गुस्सा उबलता हुआ महसूस किया मगर फिर सोचा कि जिस तरह काकी इतने दुखों के बावजूद खुद को खुशरख सकती हैं और दद्दू इस उम्र में भी स्वाभिमान के लिए बेटों का घर छोड नई उम्मीद की किरण खिला सकते हैं तो मैं भी अपने जीवन में आने वाली हर परेशानी का हल आसानी से निकाल सकती हूं। स्वाभिमान के इस जीते-जागते उदाहरण को हर रोज अपने सामने देख कर मेरे अंदर भी काफी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। अब से मैं जब भी किसी बुजुर्ग जोडे को देखती हूं तो उनकी हरसंभव मदद करने की कोशिश करती हूं क्योंकि इस उम्र में अकेलापन किसी को रास नहीं आता। हो सकता है कि मेरा कुछ पलों का यह साथ किसी के चेहरे पर थोडी सी मुस्कराहट ला दे।

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