दूर हुई पडोसी की परेशानी इंद्रा बहादुर, गुरुग्राम बहुत पुरानी बात है। हमारे पडोस में एक परिवार रहता था। पिता के निधन के बाद उन्होंने अपनी मां को पास बुला लिया। यहां उनका मन नहीं लगा। इसलिए वह जल्दी ही अपने गांव वापस चली गईं। उनके जाते ही पास-पडोस के लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि कैसा बेटा है, जो मां को महीने भर भी अपने साथ न रख पाया। जब उनकी मां गांव पहुंचीं तो वहां की स्त्रियों ने भी कहना शुरू कर दिया कि बहू जरूर इनके साथ बुरा बर्ताव करती होगी, तभी तो ये इतनी जल्दी वापस आ गईं। ये सारी बातें सुनकर हमारी पडोसन को बहुत दुख होता था। एक दिन मैंने उनसे पूछ लिया कि क्या आपकी सास को भी आपसे कोई शिकायत है? इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, वह तो मुझे बेटी की तरह मानती हैं। मैंने उन्हें समझाया कि दूसरों की ऐसी व्यर्थ बातों को दिल पर नहीं लेना चाहिए। यह सुनने के बाद उन्होंने इस तरह की बातों पर ध्यान देना बंद कर दिया। कुछ बातों का रखती हूं खयाल गायत्री ठाकुर, छिंदवाडा मेरी ससुराल गांव में है, जहां बहुत बडा संयुक्त परिवार है। हमारे जमाने में सभी बहुओं के लिए साडी पहनकर सिर पर पल्लू रखना अनिवार्य था। लिहाजा, जब मैं सुसराल जाती तो मुझे भी वहां के नियमों का पालन करना पडता। इससे घर के कामकाज के दौरान मुझे थोडी असुविधा भी होती थी पर संकोचवश मैं किसी से कुछ कह नहीं पाती थी। मेरी सास बहुत अच्छी थीं पर वह इस बात से बहुत डरती थीं कि अगर उनकी बहुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे। इसीलिए उनकी भावनाओं का खयाल रखते हुए मैं ससुराल के उन सभी नियमों का पालन करती थी, जिनसे मुझे तकलीफ होती थी। खैर, वक्त बदला और मैं भी बहू से सास बन गई। मेरी बहुओं को साडी पहनने में बहुत असुविधा होती थी। लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर मेरे मन में बहुत दिनों तक अंतद्र्वंद्व चलता रहा। ऐसे में मैंने बीच का रास्ता निकाला। मैंने अपनी बहुओं को समझाया कि जब हम छुट्टियों में गांव जाते हैं तो वहां बुजुर्गों की भावनाओं का खयाल रखते हुए गांव में साडी पहन लेना लेकिन शहर में तुम्हारे पहनावे पर कोई पाबंदी नहीं है। यहां तुम अपनी पसंद और सुविधा के अनुसार कोई भी शालीन ड्रेस पहन सकती हो। मेरा मानना है कि परंपराएं रिश्तों से बडी नहीं होतीं। अगर कुछ पुराने नियमों से नई पीढी को असुविधा होती है तो दूसरों की परवाह किए बगैर उन्हें बदलने के लिए हमें सहर्ष तैयार रहना चाहिए। मन से जुडे मुहावरे ननद से हो गई मुलाकात सरस्वती अग्रवाल, रायपुर बात उन दिनों की है, जब मेरे बच्चे छोटे थे। मेरी एक ही ननद हैं, जो मुंबई में रहती हैं। वह मुझसे विशेष स्नेह रखती हैं लेकिन घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों और दूरी की वजह से हमारा मिलना कम ही हो पाता था। एक बार मैंने अचानक मुंबई जाने का कार्यक्रम बना लिया लेकिन जिस रोज मुझे निकलना था, उसके एक दिन पहले मेरे बेटे को तेज बुखार आ गया। लिहाजा मैंने अपना टिकट कैंसल करवा दिया। अगले ही दिन सुबह कॉलबेल बजी और जब मैंने दरवाजा खोल कर देखा तो सामने मेरे नंदोई जी, ननद के साथ खडे थे। दरअसल उनके किसी रिश्तेदार के यहां शादी थी और हमें सरप्राइज देने के इरादे से उन्होंने मुझे इसकी सूचना नहीं दी। यह देखकर मेरे पति ने मुझसे कहा कि अच्छा ही हुआ जो हम मुंबई नहीं गए। इसे ही कहते हैं, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा।

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप