क्रिसमस के दिनों से गोवा में जो जश्न शुरू होता है, वह नए साल तक चलता रहता है। देश-विदेश के सैलानियों सहित सलेब्रिटीज का भी यह फेवरिट डेस्टिनेशन है। व्यस्त दिनचर्या से कुछ पल चुरा कर समुद्री तटों पर बिताना और लहरों से बातें करना मन को सुकून देता है। लहरों ओर समुद्र से घिरा छोटा सा कम आबादी वाला राज्य है गोवा, जहां लंबे समय तक पुर्तगाली शासन रहा। इसकी सीमाएं महाराष्ट्र, कर्नाटक और अरेबियन सागर से मिलती हैं। यहां की मूल भाषा कोंकणी है, जो कर्नाटक में कन्नड और केरल के कुछ हिस्सों में मलयालम लिपि में लिखी जाती है। हिंदी-अंग्रेजी का जोर भी यहां काफी है। हिंदी के लिए देवनागरी और अंग्रेजी-पुर्तगाली के लिए रोमन लिपि का प्रयोग होता है।

गोवा में यूं तो साल भर छुट्टी का माहौल रहता है लेकिन नवंबर से मार्च तक सीजन अपने चरम पर होता है। क्रिसमस और नए साल पर तो यह जगह ज्यादा ही गुलजार रहती है। पर्यटकों के लिए सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र हैं यहां के बीच। कुछ लोगों के लिए यह जगह मौज-मस्ती, ड्रग्स व कसीनो का पर्याय भी है लेकिन गोवा महज इतना नहीं है...। ...यह आधी रात का समय था, जब डब्लिन हवाई अड्डे से हम प्रीपेड टैक्सी पर सवार हुए। हमारा गंतव्य राजधानी पणजी (पंजिम) था लेकिन ड्राइवर के सधे हाथों ने 35 किलोमीटर लंबी यात्रा महज 40-45 मिनट में पूरी कर दी। सडकें शांत थीं, गाडिय़ां कम मगर दुपहिया वाहन नजर आ रहे थे। इतनी रात गए एक-दो लडकियां हेलमेट लगाए सुकून से स्कूटी चलाती दिखीं तो दिमाग में खयाल आया, क्या दिल्ली में आधी रात कोई लडकी ऐसा साहस दिखा सकती है?

पानी में उतरना होगा ...गोवा से आत्मीय रिश्ता तभी बनता है, जब रेतीले तटों से थोडा आगे बढ कर पानी में उतरते हैं। आसपास की जगहों पर पैदल, लोकल सवारियों या किराये पर टैक्सी या स्कूटर लेकर घूमा जा सकता है। बसें भी आसानी से मिल जाती हैं, जिनमें बहुत भीड नहीं रहती। पंजिम गोवा के केंद्र में स्थित साफ-सुथरा व्यवस्थित शहर है। यहां से उत्तरी व दक्षिणी गोवा लगभग बराबर दूरी पर हैं। पंजिम का पॉपुलर बीच है मिरामार, जो मार्केट से लगभग दो किलोमीटर दूर है। नॉर्थ गोवा के अन्य तटों की तुलना में यह काफी शांत और बडा है। सी-फूड, हट्स, स्टीमर और अन्य दिलचस्प गतिविधियों का आनंद लेना चाहते हैं तो नॉर्थ गोवा के कलंगूट, बागा, अंजुना और केंडोलिम बीच की तरफ जाएं। अंजुना एक रॉक बीच है।

चट्टानों पर बैठने से पहले जांच लें कि लहरों की गति कितनी है वर्ना लहरें कभी भी भिगो सकती हैं। यहां क्रैब्स खूब दिखते हैं। साउथ गोवा के बीच एकांतप्रेमियों के लिए हैं। कोलवा, अगोंडा और वर्सा जैसे तट प्रकृति का अद्भुत नजारा पेश करते हैं। दूर तक फैला शांत समुद्र, लहरें हलचल मचातीं किनारे तक आतीं और फिर वापस समुद्र में लौट जातीं मानो बताना चाहती हों, जाएं कहीं भी

लौटना तो समुद्र में है, वही है अपनी मंजिल। व्हेल्स की जिंदगी को करीब से देखने के लिए नावों की मदद लें। अरेबियन सागर के कुछ खास हिस्सों में उछलती-कूदती व्हेल्स नजर आ जाएंगी। इन्हें देखने का सही वक्त सुबह का है, जब ये काफी ऊर्जा में रहती हैं। सुनहरी जेलीफिश भी इस समय दिखती हैं।

सांस्कृतिक पहचान बीच के अलावा गोवा की पहचान हैं यहां के चर्च। खासतौर पर ओल्ड (वेल्हा) गोवा के चर्च सैकडों साल पुराने हैं। इनके द्वार हर धर्म के लिए खुले हैं और ये अपने भीतर न जाने कितनी सदियों की दास्तानें छिपाए हुए हैं। ग्रेनाइट के पत्थरों पर लैटिन व प्री-रोमन गोथिक स्क्रिप्ट में न जाने क्या-कुछ लिखा गया है, जिसे हम समझ नहीं पाते। इतिहास में रुचि रखने वालों को चर्च या म्यूजियम में बिकने वाली हैंडबुक्स खरीदनी चाहिए। ओल्ड गोवा के म्यूजियम में गोवा का समूचा इतिहास उजागर होता है। हीरोज सीरीज के कई पत्थर यहां हैं। यहां के महादेव (शिव) मूंछों वाले हैं। जॉर्जिया की राजकुमारी केटवन हो या सेंट फ्रांसिस जोवियर की बॉडी... कई रहस्य उजागर होते हैं यहां।

सूली पर टंगे जीसस मानो संदेश देते हों, हर युग में सच को मारने की कोशिशें की गईं लेकिन सच अमर है और रहेगा। शाम छह से सात बजे की प्रेयर के बाद चर्च के प्रमुख द्वार बंद हो जाते हैं। हर प्रहर के बाद नीचे लगी रस्सी के सहारे बडे-बडे घंटे बजाए जाते हैं। नी लेंथ मिडी और गाउन पहने बुजुर्ग स्त्रियां कैंडल व फूलों की टोकरी थामे चर्च की सीढिय़ों से आती-जाती दिखती हैं। कोई आपाधापी-हडबडी नहीं...। घर खुले-खुले हैं, पहाडी स्थानों पर बने घरों की तरह, जिनकी छतें ढालुआं होती हैं। पुर्तगाली दौर में बने घरों की खासियत यह है कि यहां पोर्च एक अनिवार्य हिस्सा होता था।

खानपान की विविधता गोवा की प्राचीन डिश है टीजॉन, जो अंकुरित रागी से बना दलिया है। तटीय इलाकों में फिश, लॉबस्टर, क्रैब्स, लेडीफिश, ओएस्टर्स, प्रॉन और चिकेन करीज, फ्राइज, सूप्स और अचार की कई किस्में उपलब्ध हैं। यहां कई तरह के सॉसेज भी मिलते हैं। खासतौर पर कलंगूट बीच के आसपास कुकेरो, चिकेन कैफरोल, गोवान फिश करी और राइस का आनंद लिया जा सकता है। पुर्तगाली समय का खानपान आज भी यहां के लोगों ने अपना रखा है। सुखाई गई सॉल्टेड फिश डिशेज भी यहां खूब मिलती हैं। यहां धान की खेती अधिक होती है। नारियल भोजन का अभिन्न हिस्सा है, हालांकि इसका मूल्य दिल्ली-मुंबई जितना ही है। गोवा के ऊपरी इलाकों में काजू की खेती होती है। बताया जाता है कि 16वीं सदी में पुर्तगाली इसे ब्राजील से लाए थे।

टूरिज्म व फिशिंग के अलावा काजू-नारियल की खेती यहां के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है। नारियल के जूट से बनी टोकरियां, बैग्स और खिडकियों के चिक्स स्थानीय घरों में दिखते हैं। बैंबू, केला, बेर, कोकुम और आम भी यहां खूब मिलता है। दिसंबर-जनवरी में भी यहां आम के पेड बौरों से लदे दिखते हैं। शाकाहारी लोगों को अपना स्वाद ढूंढने के लिए थोडा भटकना पडता है। वेज विंदालू भी यहां की पॉपुलर डिश है। इसके अलावा भाजी-पूडी है लेकिन उत्तरी भारत के स्वाद-प्रेमियों को इसका सिंपल स्वाद अधिक नहीं भाएगा। कोकोनट बर्फी, कोकम ड्रिंक और मैंगो पायस, गोवान समोसा के अलावा काजू का हलवा भी यहां जरूर चखें। खाने के शौकीन हैं तो मसाले खरीद सकते हैं।

गलियां-चौबारे हर शहर की तरह यहां की गलियां और बाजार भी व्यस्त हैं। हालांकि अभी यहां दिल्ली-मुंबई जैसे मॉल्स नहीं हैं। सीप (शेल्स) से बनी वस्तुएं, ज्यूलरी आदि बाजारों व समुद्री तटों पर मिलती हैं। बेकरी, ड्राई फ्रूट्स के अलावा वाइन शॉप्स की भरमार है। नाइट लाइफ देखनी हो तो कसीनो जाएं। ....सैलानियों से इतर आम लोग हैं, जो सुबह काम पर निकलते हैं तो शाम को ही लौटते हैं। रेस्तरां-होटलों में काम करने वाले लडकों की आंखों में दिल्ली-मुंबई घूमने के सपने तैरते हैं। यहां की गलियों में भी कुछ बंद घर हैं, खंडहर होती दीवारें व दरवाजे अपनों का इंतजार कर रहे हैं, न जाने कब से....। इंदिरा राठौर

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