बस स्टॉप, मार्केट्स, ऑटो स्टैंड, मॉल्स, स्कूल-कॉलेज, ऑफिस... जगह कोई भी हो, माहौल कैसा भी हो, लडकियों के मन में एक अजीब सा डर छाया रहता है। घूरती निगाहें और फिसलती जुबान किसी को भी विचलित कर ही जाएगी। इस वजह से कठघरे में अकसर सारे ही लडकों को खडा कर दिया जाता है।

हर दिन हर शहर में लडकियों के साथ कुछ न कुछ घटता रहता है। तमाम उपाय ढूंढे जाते हैं, सेफ्टी एप्स और हेल्पलाइन नंबर्स भी लॉन्च किए जाते हैं। भाषणों और आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच भी नतीजा शायद जस का तस रह जाता है। हल निकलता है तो बस यह कि लडकियों को किसी पर भरोसा न कर खुद अपना ध्यान रखना चाहिए। क्या इतने से सब सुलझ सकता है? क्या दोष मानसिकता का नहीं है जो सबको एक ही तराजू में तौलती है?

वह सुरक्षित कहां

स्कूल-कॉलेज हो या

घर-मोहल्ला, इन्हें भी अब पूर्णत: सुरक्षित कह पाने में संशय होता है। सुरक्षा की दलील देते हुए दोस्तों, कलीग्स और अजनबियों से दूरी तो बनाई जा सकती है पर रिश्तेदारों, शिक्षकों और घर में आने-जाने वालों पर शक का घेरा बनाने में समय लग जाता है। कभी-कभी तो कुछ होने पर लडकियां झिझक में किसी से कह भी नहीं पाती हैं। कहीं न कहीं उन्हें विश्वास होता है कि उनकी बात सुनी नहीं जाएगी या दबा दी जाएगी। ऐसे में कई लडकियां हर किसी को एक ही नजर से देखते हुए सबसे दूरी बनाना शुरू कर देती हैं।

दोषी नहीं सबकी नजर

कई बार अच्छे-बुरे अनुभवों के आधार पर ही सबके लिए एक जैसी राय बना ली जाती है पर कुछ की वजह से हर किसी को दोषी मानना भी समझदारी नहीं होती। जानें नारों का यह खेल कैसे काम करता है-

फेसबुक अपडेट्स पर कमेंट करने वाले: अगर कोई आपकी पोस्ट्स पर लाइक या कमेंट करता है तो हो सकता है कि उसे वाकई में आपका लिखा हुआ या आपकी तसवीर अच्छी लगी हो। अगर कोई इनबॉक्स में परेशान या आपत्तिजनक कमेंट कर रहा हो, तब कोई कदम उठाने में बुराई नहीं है।

वाहन का पीछा करने वाले: यह भी तो सकता है कि आपकी स्कूटी या कार में कोई खराबी हो या इंडीकेटर/लाइट बिना मतलब ऑन हो तो कोई सावधान करने के लिए आपका पीछा कर रहा हो। अगर सडक चलती-फिरती हो तो एक बार रुक कर उससे कारण पूछा जा सकता है।

मेट्रो या बस में टकराने वाले : कुछ लोग जबर्दस्ती टकराते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है पर उस आधार पर हर किसी को शक भरी निगाहों से देखना गलत है। कई बार वाकई में ब्रेक लगने या पीछे से धक्का लगने के कारण वे आपसे टकरा सकते हैं।

चाय/कॉफी के लिए पूछने वाले- अगर सहपाठी या सहकर्मी रिफ्रेशमेंट के लिए पूछते हों तो इसे हमेशा गलत न समझें। हो सकता है कि वे एक दोस्त के तौर पर आपको साथ ले जाना चाह रहे हों। अगर हमेशा वही पेमेंट करने की जिद करें तो बिलकुल न करने दें। बेहतर होगा कि दोनों बिल का आधा-आधा पेमेंट करें।

इनके अलावा सभी की जिंदगी में कुछ चुहलबाजी वाले रिश्ते भी होते हैं। उनके हंसी-मजाक को कुछ और न समझें, उन्हें बदलने की ज्यादा कोशिश भी न करें लेकिन अपनी एक सीमा ारूर निर्धारित करें। यदि वह हद पार होती दिखे तो टोकने से भी न घबराएं।

मानसिकता पर ाोर नहीं

सिर्फ लडकों को ही कठघरे में खडा किया जाए, यह जरूरी नहीं, कभी-कभी लडकियां भी सवालों के घेरे में आ जाती हैं। उनकी चंचलता हर किसी को रास नहीं आती। देखें, उनके प्रति आम नारिया क्या होता है-

जब उन्हें लडकों से दोस्ती और उनका साथ पसंद आता हो। यह हो सकता है कि दोनों में सिर्फ अच्छी दोस्ती हो पर जमाने की नजरें रिश्ते को अपने अनुसार ही देखती हैं।

जब उनकी फ्रेंड लिस्ट या सोशल अपडेट्स पर लडकों की मौजूदगी हो तो उनका हर पोस्ट बाकियों की नजर में खटकता रहता है। उन्हें लगता है कि यह आकर्षण का केंद्र बनने का तरीका है।

किसी को गलत समझने के हजार कारण हो सकते हैं पर जरूरत है नजरिया बदलने की। आज के यंगस्टर्स सुलझे हुए हैं। वे अपने करियर के प्रति भी संजीदा हैं। वे जमाने की बातों को दिल से लगाने के बजाय अपने विवेक का इस्तेमाल करना जानते हैं।

खुद को न बदलें

मेरा मानना है कि यह सब लोगों की मानसिकता पर ही निर्भर करता है। हर इंसान एक सा बिलकुल नहीं होता, मैं अपनी फीमेल फ्रेंड्स के साथ बहुत सहज रहता हूं। जरूरत पडने पर उनकी मदद करने से कतराता नहीं हूं। मुझे किसी की बातों से भी खास फर्क नहीं पडता, लोगों का काम कहना होता है और वे तो कुछ न कुछ कहेंगे ही। उनकी बातों पर प्रतिक्रिया देकर अपना कीमती समय बर्बाद नहीं करता हूं। किसी की टिप्पणियों से आहत होकर अपने रिश्ते खराब करना मुझे पसंद नहीं। मैं इंसानियत और दोस्ती निभाने में यकीन रखता हूं। दूसरों की नजरों में सही बनने से ज्यादा जरूरी होता है कि हम अपनी नजरों में सही बने रहें, मैं उसी कोशिश में लगा रहता हूं। लडकियों की बहुत रिस्पेक्ट करता हूं और दूसरों को भी प्रेरित करता हूं।

ब्रजेश कुमार

सतर्कता है अहम

मुझे लगता है हमने तरक्की तो बहुत कर ली है पर मानसिकता के मामले में शायद आज भी कहीं पीछे रह गए हैं। बराबरी की लगातार मांग की जाती है पर जो बराबरी पर आ जाए, उसे पीछे करने की कोशिश में लग जाते हैं। मेरी कई फीमेल फ्रेंड्स हैं जिनसे मेरा व्यवहार बहुत अच्छा है। हम हंसी-मजाक करते हैं, साथ घूमते-फिरते और खाते-पीते हैं। इसका यह मतलब नहीं कि वे या मैं गलत हैं। कुछ लडके बेशक ऐसे होते हैं जिनसे लडकियों को सतर्क रहने की जरूरत होती है। आज की लडकियां खुद बहुत समझदार हैं, उन्हें सेल्फ डिफेंस टेक्नीक्स पता होने के साथ ही लडकों को हैंडल करना भी बहुत अच्छे से आता है।

विकास पांडेय

दीपाली पोरवाल

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