लगभग पांच साल पहले मेरे पास एक ऐसे दंपती का केस आया था, जो आपसी मतभेद के कारण पिछले दो वर्षो से अलग रह रहे थे। उनके बीच मनमुटाव इतना बढ चुका था कि वे काउंसलिंग के लिए मेरे पास अलग-अलग आते थे।

पहला इंप्रेशन कुछ और था

पहली बार मेरे पास काउंसलिंग के लिए वह व्यक्ति अकेला ही आया था। उसका कहना था कि शादी के बाद पत्नी ससुराल के नए माहौल में एडजस्ट नहीं कर पाई और मुझे छोड कर मायके चली गई। वह अपने साथ छह माह के बच्चे को भी ले गई। पहले इंप्रेशन में मुझे ऐसा लगा कि यह बेचारा पुरुष पत्नी-पीडित है, पर उसकी पत्नी से मिले बिना इस केस के बारे में कोई भी राय बनाना ठीक नहीं था। इसलिए मैंने पत्नी को भी काउंसलिंग के लिए बुलाया।

तसवीर का दूसरा रुख्ा

ख्ौर, मेरे फोन करने के बाद जब वह मुझसे मिलने आई तो कहने लगी, आप ही बताएं कि कोई औरत ख्ाुद अपनी गृहस्थी क्यों बर्बाद करेगी? हालात इतने मुश्किल हो गए थे कि मुझे मजबूरन बच्चे के साथ अपने माता-पिता के पास लौटना पडा। दरअसल हमारी अरेंज्ड मैरिज थी। शादी से पहले विवेक (परिवर्तित नाम) से एक औपचारिक सी मुलाकात हुई थी। तब मुझे शादी से इंकार करने की कोई वजह नजर नहीं आई। ससुराल पहुंचने के बाद मैंने नोटिस किया कि किसी से भी हाथ मिलाने के बाद वह एंटीसेप्टिक लिक्विड सोप से हाथ धोते थे। सास का भी यही हाल था। अगर कोई मेहमान आता तो उसके जाते ही वह पूरे घर में पोंछा लगातीं। वहां बाहर खाने का नाम लेना भी मना था, क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि इससे हम बीमार हो जाएंगे। मैंने किसी तरह शुरुआती एक-दो साल तो काट लिए, लेकिन मेरे बेटे के जन्म के बाद बहुत दिक्कतें आने लगीं। मैं जितनी बार बच्चे का डायपर चेंज करती, सास मुझसे उतनी बार नहाने को कहतीं। पति का बर्ताव दिनोंदिन ख्ाराब होता जा रहा था। जब उन्होंने छोटी-छोटी बातों को लेकर मुझ पर हाथ उठाना शुरू कर दिया तो एक रोज नाराज होकर मैं माता-पिता के घर चली आई। उसके बाद से उन्होंने मेरी खोज-खबर नहीं ली।

ऐसे हुआ समाधान

दरअसल शुभा की सास और पति दोनों ओसीडी यानी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसॉर्डर  नामक मनोवैज्ञानिक समस्या से ग्रस्त थे। ऐसी स्थिति में मरीज को किसी एक बात की सनक सवार हो जाती है, वह बार-बार एक ही विषय पर सोचने या काम करने को मजबूर होता है। ऐसे में उनकी सत्तर साल की सास को बदलना नामुमकिन था। इसलिए मैंने शुभा से कहा कि अगली सिटिंग में आप दोनों की काउंसलिंग साथ-साथ होगी। ख्ौर, बडी मुश्किल से अगले सेशन में पति-पत्नी साथ बैठने को तैयार हुए। पति के लिए मैंने सिस्टेमैटिक डिसेंसिटाइजेशन  का तरीका अपनाया। इसका इस्तेमाल आमतौर पर फोबिया के मरीजों के लिए किया जाता है। मैं उन दोनों को अपने साथ स्ट्रीट फूड खिलाने ले गई और विवेक को विश्वास दिलाया कि कभी-कभी बाहर की चीजें खाने में कोई बुराई नहीं है। इससे सफाई को लेकर उनका वहम काफी हद तक दूर हो गया। अगली सिटिंग्स में मैंने उनके लिए रोल प्लेइंग थ्योरी का इस्तेमाल किया। यह एक तरह का गेम है, जो रिश्ते सुधारने में कारगर साबित होता है। इसके तहत मैंने शुभा और विवेक से कहा कि थोडी देर के लिए शुभा विवेक बन जाएं और विवेक शुभा। फिर आप दोनों को यही समझते हुए आपस में सहज बातचीत करनी है। इसका फायदा यह होता है कि पत्नी के संवाद बोलते समय पति के मुंह से वही बात निकलती है, जो सचमुच वह पत्नी से चाहता है। पत्नी के मामले में भी यही स्थिति होती है। दो-तीन सिटिंग्स में यह थ्योरी अपनाने के बाद दोनों को एक-दूसरे के बारे में कई ऐसी बातें जानने को मिलीं, जो पिछले सात वर्षो तक साथ रहने पर भी उन्हें मालूम नहीं थीं।

अब विवेक को पत्नी की परेशानी का एहसास होने लगा था। फिर मैंने शुभा को समझाया कि अगर पति आपके साथ हैं तो आपको कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। जहां तक सास का सवाल है तो वह आपकी जिम्मेदारी हैं, आप उन्हें अकेला नहीं छोड सकतीं। इसलिए अगर आपको उनकी कुछ बातें नापसंद भी हों तो भी उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश करें। इस केस को सुलझाने में एक साल से भी ज्यादा  वक्त  लगा।आज पांच वर्षो के बाद भी वे मेरे संपर्क में हैं। शुभा का कहना है कि पति के रवैये में बदलाव की वजह से अब सास के व्यवहार में भी काफी सुधार आया है।

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