अपरा एकादशी 1 जून

वट सावित्री पूजा 5 जून

गंगा दशहरा 14 जून

निर्जला एकादशी 16 जून

पूर्णिमा 19 जून

योगिनी एकादशी 30 जून

गंगाजी देव नदी हैं और वह मनुष्य मात्र के कल्याणार्थ पृथ्वी लोक पर आई हैं। पृथ्वी पर उनका अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुआ था। इसलिए यह दिन गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी संवत्सर का मुख कही जाती है। इस दिन स्नान-दान का विशेष महत्व है।

इस तिथि को गंगा स्नान एवं गंगा पूजन से दस प्रकार के पापों (तीन कायिक, चार वाचिक तथा तीन मानसिक) का नाश होता है। इसलिए इसे दशहरा कहा गया है। इस दिन गंगाजी या किसी भी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान और मकर वाहिनी गंगाजी का ध्यान करें। जल में खडे होकर ú नम: शिवायै नरायण्यै दशहरायै गंगायै नम: का जप करके पुष्पांजलि अर्पित करते हुए गंगाजी का पूजन करें।

पूजा सामग्री एवं विधि

पुष्प, धूप, दीपक, नैवेद्य, फल और डंठल वाले पान से गंगा जी का पूजन किया जाता है। इस पूजन की सबसे बडी खासियत यह है कि इसमें हर सामग्री दस की संख्या या माप में होनी चाहिए। पूजन के उपरांत दस ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद उन्हें अपनी श्रद्धा अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए। गंगाजी हमारे दस पापों का नाश करती हैं। अत: इन पापों से निवृत्ति के लिए ही इन्हें सभी वस्तुएं दस की संख्या में ही अर्पित की जाती हैं। स्नान करते समय गंगा जी में दस डुबकी लगानी चाहिए।

सनातन संस्कृति में गायत्री माता, गीता एवं गौ माता की जो प्रतिष्ठा है, देवनदी गंगा को भी वही सम्मान प्राप्त है। महाभारत में इन्हें त्रिपथ-गामिनी और वाल्मीकि रामायण में त्रिपथगा कहा गया है।

गंगा जी की महिमा

हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में गंगा को लोकमाता कहा गया है। इस पृथ्वी लोक में जहां एक ओर यह देवनदी प्राणियों की प्यास बुझाती है, वहीं खेतों की सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराकर मां की तरह उनका पालन-पोषण करती हैं। प्रचलित धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगा जी व्यक्ति को पापों से मुक्त करा के उसे सद्गति प्रदान करती हैं। इसलिए यह गंगा मइया के नाम से विख्यात हैं। यह हमारी भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है, सनातन धर्म के ज्यादातर गं्रथ गंगाजी के माहात्म्य से भरे हुए हैं। ऐसी मान्यता है कि गंगा तट पर जिनका दाह संस्कार किया जाता है, वे मुक्ति के अधिकारी बन जाते हैं।

अवतरण की कथा

पृथ्वी पर गंगाजी के अवतरण की अनेक कथाएं है, पर राजा भगीरथ के प्रयास से संबंधित कथा अति लोकप्रिय है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के अनुसार गंगाजी पर्वतराज हिमालय और उनकी पत्नी मैनारानी की पुत्री हैं। गंगा, पार्वती जी से बडी थीं। पूर्वजों के उद्धार के लिए महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने अत्यंत कठोर तप करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया, उसके बाद गंगाजी पृथ्वी पर आने के लिए राजी हो गईं लेकिन महादेव के सिवा कोई ऐसा नहीं था, जो उनके तीव्र वेग को संभाल सके। अत: राजा भगीरथ ने अपने तप से भगवान शंकर को प्रसन्न किया, तभी महादेव गंगाजी को अपनी जटाओं में धारण करने के लिए तैयार हुए। पूरे एक वर्ष तक गंगाजी महादेव की जटाओं में भटकती रहीं। अंत में भोलेनाथ ने एक जटा खोल कर गंगाजी को पृथ्वी पर छोडा। फिर देवनदी गंगा ने कपिल मुनि द्वारा शापित साठ हजार सगरपुत्रों का उद्धार किया। ऋग्वेद में गंगाजल को औषधि कहा गया है। हिमालय के घने वनों में जडी-बूटियों के असंख्य वृक्ष हैं और उनकी जडों से होकर गुजऱने के कारण ही इस देवनदी में औषधीय गुणों का स्वाभाविक समावेश हो गया। आम श्रद्धालुओं के लिए गंगाजी आज भी आस्था का केन्द्र हैं।

यदि हम चाहते हैं कि गंगाजी आने वाली पीढियों के कल्याणार्थ पृथ्वी पर विराजमान रहें तो हमें राजा भगीरथ की तरह दृढ संकल्प के साथ इन्हें प्रदूषण से मुक्त करना होगा। तभी सही मायने में हमारे लिए यह पर्व मनाना सार्थक होगा।

धार्मिक कार्यों में कलावा क्यों बांधा जाता है?

पुराणों के अनुसार किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के अवसर पर कलाई में मौली या कलावा बांधने से ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा तीनों देवियों लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा से कीर्ति, विष्णु से शक्ति तथा महेश की कृपा से दुर्गुणों का विनाश होता है। इसी तरह लक्ष्मी धन, दुर्गा शक्ति और सरस्वती बुद्धि प्रदान करती हैं। कलावा बांधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से दान देने में अग्रणी राजा बलि की अमरता के लिए वामन भगवान ने उनकी कलाई में यह रक्षा सूत्र बांधा था।

मौलि का शाब्दिक अर्थ है-सबसे ऊपर, जिसका तात्पर्य सिर से भी है। भगवान शंकर के सिर पर चंद्रमा विराजमान होने के कारण 'चंद्रमौलि' भी कहा जाता है।

संध्या टंडन

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