परवाह नहीं करती

हर्षिता वाधवा, कानपुर

हम तीन भाई-बहन हैं और शुरुआत से ही हमारे माता-पिता ने हम पर करियर को लेकर कोई दबाव नहीं डाला। उन्होंने कभी भी हमसे यह नहीं कहा कि तुम्हें डॉक्टर या इंजीनियर ही बनना है। उन्होंने हमें अपनी रुचि से जुडे क्षेत्र में पढऩे और आगे बढऩे का पूरा अवसर दिया। एम. कॉम. और बी.एड. करने के बाद जब मैंने टीचिंग के क्षेत्र में जाने का निर्णय लिया तो माता-पिता ने मेरी इस इच्छा का पूरे दिल से स्वागत किया, लेकिन मेरे दोस्त और पास-पडोस के लोग कई तरह की बातें बनाने लगे। मसलन, संपन्न परिवार की लडकी ऐसी मामूली नौकरी करेगी? लोग क्या कहेंगे? लोगों की ऐसी बेतुकी बातों पर ध्यान दिए बिना मैं अपने निर्णय पर अडिग रही। आज मेरे स्टूडेंट्स मुझे बहुत सम्मान देते हैं और उनकी कामयाबी देखकर मुझे सच्ची खुशी मिलती है। सच, अब ऐसा लगता है कि दूसरों की व्यर्थ बातों में आने के बजाय हमें अपने अंतर्मन की सुननी चाहिए।

नाज है बेटियों पर

संध्या सिन्हा, बरेली

हम पांच बहनें हैं। मेरी शादी कम उम्र में ही हो गई थी। इसलिए आगे पढऩे का मेरा सपना अधूरा रह गया। तभी मैंने यह तय कर लिया था कि मैं अपनी बेटियों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दूंगी। मेरी दोनों बेटियां बचपन से ही बहुत समझदार थीं। मैं उन्हें ख्ाूब पढाना चाहती थी पर जैसे ही वे कॉलेज जाने की उम्र में पहुंचीं तो लोगों ने मुझे समझाना शुरू कर दिया कि इनकी शादी में बहुत ज्य़ादा ख्ार्च होगा, अगर सारे पैसे पढाई में ही खत्म हो जाएंगे तो इनके लिए दहेज का प्रबंध कैसे होगा? य़ादा पढी-लिखी लडकियों के लिए उनकी बराबरी का लडका ढूंढने में बहुत परेशानी होती है। इसलिए तुम्हें अपनी बेटियों को य़ादा नहीं पढाना चाहिए। लोग इस तरह की कई बातें कहते रहे पर मैंने उन पर जरा भी ध्यान नहीं दिया क्योंकि मैं उन्हें आत्मनिर्भर बनाना चाहती थी। ऐसी तमाम नकारात्मक बातों के बीच सबसे अच्छी बात यह थी कि इस मामले में मुझे अपनी सास का पूरा सहयोग मिला। आज लोगों को यह बताते हुए मुझे बहुत गर्व महसूस होता है कि मेरी एक बेटी इंजीनियर बन चुकी है और दूसरी एयर होस्टेस है। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मेरे जीवन का वह अधूरा सपना पूरा हो गया, जिसे कभी मैंने अपने लिए देखा था। अगर मैं दूसरों की बातों पर ध्यान देती तो यह सब संभव नहीं हो पाता। मेरा मानना है कि अपने जीवन या परिवार से जुडा कोई भी निर्णय लेने से पहले हमें शांतिपूर्वक खुद ही विचार करना चाहिए क्योंकि दूसरा व्यक्ति हमारी जीवन स्थितियों को समझने में असमर्थ होता है।

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