लगभग 5 साल पहले की बात है। मेरे पास एक युवती का फोन आया। उसने मुझसे कहा कि मेरी भाभी बहुत परेशान हैं। मैं उन्हें आपसे मिलवाना चाहती हूं। मैंने उसे अगले दिन शाम को बुलाया।

सहनशक्ति की परीक्षा

फोन करने वाली स्त्री ने मुझे सुधा (परिवर्तित नाम) से मिलवाते हुए बताया कि वह उसकी बुआ की बहू है, जो पिछले आठ महीने से बेहद तनावग्रस्त है। जब मैंने सुधा से अकेले में बात की तो उसने मुझे बताया कि उसकी शादी को 19 साल हो चुके हैं और अब तक वह लगातार अपने सास-ससुर के सेवा करती आ रही है। कुछ साल पहले उसके ससुर जी का देहांत हो गया था। समस्या यह थी कि उसका मायका भी दिल्ली में ही था। उसका कोई भाई नहीं था और बडी बहन विदेश में रहती थी। लिहाजा उसकी बुजुर्ग मां बिल्कुल अकेली थीं। वह पिछले कई महीनों से बीमार चल रही थीं और उनकी देखभाल करने वाला कोई और नहीं था। हालांकि विदेश में रहने वाली उसकी बहन ने मां की देखभाल के लिए नर्स की व्यवस्था करवा दी थी। फिर भी उन्हें हमेशा नर्स के भरोसे अकेले छोडऩा ठीक नहीं था। इसलिए वह सप्ताह में एक-दो दिन अपनी मां से मिलने चली जाती थी। सुधा का कहना था कि वह घर का सारा काम पूरा करने के बाद वहां जाती है और शाम होते ही लौट आती है, ताकि सास को कोई परेशानी न हो। हालांकि, उसकी सास पूर्णत: स्वस्थ और सक्रिय थीं, फिर भी वह उसके मायके जाने को लेकर नाराज हो जाती थीं। वर्षों से लगातार सास का ऐसा रवैया देखकर उसके मन में नाराजगी, उदासी और विद्रोह की भावना घर करने लगी। उसके पति भी अपनी मां की ऐसी गलत आदतों को बढावा देते थे। जब वह हर तरफ से निराश हो गई तो उसने चुप्पी और अकेलेपन को ही अपना साथी बना लिया। उसने अपनी सभी रुचियों को त्याग दिया। अकसर नाराजगी की वजह से खाना-पीना छोड देती। पति और सास के प्रति उसके मन में जो क्रोध था, उसे वह अपने ऊपर उतार रही थी। अपने इसी मौन विद्रोह की वजह से वह धीरे-धीरे डिप्रेशन की गहरी खाई में उतरती चली गई। समस्या वाकई गंभीर थी। मैंने उसके साथ आई ननद रमा (परिवर्तित नाम) से कहा कि काउंसलिंग के दौरान कभी-कभी तुम्हें भी मेरे पास आना होगा तो वह इसके लिए सहर्ष तैयार हो गई।

खो गया आत्मविश्वास

अगली सिटिंग के लिए मैंने सुधा को अकेले ही बुलाया। वर्षों से लगातार अत्याचार सहते रहने की आदत ने उसे अत्यंत कमजोर और निरीह बना दिया था। उसकी सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो चुकी थी। मुझे लगा कि उसे असर्टिव ट्रेनिंग की जरूरत है। इसके जरिये मैंने धीरे-धीरे उसके मन से डर को बाहर निकाला, ताकि वह आत्मविश्वास के साथ अपनी बात दूसरों के सामने रख सके। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग तीन महीने का समय लगा और मैं उसे हर पंद्रह दिन के अंतराल पर काउंसलिंग के लिए बुलाती थी। उस दौरान मैंने उसे समझाया कि तुम बेशक अपनी सास की सारी जरूरतें पूरी करो, लेकिन जब भी तुम्हें उनकी कोई मांग गलत लगे तो उसके लिए प्यार से स्पष्ट शब्दों में मना कर दो। ऐसा करने पर वह निश्चित रूप से तुमसे नाराज हो जाएंगी क्योंकि उन्हें तुम्हारे मुंह से ना सुनने की आदत नहीं होगी। फिर भी तुम्हें जी कडा करके कुछ बातों के लिए मना करना ही होगा। वरना तुम इसी तरह मन ही मन घुटती रहोगी, जो केवल तुम्हारे लिए ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए बहुत बुरा होगा। इस तरह चार-पांच सिटिंग्स के बाद जब सुधा मुझसे मिलने आई तो उसने मुझे बताया कि आजकल वह मेरी बातों पर अमल कर रही है। उसने यह भी बताया कि एक रोज जब वह अपनी मां से मिलने जा रही थी तो सास उसे मना करने लगीं। तब उसने उन्हें समझाया कि उसका जाना बहुत जरूरी है। उसने खाने की पूरी व्यवस्था कर दी है और फिर भी कोई दिक्कत हो तो बच्चे उनकी मदद करने में सक्षम हैं। इससे उसकी सास बुरी तरह नाराज हो गईं, पर अगले दिन उनका व्यवहार ठीक हो गया।

रंग लाई मेहनत

यह सुनकर मैंने उससे कहा कि तुम अगली बार अपनी ननद रमा के साथ आना। दरअसल उसकी ससुराल पास में ही थी और वह हर दूसरे-तीसरे दिन अपनी बुआ से मिलने आती थी। मैंने उससे कहा कि तुम कुछ दिनों के लिए अपनी बुआ से मिलना-जुलना बंद कर दो। जब वह तुमसे इसकी वजह पूछें तो बता दो कि इससे तुम्हारी सास नाराज हो जाती हैं। जाहिर है, यह सुनकर वह दुखी होंगी और तुम्हारी सास को भला-बुरा कहेंगी। जब वह ऐसा कुछ कहें तो तुम उसी वक्त उनसे कहो कि जब मैं आपसे मिलने नहीं आई तो आपको इतना बुरा लग रहा है। जरा सोचिए कि आप भाभी को उनकी बीमार मां से मिलने नहीं देतीं तो उन्हें कितना दुख होता होगा। मेरे कहने के बाद रमा ने ऐसा ही किया। आख्िार हमारी मेहनत रंग लाई। अगली बार जब सुधा मुझसे मिलने आई तो उसने कहा कि रमा दीदी के समझाने के बाद से मम्मी का व्यवहार बिलकुल बदल गया है। अब वह मुझ पर ज्य़ादा बंदिशें नहीं लगातीं, बल्कि कई बार मेरे साथ वह भी मम्मी से मिलने चली जाती हैं।

इस तरह लगभग छह महीने के भीतर सुधा का डिप्रेशन पूरी तरह दूर हो गया। इसमें उसकी ननद का बहुत बडा योगदान था। अगर परिवार का सहयोग मिले तो ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं आसानी से दूर हो जाती हैं। द्य

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