आजकल कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले कैशबैक के आकर्षक ऑफर्स की वजह से अकसर लोगों के मोबाइल का मेसेज बॉक्स भर जाता है और इसकी वजह से उन्हें कई तरह की परेशानियां उठानी पडती हैं।

क्या है कैशबैक

आमतौर पर बैंक, क्रेडिट कार्ड जारी करने वाले संस्थान, ई-कॉमर्स और अन्य कंपनियां इस तरह के ऑफर देती हैं। अमूमन लोगों को ऐसा लगता है कि एक निश्चित कीमत का सामान खरीदने पर तुरंत नकद राशि के रूप में कैशबैक की प्राप्ति हो जाएगी। इस तरह की पेशकश ज्यादातर के्रडिट कार्ड या एप के जरिये होने वाले खर्च पर दी जाती है। कोई कंपनी यदि हजार रुपये की खरीद पर 200 रुपये कैशबैक की पेशकश कर रही है तो के्रडिट कार्ड से खरीदारी होने पर यह राशि उसी में वापस कर दी जाती है। वहीं, एप के मामले में वह रकम उस खास एप में दी जाती है, लेकिन उसका भुगतान तुरंत नहीं होता। कई बार इसके लिए दो-तीन महीने इंतजार करना पडता है। यात्रा पोर्टल, होटल और ऑनलाइन उपभोक्ता उत्पाद बेचने वाली कंपनियां और बैंक इस तरह की पेशकश करते हैं। कुछ बैंक अपने ग्राहकों को फिल्म का टिकट के्रडिट कार्ड से खरीदने पर 50 प्रतिशत तक का कैशबैक देते हैं, लेकिन यह राशि के्रडिट कार्ड में नहीं जाती बल्कि उसके बिल में से उस राशि को घटा दिया जाता है।

भ्रमजाल रिवॉर्ड पॉइंट का

अकसर लोग शॉपिंग या खर्च करने के बदले मिलने वाले रिवॉर्ड पॉइंट को रुपया समझने की भूल कर बैठते हैं। एक रिवॉर्ड पॉइंट का मतलब 20 या 25 पैसा होता है। ऐसे में 100 रुपये खर्च करने पर एक रिवॉर्ड पॉइंट का मतलब महज 25 पैसा है। इस तरह 400 रुपये खर्च करने पर केवल एक रुपये की बचत होती हैं, जबकि रिवॉर्ड पॉइंट को रुपया समझकर लोग बेहिसाब खर्च करते हैं।

समझें निर्धारित सीमा

उपभोक्ताओं को कैशबैक या रिवॉर्ड पॉइंट एक बार में नहीं मिलता। कंपनियां इसके लिए कई तरह की शर्तें भी रखती हैं। अगर कोई व्यक्ति 5000 रुपये में एयर टिकट खरीदता है और बदले में उसे इतना ही पॉइंट दिया जा रहा है तो उसके लिए समय और उपयोग की सीमा भी होती है। इसी तरह के मामले में सामान्यत: ऐसी शर्त होती है कि अगली बार वह व्यक्ति जब भी टिकट की बुकिंग कराएगा तो उसकी कीमत में से 500 रिवॉर्ड पॉइंट के बराबर राशि घटा दी जाएगी, पर इसमें भी कई व्यावहारिक परेशानियां होती हैं। जैसे कुछ कंपनियां ऐसी भी शर्तें रखती हैं कि व्यक्ति के पास चाहे कितना भी रिवॉर्ड पॉइंट जमा हो, लेकिन होटल के किराये या हवाई टिकट के मद में व्यक्ति केवल उसके 25प्रतिशत हिस्से का ही इस्तेमाल कर सकता है।

साथ ही कुछ बैंक 24 घंटे में अधिकतम 3 बार लेन-देन की अनुमति देते हैं। कुछ कंपनियां बेहद लुभावने तरीके से 5प्रतिशत तक कैशबैक देने का दावा करती हैं, लेकिन इसके लिए खर्च की न्यूनतम सीमा चार या पांच हजार रुपये होती है। जबकि कैशबैक की अधिकतम सीमा महज 500 रुपये होती है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति 10000 रुपये का सामान खरीदता है तो है तो उसे 5प्रतिशत की अधिकतम सीमा के तहत कैशबैक के रूप में 500 रुपये मिल जाएंगे, लेकिन 20,000 रुपये खर्च करने पर भी उपभोक्ता के इस निर्धारित कैशबैक में कोई वृद्धि नहीं होगी। ऐसे में भुगतान से पहले क्रेडिट कार्ड कंपनी या मोबाइल एप्लीकेशन से जुडी सभी शर्तों के बारे में अच्छी तरह छानबीन कर लें।

शॉपिंग की शर्तें

मोबाइल एप से भुगतान का चलन काफी तेजी से बढा है और कोई भी कंपनी अपने ग्राहक खोना नहीं चाहती। इसलिए कैशबैक के बहाने हर कंपनी अपने ग्राहकों के नाम से कैशबैक अकाउंट बनाती है और शॉपिंग के बदले मिलने वाला रिवॉर्ड पॉइंट उसी में जमा होता है, जिसका इस्तेमाल वह अगली बार ऑनलाइन शॉपिंग के लिए कर सकता है। इसलिए बिल के भुगतान के लिए उपभोक्ता हमेशा उसी मोबाइल एप्लीकेशन का इस्तेमाल करने को मजबूर हो जाता है।

असुरक्षा की आशंका

अगर हम भुगतान के लिए किसी मोबाइल एप्लीकेशन का इस्तेमाल करते हैं तो वह कंपनी हमारी निजी जानकारियां दूसरी कंपनियों के साथ शेयर कर सकती है। किसी बिल कापेंमेंट करते ही हमारा नाम, पता, उम्र, ईमेल आइडी और मोबाइल नंबर सहित सभी जरूरी सूचनाएं इन कंपनियों तक पहुंच जाती हैं और वे व्यक्ति की सभी ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखती हैं।

मिसाल के तौर पर अगर कोई व्यक्ति अकसर वीकेंड में घूमने के लिए ऑनलाइन टिकट की बुकिंग कराता है तो ऐसी कंपनियों का कई होटल्स और रिजॉट्र्स के साथ अनुबंध होता है और वे उनके साथ आपका मोबाइल नंबर और ईमेल आइडी शेयर कर लेती हैं। इससे उसके पास ऐसी जगहों से बुकिंग के लिए एसएमएस आने शुरू हो जाते हैं। इतना ही नहीं, इसके बाद वहां से भी उपभोक्ताओं की सारी निजी सूचनाएं दूसरी कंपनियों तक जा सकती हैं।

आज के दौर में इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल एप सबकी जरूरत बन चुका है लेकिन कैशबैक ऑफर हमेशा ऑप्शनल होता है। इसलिए जहां तक संभव हो, ऐसे लुभावने ऑफर्स से दूर रहने की कोशिश करें।

यह भी जानें

क्या है बैलेंस्ड फंड

यह म्यूचुअल फंड स्कीम है और इसे हाइब्रिड फंड भी कहा जाता है। इसकी पूंजी का 65 प्रतिशत हिस्सा आमतौर पर शेयर्स और 35 प्रतिशत सरकारी बॉण्ड, कॉरपोरेट डिपॉजिट सहित निश्चित रिटर्न वाले माध्यमों में निवेश किया जाता है। इसकी वजह से इसमें रिटर्न और जोखिम के बीच हमेशा संतुलन बना रहता है। जब शेयर बाजार में तेजी आती है तो बैलेंस्ड फंड के 65 प्रतिशत निवेश पर उसी के अनुसार आकर्षक रिटर्न मिलता है। वहीं बाजार में गिरावट की स्थिति में भी सिर्फ उतने ही हिस्से पर नुकसान होता है लेकिन तय अवधि वाले हिस्से में निवेश की राशि पर मिलने वाले रिटर्न से कुल नुकसान घट जाता है।

सखी फीचर्स

(वित्तीय सलाहकार एम.के. अरोडा से बातचीत पर आधारित)

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