ऐसे समय में जब बेटियों के नाम पर कैंपेन चलाए जा रहे हैं, उनकी दिलेरी पर फिल्में बन रही हैं और लडकियों की जन्म दर में वृद्धि दर्ज हो रही है, दिल्ली के एक प्रतिष्ठित हॉस्पिटल में कार्यरत डॉक्टर मीतू खुराना अपनी जुडवां बेटियों के हक की लडाई लड रही हैं। यह लडाई उन्होंने लगभग 11 साल पहले शुरू की थी और आज भी इसी उम्मीद में उनकी जंग जारी है कि शायद कभी उन्हें न्याय मिल सकेगा।

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ डॉ. मीतू खुराना की कठिन लडाई से मेरा परिचय पहली बार आमिर खान के शो 'सत्यमेव जयते' के जरिये हुआ था। बहुत से लोगों को तब पहली बार पता चला था कि एक ऐसी स्त्री भी यह सब झेल सकती है, जो आत्मनिर्भर ही नहीं, स्वयं एक चिकित्सक भी है। अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ पीएनडीटी यानी प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेकनीक्स (रेगुलेशन एंड प्रिवेंशन ऑफ मिसयूज) एक्ट के तहत मामला दर्ज कराने वाली वह शायद अकेली स्त्री हैं। डॉ. मीतू की दास्तान उन लोगों के लिए आंख खोल देने वाली है, जो समझते हैं कि शिक्षित लोग बेटा-बेटी में भेदभाव नहीं करते और कन्या भ्रूण हत्या केवल गरीबों की समस्या है। डॉ. मीतू से ही सुनें उनके संघर्ष की दास्तान।

दहेज के लिए मिले ताने मेरे पापा डॉक्टर हैं, मां भी गवर्नमेंट सर्विस में हैं। हम दो बहनें डॉक्टर हैं। हमने अपने घर में कभी लडकी होने के कारण किसी तरह का दबाव नहीं झेला बल्कि पापा इस बात से बेहद खुश थे कि उन्हें दो बेटियां मिलीं। हमें कभी लडकी होने के लिए नहीं रोका-टोका गया। नवंबर 2004 में मेरी शादी घर वालों की मर्जी से एक डॉक्टर से हुई। शादी के तीन दिन बाद मुझसे कहा गया कि उन लोगों को कार चाहिए थी, जो उन्हें नहीं मिली। इसलिए वहां लोग मुझसे नाखुश थे। मुझे अकसर ताने मिलते थे, जिन्हें मैं नजरअंदाज करती थी कि कुछ समय में सब ठीक हो जाएगा।

फरवरी 2005 में मुझे पता चला कि मैं प्रेग्नेंट हूं। जिस दिन मुझे डॉक्टर ने यह बात बताई, उसी दिन से समस्याएं शुरू हो गईं। प्रेग्नेंसी में काफी कॉम्प्लिकेशंस थे और डॉक्टर ने बेडरेस्ट करने को कहा था। पति को यह खबर दी तो वे खुश नहीं हुए। समस्याएं बढीं तो मुझे दिल्ली के एक बडे हॉस्पिटल में जांच के लिए भेजा गया। मुझसे कहा गया कि यह किडनी की जांच है। पता चला कि मेरे गर्भ में जुडवां बच्चे हैं। एकाएक इसके बाद ससुराल वाले दबाव बनाने लगे कि मैं अबॉर्शन करवा लूं, जिसके लिए मैं तैयार नहीं थी। यह बात मुझे बाद में पता चली कि दरअसल वह जांच बच्चों का जेंडर पता करने के लिए की गई थी। यह सब मेरे साथ हुआ, जबकि मेरे पति खुद एक ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं और मेरी ससुराल में सभी लोग शिक्षित और उच्च पदों पर कार्यरत हैं।

बेटियों ने लिया जन्म दबाव बढा तो मैं पेरेंट्स के घर शिफ्ट हो गई। वहीं मेरी बेटियों का जन्म हुआ। वे कमजोर थीं, लिहाजा चार महीने मैं पेरेंट्स के घर रही। इसके बाद ससुराल गई तो मुझे पहले ही दिन बहुत अपमानित किया गया और बेटियों को जन्म देने के लिए ताने दिए जाने लगे। मैं अकेले दोनों बच्चियों को संभाल रही थी, कोई मेरी मदद को आगे नहीं आता था। मैं वहां नहीं रह सकी और पेरेंट्स के पास आ गई। झगडे बढऩे लगे तो मैंने वुमन सेल में शिकायत की। वहां हमारी काउंसलिंग कराई गई। काउंसलर को लगा कि यह एडजस्टमेंट समस्या है, इसलिए कुछ दिन हमें परिवार से अलग घर में रहना चाहिए। उनकी सलाह पर हम नए घर में शिफ्ट हो गए। वहां मुझे एक फाइल मिली, जिसमें अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट थी, जिसमें गर्भ में बच्चों का जेंडर पता कराया गया था। मैंने जब इस बारे में पति से पूछा तो वह नाराज हो गए और बोले कि उन्हें बेटियां नहीं, बेटा चाहिए था। हमारा झगडा बढा तो उन्होंने साफ कह दिया कि मैं अब उनके साथ नहीं रह सकती।

लडाई पहुंची अदालत मैं फिर माता-पिता के साथ आ गई और कोर्ट में याचिका डाली। इसके बाद 2008 में उस हॉस्पिटल के खिलाफ भी शिकायत दर्ज कराई, जहां लिंग परीक्षण जैसे गैरकानूनी काम को अंजाम दिया गया। मेरी इच्छा या सहमति के बिना यह जांच हुई। ससुराल वालों पर पहले से दहेज प्रताडऩा और घरेलू हिंसा का मामला चल रहा था। कोर्ट ने हमसे एक समझौते पर हस्ताक्षर करवाए, जिसमें पति ने कहा कि वे आयंदा मुझे परेशान नहीं करेंगे। इस तरह जबरन मामला खत्म किया गया। दुखद तो यह है कि मेरा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो वहां इसे एक ही दिन में यह कहते हुए रद्द कर दिया गया कि पुराने मामलों को देखते हुए लगता है कि यह लडकी शुरुआत से शिकायती स्वभाव की है।

उलझते रहे रिश्ते इस बीच एक दिन मेरे ईमेल अकाउंट्स हैक कर लिए गए और मेल्स से छेडछाड कर मेरा चरित्र-हनन करने का प्रयास किया गया। बाद में जांच में साफ हुआ कि ईमेल अकाउंट मेरे पति के आईपी अड्रेस से खोला गया था। इसके लिए उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई। जब उन्हें लगा कि वह फंस रहे हैं तो तुरंत बेटियों की कस्टडी के लिए केस डाला, जबकि बेटियों से उन्हें लगाव नहीं था। उन्होंने साफ कहा कि ये उनकी बेटियां ही नहीं हैं...। पति ने मेरे खिलाफ दो केस दर्ज कराए। एक था- क्रूरता के लिए, जिसमें कहा कि मैं जबरन उनका घर छोड कर चली गई, उन्हें फोन पर धमकियां देती हूं और परिवार से अलग करना चाहती हूं। दूसरा था तलाक का। यहां मैं एक घटना का जिक्र करना चाहती हूं। मेरी शादी के कुछ ही समय बाद मेरी ननद की शादी हुई थी और दहेज में कार मांगी गई थी। इसीलिए मुझ पर यह दबाव डाला गया था कि कार मेरे पापा दें। दहेज को ही लेकर बाद में मेरी ननद का तलाक हो गया।

बेटियां देती हैं हौसला अब मेरी बेटियां 11 साल की हैं। वे पांच साल की थीं, जब पहली बार कोर्ट में उन्होंने पिता का चेहरा देखा था। इस पूरे दौर में पेरेंट्स मेरे साथ मजबूती से खडे रहे। हमने काफी कुछ सहन किया लेकिन जब मेरे चरित्र पर उंगलियां उठाई गईं, तब पापा ने कहा कि अब हम चुप नहीं बैठेंगे।

सच कहूं तो इतनी लंबी लडाई में कई बार मैं हताश हो जाती हूं। सोचती हूं, मेरी बच्चियां मेरे साथ हैं, उन्हें लेकर अलग हो जाऊं मगर फिर लगता है कि इससे क्या हासिल होगा! मैं चाहती हूं कि जो कुछ मेरे साथ हुआ, वह मेरी बच्चियों और अन्य स्त्रियों के साथ न हो, इसीलिए लड रही हूं। कई बार लगता है कि लडाई शुरू न करती तो अच्छा होता मगर अब बीच राह में जंग छोड भी तो नहीं सकती। कोर्ट से जिस तरह की संवेदनशीलता की उम्मीद मुझे थी, वह नहीं दिखी। मैं नहीं जानती कि मेरी लडाई कब खत्म होगी। कई बार मुझे धमकियां मिलीं, मेरे कई एक्सीडेंट्स हुए। मैं नहीं जानती कि आखिर में जीतूंगी या हारूंगी, बस यही चाहती हूं कि जैसा मेरे साथ हुआ, वह किसी और के साथ न हो। मुझे लगता है कि जब तक हम खडे नहीं होंगे, तब तक समाज में बदलाव भी नहीं आएगा, बस इसीलिए कोर्ट के चक्कर काट रही हूं।